हमारे महान वैदिक मनीषियों ने अन्तः प्रकृति और बाह्य प्रकृति पर जो बहुमूल्य प्रयोग किये थे ; ‘तंत्र विज्ञान’ को उनमें बेशकीमती बताया गया है। इस ‘तंत्र विज्ञान’ की साधना के लिए भारतीय मनीषा ने ‘माघ’ व ‘आषाढ़’ के गुप्त नवरात्रों को सर्वाधिक फलदायी साधनाकाल माना है। यूँ तो नवरात्र के दिव्य साधनाकाल साधकों को वर्ष में चार बार आत्मोत्कर्ष और शक्ति अर्जन के सुयोग उपलब्ध कराते हैं -‘चैत्र’ और ‘आश्विन’ नवरात्रों में सार्वजनिक रूप में और ‘माघ’ और ‘आषाढ़’ मास में एकान्तिक रूप में। वासंतिक (चैत्र) व शारदीय (आश्विन) नवरात्रों में देवी मंदिर के माँ के जयकारों से मंदिर गुंजायमान रहते हैं। जबकि ‘माघ’ व ‘आषाढ़’ के नवरात्रों में साधकगण यह साधना गुप्त रूप से करते हैं। ज्ञात हो कि 15 जुलाई से शुरू हुआ इस वर्ष का आषाढ़ मास का गुप्त नवरात्र का यह विशिष्ट साधनाकाल 23 जुलाई तक रहेगा।
‘‘तंत्र’’ का अर्थ होता है चेतना की शक्ति को बन्धन मुक्त करना
अखिल विश्व गायत्री परिवार के संस्थापक-संरक्षक और गायत्री महाविद्या के महामनीषी पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य तंत्रविद्या के भी निष्णात साधक थे। अपने ग्रन्थ ‘सावित्री व कुण्डलनी तंत्र’ में ‘’तंत्र’’ को परिभाषित करते हुए वे लिखते हैं, ‘’तंत्र शब्द मूलतः ‘तन्’ और ‘त्र’ शब्द से मिलकर बना है। ‘तन्’ का अर्थ होता है चेतना की शक्ति और ‘त्र’ का अर्थ होता है स्वतंत्र या बन्धन मुक्त करना। इस तरह ‘‘तंत्र’’ का अर्थ हुआ चेतना की शक्ति को बन्धन मुक्त करना।‘’ वे आगे लिखते हैं, ‘’हर मनुष्य के भीतर एक आन्तरिक, अतीन्द्रिय और सुषुप्त शक्ति छिपी होती है किन्तु अपने बहिर्मुख स्वभाव के कारण वह उसका उपयोग नहीं कर पाता; उसी प्रसुप्त शक्ति का जीवन में सदुपयोग करना ही तंत्र साधना का मूल उद्देश्य होता है। तंत्र साधना के द्वारा एक उच्चस्तरीय साधक अपने अंतस की विद्युत शक्ति के बल पर प्रकृति के सूक्ष्म परमाणुओं को अपनी इच्छानुसार ढाल सकने की सामर्थ्य स्वयं में विकसित कर सकता है।‘’ आचार्यश्री के अनुसार ऋग्वेद का देवी सूक्त तथा वैदिक ऋषि विश्वामित्र द्वारा किये गये बला-अतिबला के प्रयोग सावित्री महाविद्या के प्रयोग वैदिक युगीन उत्कृष्ट ‘तंत्र विज्ञान’ के परिचायक हैं। अथर्ववेद के प्रवर्तक महाअथर्वण की परम्परा तो तंत्र विज्ञान का भरा-पूरा भण्डार है।
प्राण प्रत्यावर्तन सूक्ष्मीकरण साधना ‘’तंत्र साधना’’ का उत्कृष्टतम प्रयोग
देश के जाने-माने आध्यात्मिक मनीषी और देव संस्कृति विश्वविद्यालय के प्रति कुलपति डॉ. चिन्मय पांड्या कहते हैं कि वर्ष 1984-86 के दौरान गायत्री तीर्थ शांतिकुंज में परम पूज्य गुरुदेव पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा सम्पन्न की गई प्राण प्रत्यावर्तन सूक्ष्मीकरण साधना ‘’तंत्र साधना’’ का उत्कृष्टतम प्रयोग थी। आचार्यश्री के अनुसार तंत्र विद्या का आधार स्तंभ मानी जाने वाली कुण्डलिनी जागरण साधना में जब इस विधा के निष्णात साधक की चेतना जब मेरुरज्जु ( रीढ़ की हड्डी) में विद्यमान षटचक्रों (मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपुर, अनाहत, विशुद्धि, आज्ञाचक्र) का क्रमशः भेदन करती हुई जब सहस्रार में स्थित शिवतत्त्व से जा मिलती है तो शिव-शक्ति का यह दिव्य मिलन जीवन को पूर्णता प्रदान कर देता है और जीव स्वयं शिव तुल्य हो जाता है। इसी को तंत्र सिद्धि कहते हैं। चूंकि यह साधना अत्यंत दुर्गम है इसलिए शास्त्रों में इसे योग्य गुरु के निर्देशन में उच्च आध्यात्मिक मनोभूमि के साधकों के लिए ही निर्देशित किया गया है, जन सामान्य के लिए नहीं।
माँ जगदंबा की देह प्रकट हुई थीं दस महाविद्याएं
शिव महापुराण में कथा आती है कि आदिकाल में एक बार दैत्यराज दुर्ग ने कठोर तप से ब्रह्मा को प्रसन्न कर युद्ध में देवताओं से अजेय रहने का वर प्राप्त कर लिया था। इस वर के फलस्वरूप राक्षसराज दुर्ग का उपद्रव व आतंक तीनों लोकों में फैल गया। तब देवताओं ने आदि शक्ति मां दुर्गा की शरण में जाकर की शरण में जाकर उनसे दैत्यराज दुर्ग के आतंक से मुक्ति दिलाने की प्रार्थना की। इस पर माँ जगदंबा ने अपने शरीर से काली, तारा, छिन्नमस्ता, श्रीविद्या, भुवनेश्वरी, भैरवी, बगला, धूमावती, त्रिपुरसुंदरी और मातंगी इन दस महाविद्याओं को प्रकट कर दुर्ग का वध कर त्रिलोकों को भयमुक्त किया था। मान्यता है कि तभी से आषाढ़ और माघ माह के गुप्त नवरात्रों में इन दस महाविद्याओं के पूजन की परम्परा शुरू हो गयी। इसमें प्रलय एवं संहार के देवता महाकाल एवं महाकाली की संयुक्त तंत्र पूजा का भी विधान है।
गुप्त नवरात्रों का साधना विधान और फलश्रुति
गुप्त नवरात्रों में माँ दुर्गा की साधना-आराधना तांत्रिक पद्धति से किये जाने का विधान ‘श्रीमददेवीभागवत’, ‘शिव महापुराण’, ‘शिवसंहिता’ व ‘दुर्गासप्तशती’ आदि धर्मग्रंथों में विस्तार से वर्णित है। शास्त्रों में कहा गया है कि मानव के समस्त रोग-दोष व कष्टों के निवारण के लिए गुप्त नवरात्र का साधना काल विशेष रूप से फलदायी है। श्री, वर्चस्व, आयु, आरोग्य और धन प्राप्ति और बाधा मुक्ति के लिए गुप्त नवरात्र में विभिन्न प्रकार के अनुष्ठानों का विवरण धर्मग्रन्थों में मिलता है। शास्त्रों में कहा गया है कि गुप्त नवरात्र में दश महाविद्याओं की साधना करके ही ऋषि विश्वामित्र ऐसी अद्भुत तंत्र शक्तियों के स्वामी बन गये थे कि उन्होंने एक नयी सृष्टि की रचना तक कर डाली थी तथा दैत्यगुरु शुक्राचार्य के परामर्श पर लंकापति रावण के पुत्र मेघनाद ने गुप्त नवरात्र की साधना कर ऐसी अजेय शक्तियां अर्जित कर ली थीं कि स्वयं भगवान को भी उसके नागपाश में बंधना पड़ा था। गौरतलब हो कि इस वैदिक युगीन तंत्र साधना में समय के साथ अनेक विकृतियां आ गयीं और मारण, मोहन, वशीकरण, उच्चाटन जैसी निकृष्ट क्रियाओं को तंत्र साधना का ही पर्याय माना जाने लगा। जबकि तंत्र शास्त्रों में स्पष्ट कहा गया है कि जहां भोग है वहां मोक्ष नहीं है और जहां मोक्ष है, वहां भोग नहीं है। जो साधक भगवती महाशक्ति की तांत्रिक साधना में सच्चे मन से संलग्न रहते हैं, उनका ध्येय सदा लोक कल्याण होता है।
साधना का आध्यात्मिक पक्ष
देवी दुर्गा शक्ति का साक्षात स्वरूप हैं पर दुर्गा शक्ति में दमन का भाव भी जुड़ा है। यह समझने की बात है कि दमन किसका! किस शत्रु का विनाश! वस्तुत: हमारे असली शत्रु तो हमारे खुद के रोग, दोष, दुर्गुण व दुर्जनता के विकार हैं जो हमारे जीवन में अड़चनें पैदा कर हमारा सुख-चैन छीन लेते हैं। सच्चे मन से मां की भावपूर्ण उपासना शत्रु, रोग, दरिद्रता रूपी भय बाधा सभी का नाश कर देती है। यही कारण है कि गुप्त नवरात्र में देवी दुर्गा के कुछ खास और शक्तिशाली मंत्रों के जप का विधान दुर्गा सप्तशती में बताया गया है। यथा-“सर्वाबाधाविनिर्मुक्तो धनधान्यसुतान्वित:। मनुष्योमत्प्रसादेन भविष्यति न संशय:।” किन्तु अगर आप पूजन मंत्रों से अनजान हैं तो केवल पूजन करते समय दुर्गा सप्तशती में दिए गए नवार्ण मंत्र “ॐ ऐं ह्यीं क्लीं चामुंडायै विच्चे” का ही यथा सामर्थ्य जप कर सकते हैं। यह मां शक्ति का सर्व समर्थ बीजमंत्र है।
भारत के महान तंत्र साधक और विख्यात सिद्ध पीठ
हमारी भारत भूमि में अनेक महान तंत्र साधक हुए हैं। इनमें आचार्य शंकर, आचार्य नागार्जुन, महान हठयोगी गुरु गोरखनाथ, महेन्द्रनाथ, संत कीनाराम, वामाक्षेपा, श्री श्री रामकृष्ण परमहंस तंत्र की गुह्य प्रक्रियाओं में निष्णात थे। इसी तरह देश के तंत्र साधना के प्रमुख सिद्ध पीठों में पश्चिम बंगाल का तारापीठ, असम का कामाख्या धाम, नासिक का त्रयंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग,कोलकता का कालीघाट, महाकाल उज्जैन का कालभैरव मंदिर, हरिद्वार का मायापुरी मंदिर और हिमाचल प्रदेश के ज्वालादेवी, चामुंडा तथा बगुलामुखी मंदिर तंत्र साधना के सिद्ध क्षेत्र माने जाते हैं।











