बहुआयामी वीर सावरकर (6) कड़ी
बाल्यावस्था में वीर सावरकर का स्वप्न एक महाकवि बनने का था, किंतु भारतमाता की पराधीनता ने उनकी प्रतिभा को साहित्य की एकांत साधना-पथ पर नहीं, अपितु सशस्त्र क्रांति के दुर्गम मार्ग पर अग्रसर कर दिया। इस भाव को उन्होंने अत्यंत मार्मिक काव्यमय भाषा में व्यक्त किया है। मानो, भारतमाता उनसे कहती है-
कविकक्ष पूर्ण यह मेरा,
पर कमी वहां पर जा, जा-
क्रांति के बाष्पयंत्र का
कक्ष वह।
अर्थात्, ‘मेरे कवियों का स्थान पूर्ण हो चुका है; किंतु सैनिकों का स्थान अभी रिक्त है। अतः तुम्हें उसी क्षेत्र में जाना होगा।’ मातृभूमि की इस आज्ञा को जीवन-व्रत मानकर सावरकर ने क्रांति का मार्ग स्वीकार किया। यद्यपि उनका समस्त जीवन एक क्रांतिकारी के रूप में व्यतीत हुआ, तथापि उनके अंतर्मन का कवि कभी मौन नहीं हुआ। उनकी काव्यप्रतिभा कभी पद्य के रूप में, कभी ओजस्वी गद्य के रूप में और कभी प्रेरणादायी भाषणों के रूप में निरंतर अभिव्यक्त होती रही। ‘1857 का स्वातंत्र्य समर’ जैसी कृति उनके गद्य-काव्य का उत्कृष्ट उदाहरण है।
काव्य-संपदा
वर्तमान में उपलब्ध सावरकर के समग्र वाङ्मय में लगभग 16 लाख शब्द हैं। मायदेव के अनुसार उनकी काव्यरचना लगभग 10,440 पंक्तियों की है, जबकि स. ग. मालशे के मतानुसार यह संख्या लगभग 13,500 पंक्तियों तक पहुंचती है। परिमाण की दृष्टि से यह तत्कालीन किसी भी प्रमुख मराठी कवि की काव्य-संपदा से किसी प्रकार कम नहीं है। फिर भी उनके विलक्षण काव्यस्वभाव, संघर्षपूर्ण जीवन और प्रखर वैचारिक ऊर्जा को देखते हुए सहज ही प्रतीत होता है कि यदि परिस्थितियां अनुकूल होतीं, तो उनकी काव्यरचना 50 हजार पंक्तियों से भी अधिक हो सकती थी।
सावरकर की काव्य-संपदा में लगभग 95 स्फुट कविताएं तथा 4 खंडकाव्य सम्मिलित हैं। उनकी रचनाओं में आरती, स्तोत्र, श्लोक, ओवी, आर्या, फटके, पोवाड़े और उर्दू गजल जैसे विविध काव्यरूप मिलते हैं। इनमें से लगभग 8 हजार पंक्तियां उन्होंने कारागार में हथकड़ियों और बेड़ियों से जकड़े रहने पर भी दीवारों पर कांटों और कीलों से उकेरीं, उन्हें कंठस्थ किया और सहबंदियों की स्मृति के माध्यम से जेल के बाहर पहुंचाया। विश्व साहित्य में ऐसे सृजन-संघर्ष के उदाहरण अत्यंत विरल हैं। सावरकर की इस अद्वितीय काव्य-साधना ने अनेक कवियों को प्रेरित किया। कवि राजा बढ़े ने लिखा-
कारागार नहीं, तुम्हें वह काव्य-मंदिर ही लगा,
यातना के मध्य तुमने काव्य-कला को साधा।
ऊंची-ऊंची दीवारों पर सुघड़ सुलेख उकेरा,
अरु अपने तेजोबल से तुमने तम को जलाया।।
लोककवि मनमोहन को ऐसा प्रतीत हुआ कि संत ज्ञानेश्वर के पश्चात् एक बार पुनः दीवार किसी कवि की सहचरी बन गई हो। कवि श्रीनिवास बोबड़े ने भी कारागार में प्रस्फुटित इस काव्यप्रतिभा का अत्यंत भावपूर्ण अभिनंदन किया है। उसका हिंदी भावानुवाद प्रस्तुत है-
और हे कविराज! तुमने सीखी कहां
दिव्य यह कीमिया, हम स्वयंमन्य नरों को जहां।
सृष्टि सहवासी होकर भी क्षण-स्फूर्ति न लभे,
कारागार के भुयार में बैठ, वहीं सखे,
तुमने सजीव काव्य के ऐसे रसरम्य पुष्प खिलाए,
जिनकी मत्त सुवास से मन स्वयं को भुलाए।
वस्तुतः इस कृतिशूर, समर-पंडित और राष्ट्रकवि की महिमा का गान अनेक प्रतिष्ठित कवियों ने किया है; अतः उसके आगे कुछ जोड़ना अनावश्यक प्रतीत होता है।
विद्वानों की दृष्टि
सावरकर के काव्य के संबंध में अनेक विद्वानों ने अत्यंत महत्त्वपूर्ण अभिमत व्यक्त किए हैं। दा. ना. आपटे का मत है-
‘सावरकर का काव्य उनके जीवन-चरित्र का पूर्ण प्रतिबिंब है; वह उनके क्षुब्ध एवं व्यथित अंतःकरण से उमड़े हुए उद्गारों का साक्षात् स्वरूप है।’ इसी प्रकार बालशास्त्री हरदास के अनुसार ‘कमला’ काव्य सावरकर के “क्रांतिकारी जीवन का आत्माविष्कार’ है। वहीं सावरकर के प्रख्यात जीवनीकार धनंजय कीर लिखते हैं-
‘Savarkar’s poetry has an autobiographical note and is subjective par excellence… Savarkar has expressed his own emotions, his own sensations, his own thoughts.’ (Savarkar and His Times, pp. 121–122)
अर्थात् सावरकर का काव्य आत्मकथात्मक स्वर लिए हुए है तथा व्यक्तिनिष्ठ काव्य की उत्कृष्ट अभिव्यक्ति है, जिसमें उन्होंने अपने भावों, अपनी अनुभूतियों और अपने विचारों को अत्यंत स्वाभाविक रूप से अभिव्यक्त किया है। इन अभिमतों से भी एक कदम आगे बढ़ते हुए बालशास्त्री हरदास सावरकर के काव्य का साहित्यिक स्थान निर्धारित करते हुए लिखते हैं- ‘आधुनिक भारत के महान वैतालिकों में सावरकर का स्थान महर्षि व्यास का है, शुक का नहीं; क्योंकि दिव्यता की ओर अग्रसर प्रकृति की स्वाभाविक धारा को परागतिक वंचना से मुक्त करना ही उनके काव्य का स्वरूप है।’ (सावरकर काव्य समालोचन, पृ. 142)
विशेष ध्यान देने योग्य तथ्य यह है कि हरदास का यह मूल्यांकन सन् 1943 का है। उस समय न तो सावरकर का जीवन-कार्य पूर्ण हुआ था और न ही उनका आत्मार्पण। यदि उनके संपूर्ण जीवन और कृतित्व का सम्यक् अवलोकन करने के पश्चात, लगभग छह दशकों बाद यह अभिमत व्यक्त किया गया होता, तो संभवतः वह और भी अधिक दृढ़, प्रामाणिक तथा निर्विवाद रूप में सामने आता।
अनुत्तरित साहित्यिक प्रश्न
जिस कवि का अंतर्मन कालापानी के अमानवीय अत्याचारों और घोर एकांतवास में भी विचलित नहीं हुआ, क्या वह अपने ही समाज की उपेक्षा और आत्मघाती व्यवहार से मौन हो गया? इसका निश्चित उत्तर उपलब्ध नहीं है; यह केवल अनुमान का विषय है। अंदमान से मुक्त होने के पश्चात् उनका जीवन अनेक नाटकीय घटनाओं से भरा रहा। एक ओर कारागार की बेड़ियों से निकलकर लाखों लोगों के अभिनंदन और सार्वजनिक सम्मान का दृश्य था, तो दूसरी ओर गांधी-हत्या के आरोप, सामाजिक उपेक्षा और कटु आलोचना का कठोर अनुभव।
जीवन के ये दोनों ध्रुव-अभूतपूर्व यश और चरम विषाद-स्वयं किसी महाकाव्य की कथावस्तु बनने के लिए पर्याप्त थे। अंततः मृत्यु को स्वयं आमंत्रित करते हुए किया गया उनका आत्मार्पण उनके जीवन-काव्य का चरम उत्कर्ष सिद्ध हुआ। सावरकर की काव्य-रचना का काल 1894 से 1938 तक, अर्थात् लगभग 44 वर्षों का रहा। किंतु अंदमान से लौटने के पश्चात् 1924 से 1938 के बीच उन्होंने केवल 24 कविताएं और नाट्यगीत लिखे। इसके बाद 1938 से 1966 तक के लगभग 28 वर्षों में उन्होंने कोई कविता नहीं लिखी। यह तथ्य स्वाभाविक रूप से एक गंभीर साहित्यिक जिज्ञासा उत्पन्न करता है।
हुतात्मा के चार मंत्र
प्रत्येक हुतात्मा की आध्यात्मिक यात्रा चार मंत्रों से पूर्ण होती है-संकल्प, हवन, कवच और पूर्णाहुति। सावरकर के काव्य में इन चारों में से तीन मंत्र अत्यंत सशक्त रूप में उपलब्ध हैं। ‘चाफेकरांचा फटका’ में संकल्प-मंत्र, ‘माझे मृत्युपत्र’ तथा ‘सांत्वन’में हवन-मंत्र और ‘अनादि मी, अनंत मी’ में अदम्य आत्मबल से ओतप्रोत कवच-मंत्र का साकार रूप दिखाई देता है। ऐसा प्रतीत होता है कि वे अपने जीवन का अंतिम पूर्णाहुति-मंत्र भी काव्य के माध्यम से व्यक्त कर सकते थे; किंतु उस भाव को उन्होंने कविता के स्थान पर गद्य में अभिव्यक्त किया। परिणामतः उनकी काव्य-सृष्टि में पूर्णाहुति-मंत्र का अभाव संवेदनशील पाठक को आज भी खटकता है।
सावरकर के काव्य की उपलब्धियां असाधारण हैं। उसमें संकल्प, हवन और कवच-इन तीनों मंत्रों की सशक्त एवं कलात्मक अभिव्यक्ति उपलब्ध है। अपने-आप में यह एक अद्वितीय साहित्यिक उपलब्धि है।
सावरकर का काव्य, काव्य के रूप में भी मूलतः उच्चकोटि का है। काव्यशास्त्र में कविकुलगुरु कालिदास को संस्कृत साहित्य का सर्वोच्च कवि माना गया है। उनके संबंध में प्रसिद्ध उक्ति है कि जब कवियों की गणना कनिष्ठिका से आरंभ हुई तो सबसे पहले कालिदास का नाम लिया गया; किंतु उनके समकक्ष दूसरा कवि न मिलने के कारण अगली उंगली ‘अनामिका’ कहलाने लगी। एक अन्य उक्ति के अनुसार कालिदास की विशेषता उपमा, भारवि की अर्थगौरव, दण्डी की पदलालित्य तथा माघ में इन तीनों गुणों का समन्वय है। सावरकर की प्रतिभा में इन सभी गुणों का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है-
कनिष्ठिका पर कालिदास, गिने प्राचीन कवि-नाम।
सम कवि न मिला कोई, सत्य हुआ अ-नामिका नाम।।
किंतु जब प्रगटी वैनायक प्रतिभा, खिली काव्य-शक्ति।
वृथा लगी तब मुझे, प्राचीन कवि की उक्ति।।
उपमा में कालिदास सम, अर्थगौरव भारवि-धाम।
पदलालित्य दण्डी-सा, माघ-प्रभा अविराम।।
राष्ट्र-रस से आप्लावित, वाणी हुई विशाल।
एक कवि में दीख पड़े, सकल कवि-गुण-जाल।।
सावरकर की महत्ता केवल यहीं समाप्त नहीं होती। कालिदास, भारवि, भवभूति और माघ जैसे महाकवि निःसंदेह अप्रतिम प्रतिभाशाली हैं, परंतु वे द्रष्टा-कवि नहीं हैं। इसीलिए स्वयं कालिदास ‘रघुवंश’ का आरंभ करते हुए विनम्रतापूर्वक कहते हैं-‘मन्दः कवियशः प्रार्थी…’। वे जानते थे कि महर्षि वाल्मीकि और महर्षि व्यास जैसे मंत्रद्रष्टा ऋ षियों की समता प्राप्त करना संभव नहीं है। श्री अरविन्द ने भी बंकिमचंद्र के संदर्भ में इसी भेद को स्पष्ट करते हुए लिखा है-
‘Those words are the mantra which he was born to reveal, and of that mantra he is the seer.’
(Bankim-Tilak-Dayanand, Page 08)
यदि इसी दृष्टि से सावरकर को देखा जाए, तो प्रतीत होता है कि वे भारतराष्ट्र को जीवन-मंत्र देने के लिए ही अवतरित हुए थे। उनके मुख से निकला प्रत्येक शब्द मंत्र बन गया। उनका संपूर्ण जीवन मंत्र बन गया। उनका काव्य उनके तपःपूत, त्यागमय और राष्ट्रसमर्पित जीवन का अविरत भाष्य बन गया। इस प्रकार उनका साहित्य केवल काव्य नहीं रहा; वह राष्ट्रजीवन का प्रेरणामंत्र बन गया।

















