शेख हसीना के जाने के बाद बांग्लादेश की ताकतों का पूरा प्रयास यही रहा कि उसकी पूर्वी पाकिस्तान की पहचान को वापस ले आया जाय। इसमें उन्हें जिन्ना को बांग्लादेश का संस्थापक साबित करना सबसे जरूरी लगता है। हालांकि उनका यह प्रयास अभी तक आम लोग विफल करते हुए आए हैं। ऐसा ही एक और प्रयास किया गया, जिस पर हंगामा मचा हुआ है।
क्या है मामला?
ढाका यूनिवर्सिटी सेंट्रल स्टूडेंट्स यूनियन म्यूजियम में मरम्मत का काम चल रहा था। इसमें पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना की कई तस्वीरें लगी हुई थीं। इनमें वह तस्वीर भी थी, जिसमें वह घोषणा कर रहे हैं कि उर्दू ही पाकिस्तान की भाषा होगी। बांग्लादेश की नींव रखने वाले शेख मुजीबुर्रहमान की ऐतिहासिक तस्वीरें वहां से गायब कर दी गई थी। जैसे ही छात्रों ने यह देखा, उनके गुस्से का पारावार नहीं रहा। देखते ही देखते मामला राजनीतिक बन गया।
लोगों का कहना था कि DUCSU में जो वर्तमान नेतृत्व है, वह शेख मुजीबुर्रहमान के स्थान पर जिन्ना को प्राथमिकता दे रहा है। जहां बांग्लादेश के लिए शेख मुजीबुर्रहमान ने अपनी जान दांव पर लगाई थी, वहीं पाकिस्तानी फौज और सरकार ने बांग्लादेश के लोगों के दमन में कोई कसर नहीं छोड़ी थी।
शेख मुजीबुर्रहमान की कोई भी अकेले की तस्वीर नहीं थी, जबकि जिन्ना को पर्याप्त स्थान दिया गया। बांग्लादेशी मीडिया के अनुसार जो जिन्ना की तस्वीरें थीं, उनमें 1948 की रेसकोर्स ग्राउंड में भाषण देने, 1940 के लाहौर सम्मेलन और 1970 की एक तस्वीर थी। इसके साथ ही जिन्ना की उर्दू को पाकिस्तान की भाषा घोषित करने वाली तस्वीरें थीं।
शेख मुजीबुर्रहमान की वे तस्वीरें गायब जो बांग्लादेश का आधार
यह और भी आश्चर्य की बात थी कि जिन्ना और पाकिस्तान की भाषाई भेदभाव की नीति के आधार पर ही बांग्लादेश का निर्माण हुआ था। उर्दू की श्रेष्ठता के आधार पर ही पूर्वी पाकिस्तान अर्थात मौजूदा बांग्लादेश की जनता के साथ अन्याय हो रहा था। उनका दमन हो रहा था और उन्हें उनके अधिकार नहीं दिए जा रहे थे। इस अन्याय के खिलाफ जिन्ना के ही साथ पाकिस्तान के निर्माण की जंग लड़ने वाले शेख मुजीबुर्रहमान ने आवाज उठाई थी। जंग का ऐलान किया था और फिर लंबे संघर्ष और लाखों बांग्लादेशी महिलाओं के साथ बलात्कार, हत्या आदि के बाद पाकिस्तान से आजादी पाई थी। मगर अब इसी बांग्लादेश में शेख मुजीबुर्रहमान को “फासीवादी” ताकत कहा जा रहा है,।
DUCSU की लिबेरेशन वार्स एंड मास मूवमेंट की सचिव फातिमा तसनीम जुमा ने कहा कि 5 अगस्त 2024 के बाद फासीवाद के प्रतीकों की तस्वीरें हटा दी गई थीं। जब उनसे पूछा गया कि मुजीबुर्रहमान की पहले की तस्वीरें क्यों नहीं रखी गईं, तो उनका कहना था कि उन्होनें उन्हें नहीं रखना चुना।
छात्रों ने वह तस्वीर फाड़ी
जैसे ही छात्रों ने जिन्ना की वह तस्वीर देखी, तो आक्रोशित हो गए। मोहम्मद अबू तैयब ने फ्रेम से उस तस्वीर को निकाला और फाड़ दिया। प्रश्न भी किया कि आखिर जिन्ना को नायक क्यों बनाया जा रहा है? इसके बाद स्टूडेंट फेडरेशन लीडर अर्को बरुआ ने जमात ए इस्लामी के पूर्व नेता गुलाम आजाद की एक ऐसी तस्वीर लगा दी, जिसमें उसे लोग जूते से मार रहे हैं।
बरुआ का कहना था कि अगर DUCSU अपनी मर्जी से ऐतिहासिक चरित्रों की मनचाही तस्वीरें लगा सकता है, तो यह छात्रों का भी अधिकार है कि वह अपनी पसंद से तस्वीर लगाएं।
छात्र चुनावों में जमात से जुड़े छात्र संगठन जीते थे
सितंबर 2025 में DUCSU चुनावों में जमात ए इस्लामी से जुड़े छात्र संगठन छात्र शिबिर के सदस्यों ने कई महत्वपूर्ण पदों पर कब्जा जमाया था। इसमें अवामी लीग के छात्र संगठन छात्र लीग ने भाग नहीं लिया था।
शेख हसीना के जाने के बाद से ही जिन्ना हावी है
ऐसा बिल्कुल भी नहीं है कि जिन्ना को अभी ही DUCSU में या और कहीं प्राथमिकता मिली है, बल्कि यह सब शेख हसीना के जाने के बाद से ही शुरू हो गया था और अभी तक जारी है। सोशल मीडिया पर ऐसे तमाम वीडियो हैं, जिनमें लोग यह खुलकर कह रहे हैं कि जिन्ना ही बांग्लादेश के मुस्लिमों के असली रहनुमा हैं।
एक ऐसा ही वीडियो सोशल मीडिया पर एक यूजर ने साझा किया है। जिसमें जमात के नेता के यह बोलने का दावा किया जा रहा है कि अगर हम जिन्ना और पाकिस्तान के खिलाफ बोलते रहेंगे तो बांग्लादेश के सामने समस्याएं आएंगी।
"If we keep grumbling against Jinnah and Pakistan, then Bangladesh will face problems. The Muslim world don't trusts Bangladesh. From our constitution to everywhere, we follow Jinnah's principles. You are eating rice, but you do not mention Jinnah's name. What is written in our… pic.twitter.com/6MoDRcph6t
— Himalaya🇧🇩 (@Himalaya1971) September 15, 2026
इसमें यह कहने का दावा है कि बांग्लादेश के संस्थापक शेख मुजीबुर्रहमान ने क्या अपनी जीवनी में यह नहीं लिखा था कि वह जिन्ना के ही कार्यकर्ता थे? वह सुहरावर्दी के सैनिक थे, फिर 1971 की जंग क्यों हुई थी? क्योंकि रहमान पाकिस्तान के प्रधानमंत्री बनना चाहते थे, तो इसमें जिन्ना को क्यों निशाना बनाना? मामला साफ है। 5 अगस्त के बाद इंडिया के एजेंट शेख हसीना के इंडिया जाने के बाद सब कुछ सही हो गया है।
इसमें कहा जा रहा है कि मुस्लिम जगत बांग्लादेश का यकीन नहीं करता। शेख हसीना के प्रधानमंत्री बनने से पहले बांग्लादेश उम्माह का हिस्सा था, मगर शेख हसीना ने दो ही महीने में संविधान बदल दिया था। एक लंबी तकरीर में वह कह रहा है कि क्या हम पाकिस्तानी नहीं है? क्या संविधान में पूर्वी पाकिस्तान नहीं लिखा है?
कुल मिलाकर यह कहा जा रहा था कि जिन्ना के कारण ही उन्हें मुसलमान मुल्क मिला, तो जिन्ना की आलोचना नहीं होनी चाहिए।
छात्र कर रहे विरोध
जमात के नेता का यह भाषण है तो दूसरी तरह कई छात्रों के भी बयान सोशल मीडिया पर वायरल हैं। एक छात्रा का कहना था कि बांग्लादेश जिन्ना का दिया हुआ तोहफा नहीं था। उसे लोगों ने अपने खून, साहस और बलिदान से पाया है।
“Bangladesh was never a gift from Jinnah’s #Pakistan—it was earned by the blood, courage, and sacrifice of its people. The three million who lost their lives in 1971 did not simply ‘disappear’; they were killed by Pakistani forces, while countless women were subjected to rape and… pic.twitter.com/8xurvS3MPH
— Sheikh Sana 🇧🇩 (@SanaSheikhBD) September 15, 2026
वह कह रही है कि जो तीस लाख लोग मारे गए, वे केवल गायब नहीं हुए थे, बल्कि उन्हें पाकिस्तानी सेना ने मारा था और असंख्य महिलाओं का बलात्कार और शोषण किया था। इतिहास मिटाया नहीं जा सकता है।
अब इस मामले को लेकर यूनिवर्सिटी ने भी जबाव मांगा है और जांच बैठाई है कि आखिर जिन्ना की वे विवादास्पद तस्वीरें किसने लगाई थीं?

















