नई दिल्ली । संघ शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में दिल्ली के विज्ञान भवन में मंगलवार को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) द्वारा आयोजित तीन दिवसीय व्याख्यानमाला कार्यक्रम ‘100 वर्ष की संघ यात्रा: नए क्षितिज’ के तृतीय और अंतिम दिवस पर ‘जिज्ञासा समाधान’ कार्यक्रम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने कई प्रश्नों के उत्तर दिए।
कार्यक्रम का संचालन करते हुए दिल्ली प्रांत कार्यवाह अनिल गुप्ता ने बताया कि इस कार्यक्रम के लिए लगभग 218 जिज्ञासाएँ प्राप्त हुई हैं। साथ ही लगभग 148 फीडबैक और सुझाव भी प्राप्त हुए हैं। 218 प्रश्नों को विषयवार 21 समूहों में बाँटा गया है। प्रत्येक समूह में प्रश्न का मर्म और भाव सुरक्षित रखा गया है।
प्रश्न -वर्तमान केंद्र सरकार और संघ के बीच कौन-से विषय मिलते-जुलते हैं और किन मुद्दों पर मतभेद हैं? भाजपा के व्यापक विस्तार और उसके चलते बनी अनुकूल परिस्थितियों को देखते हुए क्या संघ-भाजपा संबंधों की समीक्षा कर उन्हें पुनः निर्धारित करने का समय आ गया है? अक्सर यह चर्चा होती है कि भाजपा का अध्यक्ष, रोडमैप आदि सब कुछ संघ तय करता है। क्या यह सच है?
हमारा दृष्टिकोण हर सरकार के साथ अच्छा समन्वय रखने का है—चाहे वह राज्य सरकार हो या केंद्र सरकार। हमारे अपने आंतरिक संपर्क और संवाद की प्रणाली है। विचार-विमर्श होता है, सुझाव दिए जाते हैं, परंतु निर्णय वही करता है जो जिम्मेदारी पर है। निर्णय का अधिकार उनके पास है, हमारी भूमिका केवल मार्गदर्शन और परामर्श की है।
संघ की प्रयोगशीलता की प्रकृति
संघ की प्रकृति है प्रयोगशीलता—विभिन्न प्रयास किए जाते हैं, यदि सफल होते हैं तो स्वीकार होते हैं, नहीं होते तो संशोधन किए जाते हैं। स्वयंसेवक ईमानदार और निस्वार्थ भाव से प्रयत्न करते हैं।
मतभेद और मनभेद का अंतर
अब सवाल आता है कि मतभेद के मुद्दे क्या हैं? वास्तव में कोई स्थायी मतभेद नहीं होते। मतभेद तो विचारों में स्वाभाविक हैं, परंतु मनभेद नहीं होता। हम एक-दूसरे पर विश्वास करते हैं कि जो भी प्रयत्न कर रहा है, वह निष्ठा और प्रामाणिकता से कर रहा है। क्षमता अपनी-अपनी है, परिस्थिति अपनी-अपनी है, लेकिन सबका लक्ष्य एक ही है। अलग-अलग रास्तों से चलते हुए भी अंततः सबको एक ही स्थान पर पहुँचना है।
“सब कुछ संघ तय करता है” पर वास्तविकता
यह कहना कि “सब कुछ संघ तय करता है”—पूर्णतः गलत है। ऐसा हो ही नहीं सकता। मैं स्वयं पिछले 50–60 वर्षों से शाखा चला रहा हूँ। यदि कोई मुझसे शाखा के विषय में राय ले तो मैं विशेषज्ञता से बता सकता हूँ। लेकिन जो लोग राज्य चला रहे हैं, शासन-प्रशासन के अनुभव रखते हैं, वे उस क्षेत्र के विशेषज्ञ हैं। इसलिए सलाह दी जा सकती है, परंतु अंतिम निर्णय उन्हीं का होगा।
संघ और भाजपा के बीच संबंध
हमारे और भाजपा के बीच संबंध परस्पर सहयोग और विश्वास के हैं। निर्णय अपने-अपने क्षेत्र के अनुसार होते हैं। यही स्वाभाविक और उचित व्यवस्था है।
प्रश्न – राजनेता यदि जेल में हों तो उन्हें पदमुक्त करने के कानून के बारे में संघ का मत क्या है?
उत्तर – संघ का मत है कि नेतृत्व हमेशा पारदर्शी और स्वच्छ होना चाहिए। यह एक बुनियादी तत्व है और इस पर सब सहमत हैं। वर्तमान में जो कानून है, उससे यह होगा या नहीं होगा—इस पर संसद में चर्चा और बहस चल रही है। संसद जैसा निर्णय करेगी, वैसा ही होगा।
परिणाम चाहे जो हो, उद्देश्य यह होना चाहिए कि जनता के मन में यह विश्वास बने कि हमारा नेतृत्व पारदर्शी और स्वच्छ है।
प्रश्न : अन्य राजनीतिक दलों का संघ साथ क्यों नहीं देता.?
प्रश्न : कुछ राजनीतिक दल संघ के विरोधी दिखाई देते हैं। क्या उनके मन में परिवर्तन की संभावना है.?
उत्तर – मनुष्य का मन है तो उसमें परिवर्तन हमेशा संभव है। इतिहास में ऐसे उदाहरण मिले हैं—1948 में जयप्रकाश नारायण स्वयं मशाल लेकर संघ का घर जलाने चले थे। लेकिन आपातकाल के बाद वे हमारे शिक्षा वर्ग में आए और कहा कि “परिवर्तन की आशा केवल आप लोगों से है।”
इसी प्रकार, अनेक अवसरों पर बड़े नेताओं का दृष्टिकोण बदला। मौलाना अबुल कलाम आज़ाद से लेकर हाल ही में प्रणब मुखर्जी तक हमारे मंच पर आए। उन्होंने अपने विचार बदले नहीं, लेकिन संघ के बारे में उनकी कुछ गलतफहमियाँ दूर हुईं, इसलिए वे आए।
इससे स्पष्ट है कि मन परिवर्तन की संभावना हमेशा बनी रहती है—किसी का जल्दी होता है, किसी का देर से।
हमारा रवैया यही रहता है कि अच्छे काम के लिए जो हमसे सहायता माँगते हैं, उन्हें हम सहायता देते हैं। लेकिन जो दूरी बनाते हैं, उन्हें सहायता नहीं मिलती। हम क्या करें? जो अच्छा काम है, उसे करना हमारा कर्तव्य है।
बहुत बार ऐसा हुआ है कि लोग केवल एक पार्टी की मदद को ही देखते हैं, जबकि वस्तुतः संघ हर अच्छे काम में मदद करता है।
उदाहरण के लिए, नागपुर में एनएसयूआई का अधिवेशन हुआ। भोजन की व्यवस्था में गड़बड़ हुई, मारपीट शुरू हो गई, थालियाँ फेंकी जाने लगीं। लगभग 30,000 लोग वहाँ थे। स्थिति बिगड़ गई, तब स्थानीय सांसद ने मुझे रायपुर में फोन किया। हमने अपने स्वयंसेवक भेजे और 60 मिनट के भीतर भोजन की व्यवस्था दोबारा शुरू कर दी। दोपहर 2 बजे तक सब ठीक हो गया। उस समय एनएसयूआई के अध्यक्ष राजीव गांधी थे।
इसलिए हमारा दृष्टिकोण स्पष्ट है— हम किसी को पराया नहीं मानते। हमारे पक्ष से कोई रुकावट नहीं होती। यदि उधर से रुकावट हो, तो हम उनकी इच्छा का सम्मान करते हुए पीछे हट जाते हैं।
प्रश्न – पिछले कुछ वर्षों में भारत में निजी विश्वविद्यालयों की संख्या तेजी से बढ़ी है। शिक्षा के व्यवसायीकरण से शिक्षा का स्तर तेजी से गिर रहा है। एक डिग्रीधारी बेरोज़गार फौज तैयार हो रही है, जो पूरी तरह से अनस्किल्ड है। संघ इस समस्या का क्या समाधान देखता है?
उत्तर – इस समस्या की जड़ मानसिकता है कि “शिक्षा केवल नौकरी पाने के लिए है।” आज अधिकतर लोग डिग्री केवल नौकरी के लिए चाहते हैं।
कृषि शिक्षा और नौकरी की मानसिकता
मेरे अपने अनुभव में, कृषि विद्यापीठ में जहाँ मैं पढ़ा, वहाँ बहुत से छात्र एग्रीकल्चर और वेटरनरी की पढ़ाई पूरी करने के बाद खेती में नहीं गए। उनके पास 70–100 एकड़ ज़मीन, पानी, पंप सबकुछ था, फिर भी वे नौकरी की ओर चले गए। कई लोग बैंक लोन अधिकारी बने और “स्याही की खेती” करते रहे।
सरकारी नौकरी की चाह
यह मानसिकता कि “कमाना है तो नौकरी ही करनी होगी, और वह भी सरकारी हो तो सबसे अच्छा है”—युवाओं को नौकरी की ओर धकेल रही है।
हुनर और स्किल का महत्व
वास्तव में, कमाने के लिए हुनर चाहिए, स्किल चाहिए। हमें मानसिकता बदलनी होगी—हम नौकर नहीं बनेंगे, हम नौकरी देने वाले बनेंगे। यदि यह सोच विकसित हो जाए तो नौकरी की ओर जो भारी प्रवाह है, उसका आधा बोझ अपने आप कम हो जाएगा।
व्यवसाय से आत्मनिर्भरता का उदाहरण
एक विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार ने मुझे बताया कि महंगी शिक्षा न कर पाने वाले युवाओं को उन्होंने व्यवसाय सिखाया। उन्होंने 400 बच्चों को अपने पैरों पर खड़ा किया। उन्होंने एक उदाहरण दिया-
एक लड़का, जिसने आठवीं के बाद पढ़ाई छोड़ दी थी, होटल में बर्तन माँजता था। रजिस्ट्रार ने उससे पूछा—“क्या करना चाहते हो?” उसने कहा—“पान का ठेला चला सकता हूँ।”
तब उन्होंने उसकी मदद की। 4–5 हज़ार रुपये लगाकर पान ठेला शुरू कराया और रोज़ जाकर उसे सिखाया—सामान कहाँ से लाना है, कितना लाना है, ग्राहक से व्यवहार कैसा रखना है, हिसाब कैसे करना है। एक साल बाद वह लड़का इतना आगे बढ़ा कि आज उसके पास शिरडी के पास 29 लाख रुपये की संपत्ति है।
इससे स्पष्ट है—काम करने से आजीविका चलती है और समाज का उपकार भी होता है।
नौकरी की सीमा और व्यवस्था
हकीकत यह है कि दुनिया में कोई भी व्यवस्था—चाहे सरकारी हो या निजी—30% से अधिक लोगों को नौकरी नहीं दे सकती। बाकी लोग अपने हुनर और परिश्रम से ही आजीविका पाते हैं।
श्रम को सम्मान देने की आवश्यकता
समस्या तब और बढ़ी जब समाज में यह सोच आ गई कि “यह काम छोटा है, यह नीच है।” यही हमारे समाज की गिरावट का कारण बना। आज श्रम की प्रतिष्ठा पुनः स्थापित करना आवश्यक है। जो मेहनत से काम करे, उसे सम्मान मिलना चाहिए।
खेती और सामाजिक सम्मान
आज खेती से कमाई अच्छी है, पर किसान को सामाजिक सम्मान नहीं मिलता। पढ़ा-लिखा किसान होने के बावजूद गाँव में रहने और खेती करने वाले को अक्सर विवाह के लिए लड़की नहीं मिलती। कारण यही है—“श्रम को सम्मान नहीं।”
आजीविका का असली सामर्थ्य
इसलिए हमें यह मानसिक भ्रम तोड़ना होगा कि “नौकरी ही आजीविका है।” अपने हाथ से कमाकर स्वयं और परिवार को खड़ा करना सबसे बड़ा सामर्थ्य है।
भारतीय युवाओं की क्षमता
यदि भारतीय युवा इस मानसिकता के साथ खड़े हों तो न केवल भारत की सारी आवश्यकताएँ पूरी होंगी, बल्कि भारत दूसरे देशों को भी वर्कफोर्स उपलब्ध करा सकता है। हमारे पास यह क्षमता है, बस उसे पहचानकर सही दिशा में उपयोग करने की आवश्यकता है।

















