दिलजीत दोसांझ की फिल्म सतलुज के कारण न केवल पंजाब बल्कि, राष्ट्रीय परिदृश्य में भी खालिस्तानी आतंकवाद व अलगाववाद की चर्चा जोरों पर है। इसके पक्ष और विपक्ष में कई तरह के तर्क-वितर्क यहां तक कि कुतर्क दिए जा रहे हैं परंतु पिछली सदी के आखिर के दशकों में इस आतंकवाद के साथ लड़ने वाले पुलिस कर्मियों व सुरक्षा बलों के बलिदानों व संघर्ष की अनदेखी हो रही है और जिस तरीके से उन्हें खलनायक बना कर पेश किया जा रहा है उससे सवाल उठना स्वभाविक है कि क्या हम आतंकवाद से यूं लड़ेंगे?
खालिस्तानी उग्रवाद की आधिकारिक समीक्षा नहीं की
यह एक विडंबना ही है कि खालिस्तानी उग्रवाद के खत्म हो जाने के बाद उसकी कोई आधिकारिक समीक्षा नहीं की गई। हमने कभी इसकी चिंता नहीं की कि नई पीढ़ी को इस आतंकवाद के बारे में स्पष्ट बताया जाए। यह वैचारिक मैदान खुली छूट देता है कि खालिस्तानी समर्थक अपने नजरिये से उस दौर का इतिहास प्रस्तुत करें। पंजाब में अभी तक यही कुछ हुआ है। आतंकवाद खत्म होने के बाद आई सतलुज जैसी कई फिल्मों ने खालिस्तानी आतंक की एकतरफा ही सच्ची-झूठी तस्वीर पेश की है। न केवल फिल्म बल्कि शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी, कई सिख संगठनों, पंजाबी व अंग्रेजी मीडिया के एक बहुत बड़े वर्ग ने अपनी विषाक्त कलम से पुलिस वालों को खलनायक के रूप में ही पेश किया है।
इस लड़ाई में देश की ओर से मोर्चा संभालने वाले पूर्व डीजीपी केपीएस गिल व पूर्व मुख्यमंत्री शहीद बेअंत सिंह को पंजाब का कातिल तक कहा और लिखा जाता रहा है। केपीएस गिल को लेकर तो एक असभ्य शीर्षक से पुस्तक तक प्रकाशित हुई है, जिसका नाम ही शर्मसार कर देने वाला है। सवाल पैदा होता है कि सीमापार के दुश्मनों पर विजय के बाद सैनिकों को वीरता पुरस्कार मिलते हैं परंतु पंजाब पुलिस के योद्धाओं को जीत के पुरस्कार के रूप में अपमान, तिरस्कार, अपनों की अनदेखी और यहां तक कि कारावास तक की सजा मिली है। केपीएस गिल को अपने जीवन के अंतिम क्षणों में अकेलेपन का संताप झेलना पड़ा और उनके भोग समारोह में किसी भी बड़े नेता ने जाना उचित नहीं समझा।
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कहानी अजीत सिंह संधू
दो-दो बार राष्ट्रपति पुरस्कार जीतने वाले पूर्व एसएसपी अजीत सिंह संधू को आतंकवाद के बाद मिली कानूनी प्रताड़ना से तंग आकर आत्महत्या करनी पड़ी। संधू ने उस समय पंजाब के सीमांत जिले तरनतारन की कमान संभाली जब कोई अधिकारी वहां जाने को तैयार नहीं था। तरनतारन को खालिस्तान का राकेट तक कहा जाता था, जो शेष पंजाब को खालिस्तान की ओर ले जाने वाला था। दूसरी तरफ पाकिस्तानी साजिशें यहां पूरी तरह हावी थीं, अगर तरनतारन कंट्रोल न होता तो न केवल पंजाब बल्कि पठानकोट के रास्ते से जम्मू-कश्मीर पर इसका असर पड़ता और इसका परिणाम कुछ भी हो सकता था। ऐसे योद्धा अधिकारी को जब आत्महत्या करनी पड़ी तो यह कहीं न कहीं राष्ट्रीय शर्म का ही विषय हो सकता है।
खालिस्तानी उग्रवाद पर सवाल कई
कितने आश्चर्य की बात है कि 1992 में खालिस्तानी उग्रवाद का खात्मा हुआ, फिर केंद्रीय शासकों ने क्या किया? कुछ नहीं, सरकार ने कोई श्वेत पत्र जारी नहीं किया। न ही खालिस्तानी उग्रवाद का खात्मा करने वाले अधिकारियों का कोई सम्मान किया।
यदि आतंकवादी कारनामों, उनके घोषित उद्देश्यों आदि के बारे में देश के शासक स्पष्ट रुख लेकर जन-गण को नहीं बताएंगे, तो लोग भ्रमित होंगे ही। समय बीतने पर अलगाववादी, उग्रवादी पक्ष को अपने को पीड़ित रूप में रखने में कोई सुविधा होगी। यही कुछ सतलुज फिल्म ने किया है। आखिर हमारी संस्थाओं को किसने रोका था कि वे पंजाब पुलिस और खालिस्तानी उग्रवाद से लडऩे वालों के पक्ष में, उस उग्रवाद के हाथों पीडि़त होने वाले हजारों निरीह हिंदुओं-सिखों की दृष्टि से फिल्में बनाते? उन्हें चाहिए था कि उस दौर की पूरे विस्तार रिकार्ड पर लाते, जिससे साफ-साफ दिखता कि खालिस्तानी उग्रवाद क्या था और कैसे उस पर काबू पाया गया।
केपीएस गिल की पुस्तक में दिखी थी पुलिस की पीड़ा
आखिर हमारी लापरवाही का लाभ वैसे तत्व क्यों नहीं उठाएंगे जो अपने अलगाववादी लक्ष्य के प्रति कटिबद्ध हैं? गिल ने दिल्ली में 9 सितंबर, 2006 को एक पुस्तक विमोचन में कहा था, ‘जिस पुलिस बल को आतंकवाद पर जीत के बाद प्रशंसा मिलनी चाहिए थी, उसे बुरी तरह बदनाम किया गया। उनकी जीत को झुठलाया गया।’
फिल्म सतलुज यही कुछ कर रही है, किंतु इसीलिए कर पा रही है, क्योंकि खालिस्तानी आतंक से लड़ने वाले पुलिस बल को खुद भारतीय शासकों ने कभी सम्मानित नहीं किया। यदि करते तो जैसे हनी त्रेहन ने जसवंत सिंह खालरा के जीवन पर फिल्म बनाई, वैसे ही कोई अन्य केपीएस गिल के जीवन अथवा खालिस्तानी उग्रवाद से लड़ने वाले किसी अन्य नायक या घटनाओं पर भी फिल्म बना सकता था।
सिख समाज ने कभी अपने को आतंकवाद के साथ नहीं जोड़ा परंतु कहीं न कहीं हम इस देशभक्त समाज को इससे यह सोच कर जोड़ देते हैं कि खालिस्तानी आतंकवाद का जिक्र करने से यह समाज नाराज न हो जाए। यही कारण है कि जब राजनीतिक कारणों से पूर्व प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी, पूर्व मुख्यमंत्री स. बेअंत सिंह, पूर्व जनरल वैद्य जैसे राष्ट्रीय विभूतियों के हत्यारों को श्री अकाल तख्त साहिब या एसजीपीसी द्वारा सम्मानित किया जाता है तो कोई इसके खिलाफ आवाज तक नहीं उठाता। इन सभी तथ्यों से यही प्रश्न पैदा होता है कि क्या हम इस तरह उस आतंकवाद के साथ लड़ाई लड़ेंगे जो पूरी मानवता का शत्रु है।

















