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होम कला-साहित्य पुस्तक समीक्षा

बांग्लादेश में हर साल टूट रहे 700 मंदिर

'रक्तरंजित बांग्लादेश' इतिहास का दस्तावेज नहीं, बल्कि एक सामूहिक रुदन है। यह पुस्तक हमें चेताती है कि अगर हम सचाई से मुंह मोड़ते रहेंगे, तो वह लौटकर और अधिक क्रूर रूप में आएगी। यह हमें जगाती है और हमारे भीतर के मौन से लड़ने की शक्ति देती है।

Written byPanchjanyaPanchjanya
Sep 10, 2025, 08:16 am IST
inपुस्तक समीक्षा, पुस्तकें

 

अविरल अभिलाष
बांग्लादेश में हिंदुओं पर हो रहे अत्याचारों की खबरें दुनियाभर में छाई हैं। ये अत्याचार कैसे होते हैं, कौन लोग करते हैं, क्यों करते हैं, इन सबका उत्तर ‘रक्तरंजित बांग्लादेश : (मजहब, सत्ता और संघर्ष की कहानी) पुस्तक देती है। यह पुस्तक केवल सूचनात्मक दस्तावेज नहीं, बल्कि एक करुण पुकार, एक विलाप और एक ऐतिहासिक आर्तनाद है। यह उस भूखंड की कथा है, जिसे ‘बांग्लादेश’ के नाम से जाना जाता है, परंतु जिसकी मिट्टी में आज हिंदुओं के रुदन, विस्थापन और मृत्यु की गंध है। इस पुस्तक को पढ़ते समय यह भूलना असंभव है कि यह लेखक द्वारा नहीं, मानवता की आत्मा द्वारा लिखा गया दस्तावेज है। यह केवल एक राष्ट्र के निर्माण की कथा नहीं, बल्कि उसके लिए मिटा दिए गए समुदायों की अनकही कहानी है। यह पुस्तक पाठक के भीतर मौन तोड़ती है’ वह मौन जो दशकों से सत्ता, मजहब और कूटनीति की परतों में दबाया जाता रहा है।

इतिहास और औपनिवेशिक प्रयोगशाला

लेखक हमें प्राचीन बंगाल की ओर ले जाते हैं, जहां विविधता और सहअस्तित्व की सांस्कृतिक चेतना थी। किंतु इस्लामी आक्रमणों ने मंदिर-विध्वंस, जजिया और कन्वर्जन के जरिए उस चेतना को घायल किया। लेखक किसी मजहब के नहीं, बल्कि उस शासन-प्रणाली के आलोचक बनते हैं, जिसने मजहब को अत्याचार का औजार बना दिया। इसके बाद अंग्रेजों ने बंगाल को स्थायी बंदोबस्त और नील आंदोलन जैसी नीतियों से शोषण की प्रयोगशाला बना दिया। 1905 का बंगाल विभाजन सांप्रदायिक पहचान का बीजारोपण था। लेखक इसे केवल इतिहास नहीं, लोकस्मृति का दस्तावेज़ बताते हैं।

विभाजन और पूर्वी पाकिस्तान

1947 में भारत-विभाजन के बाद पूर्वी पाकिस्तान में हिंदू असहाय हो गए। 1951–1971 के बीच हजारों मंदिर टूटे, बेटियां गायब हुईं, ज़मीनें हड़प ली गईं और प्रशासन मौन रहा।

1971 का नरसंहार

25 मार्च, 1971 की रात ‘ऑपरेशन सर्चलाइट’ ने मानवता को झकझोर दिया। ढाका और अन्य क्षेत्रों में हिंदू पहचान को ही दंडनीय बना दिया गया। तीन लाख से अधिक हत्या, हजारों स्त्रियों का बलात्कार, मंदिरों का ध्वंस और लाखों का निर्वासन-ये सब केवल आंकड़े नहीं, अपितु सभ्यता के शोकगीत हैं।

हाल में हुआ अमानवीय तांडव

2011–2024 के बीच हजारों मंदिर ढहाए गए, जबरन कन्वर्जन और अगवा करने की घटनाएं हुईं। 2021 की दुर्गा पूजा और 2022 की रामनवमी पर मंदिरों का अपमान खुले सांप्रदायिक युद्ध जैसा था। 2023 में केवल फेसबुक पोस्ट पर ‘लाइक’ करने के संदेह में 60 हिंदू परिवार मारे गए। लेखक पूछते हैं-क्या यह धीमा बौद्धिक, सांस्कृतिक नरसंहार पर्याप्त नहीं है कि दुनिया चुपचाप देख रही है?

प्रमाण और दस्तावेज

पुस्तक केवल भावनात्मक नहीं, प्रामाणिक भी है। कई रपटें बताती हैं कि 2001 से 2023 तक बांग्लादेश में हिंदुओं की आबादी 13 प्रतिशत से घटकर 6 प्रतिशत रह गई। हर साल औसतन 700 मंदिर टूटते हैं और हर चुनाव के बाद हजारों परिवार विस्थापित होते हैं। ‘रक्तरंजित बांग्लादेश’ इतिहास का दस्तावेज नहीं, बल्कि एक सामूहिक रुदन है। पुस्तक हमें चेताती है कि अगर हम सचाई से मुंह मोड़ते रहेंगे, तो वह लौटकर और अधिक क्रूर रूप में आएगी। यह पुस्तक हमें जगाती है और हमारे भीतर के मौन से लड़ने की शक्ति देती है।

Topics: प्राचीन बंगालबांग्लादेशरक्तरंजित बांग्लादेशविभाजन और पूर्वी पाकिस्तानप्रमाण और दस्तावेज
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