भारत और भारतीयता पंडित दीनदयाल उपाध्याय के जीवन और चिंतन को आच्छादित करने वाला एकमात्र आवृत्त हैI ‘राष्ट्र सर्वप्रथम’ की भावना के साथ आजीवन समाज के प्रति समर्पित रहने वाले पंडित जी ने अपने मौलिक चिंतन ‘एकात्म मानव–दर्शन’, ‘अंत्योदय’ और ‘विकेंद्रीकरण’ से भारतीय राजनीति और सामाजिक जीवन को गहराई से प्रभावित कियाI भारतीय जनसंघ के संस्थापक महामंत्री और अध्यक्ष के अलावा राष्ट्रधर्म, पाञ्चजन्य, दैनिक स्वदेश व तरुण भारत जैसी राष्ट्रवादी पत्रिकाओं के प्रेरणास्रोत रहे दीन दयाल जी ने स्वातंत्र्योत्तर भारतीय राजनीति को अपनी वैकल्पिक दृष्टि से समृद्ध किया।
राजनीति की नई व्याख्या प्रस्तुत की
उन्होंने राष्ट्र को धर्म, अध्यात्म एवं संस्कृति का सनातन पुंज बताते हुए राजनीति की एकदम नयी व्याख्या की। वे महात्मा बुद्ध, स्वामी विवेकानंद, ज्योतिबा फुले, रविंद्रनाथ टैगोर, महर्षि अरविंद, महामना मदनमोहन मालवीय, बाल गंगाधर तिलक और महात्मा गाँधी की परंपरा के सम्मिश्र संवाहक थे। उनके सारग्रही चिंतन-दर्शन में वैदिक वांग्मय और भारतीय चिंतन-परंपरा का सार और सर्वश्रेष्ठ है। सत्ताप्राप्ति की प्रतिस्पर्धी चुनावी राजनीति के बरक्स सामाजिक परिवर्तन और राष्ट्र निर्माण की राजनीति उनका ध्येय था। ऐसा भारत को भारत की दृष्टि से देखने-समझने की नीर–क्षीर विवेकी दृष्टि से ही संभव है। उन्होंने समाजवाद, मार्क्सवाद एवं पूँजीवाद सरीखी अभारतीय विचारधाराओं को भारतीय चिंतन-परंपरा, भारतीय दृष्टिकोण एवं भारतीय जीवन-शैली के सर्वथा प्रतिकूल मानकर अस्वीकार किया है।
एकात्म मानव दर्शन देता है मानव जीवन को सीख
एकात्म मानव–दर्शन अपनी संपूर्णता में मानव-जीवन को संतुलित, सुखी, संपन्न व आनंदमय बनाने का मार्ग सुझाता है। ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की मान्यता से अनुप्राणित उनका चिंतन ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ भाव-साधना का सिद्धांत हैI उन्होंने राजनीतिक लोकतंत्र के साथ-साथ सामाजिक और आर्थिक लोकतंत्र की प्रस्तावना करते हुए बताया कि ये अन्यान्योश्रित और संपूरक हैंI वे उत्पादन में वृद्धि, उपभोग में संयम और वितरण में समानता के पक्षधर थेI व्यष्टि,समष्टि, सृष्टि और परमेष्टि की एकात्मता और शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा के उन्नयन की चिंता उनके चिंतन की आधारभूमि हैI अभारतीय विचारधाराओं में मानव-मात्र को टुकड़ों में बाँट कर देखने की पद्धति अपनायी गई है। अतः वहाँ समग्र और सम्यक मूल्याङ्कन का अवकाश नहीं होता।
दीनदयाल जी का स्पष्ट मत है कि एकांगी होकर मनुष्य को केवल जैविक याकि आर्थिक प्राणी के रूप में देखने की परंपरा नितांत अभारतीय है। इससे मानव-सभ्यता के विकास के उन लक्ष्यों को प्राप्त नहीं किया जा सकता, जो किसी राष्ट्र को ‘परम वैभव’ तक पहुँचाने में सहायक होते हैं। उनकी दृष्टि में मनुष्य को सर्वप्रथम ‘मनुष्य’ ही माना जाना चाहिए। उसकी समस्त आवश्यकताओं, उसके जीवन के सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक व आर्थिक आयामों को ध्यान में रखकर चिंतन करते हुए सतत और संतुलित विकास के पथ पर निरंतर आगे बढ़ना चाहिए। दीनदयाल जी ने भारतीय संस्कृति को ‘खंडित संस्कृति’ नहीं, अपितु ‘एकात्मवादी संस्कृति’ माना है।
संपूर्ण जगत का कल्याण है भारतीय सभ्यता की विशेषता
भारतीय संस्कृति की पहली विशेषता यह है कि वह संपूर्ण जीवन का, संपूर्ण सृष्टि का संकलित विचार करती है। उसका दृष्टिकोण एकात्मवादी है। टुकड़े-टुकड़े में विचार करना विशेषज्ञ की दृष्टि से ठीक हो सकता है, परंतु व्यावहारिक दृष्टि से उपयुक्त नहीं। पश्चिम की समस्या का मुख्य कारण जीवन के संबंध में खंडशः विचार करना तथा फिर उन सबको थेगली लगाकर जोड़ने का प्रयत्न है। विकेन्द्रित विचारों की केन्द्रीयता ही सार्वजनिक जीवन की सहजता का दर्शन है। मानव-जीवन को सहज एवं आनंदमय बनाने के लिए अपने आत्म का विस्तार करना आवश्यक है। अपने आत्म का विस्तार करके ही हम सर्वात्मक एवं सर्वोत्कर्षवादी हो सकते हैं। करुणा का भाव जब मनुष्य के जीवन का सारतत्व बन जाता है, तभी वह ममस्य एवं परस्य के बंधन से मुक्त होकर सुख एवं आनंद का अनुभव कर पाता है।
ऐसी स्थिति में ही वह अपने ‘अहं’ की सत्ता को ‘वयं’ की सत्ता में बदल देता है। दीनदयाल जी का संस्कार-निर्माण ऐसे वैदिक वांग्मय के अनुशीलन से ही हुआ था। वे अपने चिंतन में इच्छा, ज्ञान एवं क्रिया; शरीर, मन, बुद्धि एवं आत्मा के बीच के संतुलन एवं सामंजस्य पर बल देते हैं। वे व्यक्ति के सर्वांगीण विकास के सूत्र को स्पष्ट करते हुए कहते हैं कि व्यक्ति शरीर, मन, बुद्धि एवं आत्मा का समुच्चय है। व्यक्ति के सर्वांगीण विकास में चारों का ध्यान रखना होगा। भौतिक एवं आध्यात्मिक दोनों प्रकार की उन्नति आवश्यक है। इसके साथ ही पुरुषार्थ चतुष्ट्य को महत्त्व देते हुए व्यक्ति के विकास एवं समाज के हित का संपादन करने के उद्देश्य से धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष इन चार पुरुषार्थों की कल्पना की गई है। धर्म, अर्थ एवं काम एक-दूसरे के पूरक एवं पोषक हैं।
नायमात्मा बलहीनेन लभ्यः
उपनिषद् में तो स्पष्ट शब्दों में कहा है कि ‘नायमात्मा बलहीनेन लभ्यः’। इसीप्रकार ‘शरीरमाद्यम खलु धर्मसाधनम्’ अर्थात् शरीर धर्म का प्रधान साधनमात्र है। समकालीन समाज का संकट यह है कि आज शारीरिक सुख–सुविधाएं ही चरम साध्य बन गईं हैं। भारतीय चिंतन परंपरा में ‘राष्ट्र’ केवल भौतिक सीमाओं पर आधारित भौगोलिक इकाई या भौतिक–सरणि मात्र नहीं है। इसका संबंध समानधर्मी, समनादर्शी एवं समानुभूति पर आधारित सामूहिक समभाव से है। यही कारण है कि ‘राष्ट्र’ की ऐसी परिकल्पना करते हुए ‘भू-सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ को महत्त्व दिया गया है। कश्मीर से कन्याकुमारी तक, कच्छ से कामरूप तक प्रत्येक भारतीय एक-दूसरे से ‘एकात्म-भाव’ से जुड़ा हुआ है। भले ही उसकी भाषा, खान–पान,वेश–भूषा, रहन-सहन, पंथ-संप्रदाय अलग हो—किंतु वह संपूर्ण भारत-भूमि के कण-कण को पवित्र मानता है। सबके हित की कामना करता है। राष्ट्र की आत्मा को ‘चिति’ और भौतिक शरीर को ‘विराट’ के रूप में पहचानकर हम उससे आत्मीय संबंध स्थापित कर पाते हैं।
व्यक्ति के एकांगी विकास को महत्त्व देना समस्यामूलक है क्योंकि पाश्चात्य विचारधाराएँ मूलतः ‘उपभोगवाद’ पर आधारित और केंद्रित हैं। ऐसी विचारधाराओं का क्रियान्वयन कर भारत में उपलब्ध अपार प्राकृतिक संसाधनों का असंतुलित व असंयमित उपभोग किया जाता रहा है। इसके कारण कुछ भौतिक विकास तो अवश्य हुआ है, किंतु साथ ही अनेक प्रकार की समस्याएँ व्यक्ति के जीवन को संकटग्रस्त बना रही हैं। पर्यावरण असंतुलन इनमें से सर्वाधिक गंभीर संकट है। कदाचित् ‘उपभोगकेन्द्रित’ विचारधाराओं ने समाज को अराजकता की स्थिति में धकेल दिया है। समाज निरंतर बिखर रहा है।
सामाजिक-सांस्कृतिक मूल्यों का विघटन चरम पर है। ‘परिवार’ एवं ‘विवाह’ जैसी पारंपरिक एवं महत्त्वपूर्ण सामाजिक संस्थाएँ क्रमशः टूट रही हैं। बच्चे ‘क्रेच’, तो बुजुर्ग माता-पिता ‘वृद्ध आश्रम’ में रहने को विवश हैं। मनुष्य के अंतःकरण में अनवरत उद्विग्नता एवं असंतुष्टि का स्थायीवास है। येन–केन–प्रकारेण और शीघ्र-अति-शीघ्र सफलता एवं भौतिक समृद्धि प्राप्त कर लेने की कामना लोगों का स्वभाव बन चुकी है। दीनदयाल जी को इस प्रकार की अनेक समस्याओं का पूर्व-बोध था। वे समाज-जीवन में उत्पन्न होने वाली ऐसी व्याधियों, विकृतियों और विरूपताओं के प्रति सावधान थे। इसीलिए भारतीय समाज-जीवन की समस्याओं के मूल्यांकन एवं उनके समाधान के लिए भारतीय ‘चित्तवृत्तियों’ और ‘जीवन–स्थितियों’ से अनुप्राणित एकात्म मानव–दर्शन से श्रेष्ठतर कोई दूसरा विकल्प नहीं हो सकता।
(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय के किरोड़ीमल कॉलेज में प्रोफेसर हैं।)

















