19 जुलाई, 1745 को बहादुर मराठा योद्धा राणोजीराव सिंधिया (शिंदे सरकार) का निधन वर्तमान के मध्य प्रदेश में स्थित शाजापुर के राणोगंज गाँव में हुआ, जिसे पहले मिर्ज़ापुर के नाम से जाना जाता था। उनकी याद में, उनके बेटे, वीर जयप्पा सिंधिया ने एक स्मारक बनवाया और अपने पिता की अस्थियों को उज्जैन की पवित्र क्षिप्रा नदी में विसर्जित किया। वीर जयप्पा ने अपने पिता की अस्थियों का विसर्जन राम घाट पर किया, यह वही स्थान है जहाँ भगवान राम ने अपने पिता राजा दशरथ का तर्पण किया था। राणोजीराव की अस्थियों का एक हिस्सा राम घाट पर जयप्पा द्वारा बनवाए गए स्मारक में भी स्थापित किया गया था।
उल्लेखनीय है कि महान योद्धा राणोजीराव ने उज्जैन को अपनी राजधानी बनाया और शहर की रक्षा के लिए जमीन आसमान एक कर दिया था। इल्तुतमिश और औरंगजेब ने जिन मंदिरों को नष्ट करने का दुस्साहस किया था, राणोजीराव ने उन मंदिरों का पुनर्निर्माण कराया। धार्मिक मूल्यों संरक्षित रखते और सनातन की भावना को पुनर्जीवित करते हुए उन्होंने कई सदियों के अंतराल के बाद सिंहस्थ कुंभ को फिर से शुरू किया। उन्होंने इस उत्सव में भाग लेने के लिए नासिक के शक्तिशाली साधु अखाड़ों को उज्जैन आमंत्रित किया। अपनी सैन्य कुशलता और रणनीतिक सूझबूझ के दम पर, वे मराठों के केसरिया ध्वज को दिल्ली तक ले गए।
कन्हेड़खेड़, सतारा
राणोजीराव, जो ऐतिहासिक दक्कनी सेंद्रक वंश के थे, जानकोजीराव सिंधिया पाटिल और द्वारकाबाई सिंधिया के सबसे बड़े बेटे थे। जानकोजीराव सिंधिया पाटिल कन्हेड़खेड़ के मूल निवासी थे, जो अब महाराष्ट्र में है। राणोजीराव के एक छोटा भाई भी थे, जिसका नाम शंभूराजे सिंधिया था। सतारा के छत्रपति शाहू महाराज की शादी श्रीमंत सावित्रीबाई सिंधिया से हुई थी, 18वीं सदी में, उन्हीं का प्रतिनिधि बन राणोजीराव मध्य भारत आए। साल 1716 में, 17 साल की उम्र में राणोजी सिंधिया ने पेशवा बाजीराव के पिता, पेशवा बालाजी विश्वनाथ की देखरेख में सैन्य कलाएं सीखना शुरू किया। राणोजी के पिता जानकोजीराव पहले से ही मराठा सेना में थे। बाजीराव और अन्य मराठा नेताओं के साथ मिलकर, राणोजीराव ने शाहू छत्रपति की सेवा में अद्भुत वीरता दिखाई। राणोजीराव सिंधिया की दो पत्नियाँ थीं – एक मराठा और दूसरी राजपूत – जिनके नाम क्रमशः निंबाबाई और चिमाबाई थे। निंबाबाई से उन्हें तीन बेटे (जयप्पा, ज्योतिबा और दत्ताजी) और चार बेटियाँ (जानकाबाई, जोगुबाई, येसुबाई और मैनाबाई) हुईं तथा चिमाबाई से उन्हें दो बेटे (तुकोजी और महादजी) और तीन बेटियाँ (सगुनाबाई, कुशाबाई और आनंदीबाई) हुईं।
सिंधिया शक्ति का उदय
1728 में, राणोजी सिंधिया ने पालखेड़ में निज़ाम पर बाजीराव की जीत में अहम भूमिका निभाई, जिसके बाद मुंगी-शेवगांव संधि हुई। इस समझौते में, निज़ाम-उल-मुल्क ने दक्कन के चौथ और सरदेशमुखी पर सतारा के छत्रपति शाहू महाराज के राज को फिर से माना और कोल्हापुर के संभाजी का समर्थन न करने का वादा किया। उसी साल 28 नवंबर को, राणोजी ने अमझेरा को घेर लिया, और अगले दिन, मराठों ने मुगल जनरल गिरधर बहादुर और उसके कमांडर दया बहादुर को हरा दिया। 1729 में, जब मुगल बादशाह मुहम्मद शाह ने छत्रसाल बुंदेला को हराने और बुंदेलखंड पर कब्ज़ा करने के लिए मुहम्मद खान बंगश को भेजा, तो राणोजी सिंधिया के नेतृत्व में मराठों ने उस इलाके की रक्षा का बीड़ा उठाया। इस हमले से आहत और घायल मुहम्मद खान जैतपुर लौट गया और घेराबंदी का सामना करने की तैयारी करने लगा। रसद की कमी थी, और मराठा सैनिकों ने शहर तक पहुँचने का रास्ता रोक दिया था। अपने पिता की मदद करने की कोशिश में खान असफल साबित हुआ और उसे हार का सामना करना पड़ा। घेराबंदी कई महीनों तक चली, और किले में मौजूद सेना की हालत बहुत खराब हो गई। शर्तें तय हुईं, और मुहम्मद खान ने वादा किया कि वे दोबारा कभी बुंदेलखंड पर हमला नहीं करेगा।
1730 में राणोजी ने गुजरात में मराठा अभियान का नेतृत्व किया और कोल्हापुर में अपने कुलदेवता श्री ज्योतिबा का भव्य मंदिर भी बनवाया। 1732 तक, मालवा का मुगल सूबेदार आमेर (जयपुर) का सवाई जय सिंह था, जिसे मुगल बादशाह ने इस पद पर तीसरी और आखिरी बार नियुक्त किया था। हालाँकि, उसी साल बाद में मंदसौर की लड़ाई में राणोजीराव सिंधिया और अन्य मराठा सेनाओं ने उसे हरा दिया। राजस्थान के अपने ऐतिहासिक विवरण में, प्रोफ़ेसर रीमा हूजा लिखती हैं कि शाही मुगल सेना का एक हिस्सा वज़ीर कमर-उद-दीन की अगुवाई में मालवा की ओर बढ़ा, जबकि दूसरा हिस्सा, जिसकी कमान मुगल मीर बख्शी खान-ए-दौरान के पास थी, 10 नवंबर 1734 को दिल्ली से निकला और राजस्थान से होकर गुज़रा। आमेर के सवाई जय सिंह द्वितीय, मारवाड़ के अभय सिंह और कोटा के दुर्जनसाल ने खान-ए-दौरान का साथ दिया।”
मराठों ने इस विशाल सेना पर हमला किया और जब यह सेना कोटा को मालवा से जोड़ने वाले मुकुंदरा दर्रे से गुज़री, तो उन्होंने इस क्षेत्र को अन्य क्षेत्र से अलग काट दिया। मुगल सेना का मराठों से मुकाबला रामपुर में हुआ। माना जाता है कि यह रामपुर टोंक के पास स्थित था और बाद में इसका नाम अलीगढ़ रख दिया गया। इस लड़ाई में, सिंधिया और होल्कर की मराठा घुड़सवार सेना ने शाही सेना की टुकड़ियों को भेद दिया, जिससे मराठों की जीत हुई। हाड़ौती क्षेत्र में जीत के बाद, वे जयपुर की ओर बढ़े। हालात को देखते हुए, मीर-बख्शी खान-ए-दौरान ने सवाई जय सिंह से सलाह करना सही समझा और 24 मार्च 1735 को कोटा में हुई संधि के अनुसार, मालवा के लिए मराठों को ‘चौथ’ के तौर पर बाईस लाख रुपये का हर्जाना देने पर सहमति जताई।
उज्जैन में और दिल्ली की ओर
1732 में, सिंधिया ने उज्जैन में श्री महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर के पुनर्निर्माण का काम शुरू किया और मराठा प्रभाव को सीधे दिल्ली तक फैलाने की तैयारी शुरू कर दी। राणोजीराव सिंधिया सबसे पहले 1718 में 18 साल की उम्र में पेशवा बालाजी विश्वनाथ के साथ दिल्ली आए थे। 1736 में वे पेशवा बाजीराव के साथ फिर से राजधानी आए। मध्य भारत में अपनी ताकत मजबूत करने के बाद, राणोजीराव ने बाजीराव पेशवा के साथ मिलकर मुगल साम्राज्य की राजधानी दिल्ली पर हमला करने का फैसला किया और 1736 में मुगल सेना को बुरी तरह हरा दिया। मध्य भारत पर मराठों के राज का विरोध हुआ, जिससे सिंधिया को भोपाल में मुगल सम्राट के एक प्रमुख जनरल, निज़ाम के खिलाफ अपनी सैन्य ताकत दिखाने का एक मौका और मिला। 1738 में भोपाल की घेराबंदी 27 दिनों तक चली, जिसके दौरान राणोजीराव सिंधिया ने अद्भुत बहादुरी दिखाई। जब खाने-पीने का सामान और गोला-बारूद कम पड़ने लगा, तो निज़ाम को हार माननी पड़ी, जिसके बाद मुगल सम्राट ने चंबल और नर्मदा नदियों के बीच के इलाके पर मराठों का दबदबा मान लिया।
पुर्तगालियों की हार
पुर्तगालियों ने धार्मिक कट्टरता के चलते पश्चिमी भारत में एक अभियान शुरू किया। इसके जवाब में, मराठों ने इन औपनिवेशिक ताकतों से भारत के पश्चिमी तट को मुक्त कराने का संकल्प लिया। 9 जनवरी 1739 को राणोजी ने सफलतापूर्वक माहिम पर विजय प्राप्त की, और उसके कुछ ही समय बाद, 11 जनवरी 1739 को, उन्होंने बेसिन (वसई) के उत्तरी इलाके में दहाड़ू पर विजय प्राप्त की। 16 मई 1739 को, चिमाजी अप्पा के नेतृत्व में राणोजीराव सिंधिया की अगुवाई वाली मराठा सेना ने पुर्तगालियों से बेसिन का किला सफलतापूर्वक जीत लिया। पुर्तगालियों के खिलाफ मराठा अभियान के बारे में, विनायक दामोदर सावरकर अपनी किताब ‘हिंदू पद पादशाही’ में लिखते हैं कि “मराठों ने बेसिन की घेराबंदी की थी। किले पर हमला करने वालों और उसकी रक्षा करने वालों की बहादुरी की कहानी इतनी मशहूर है कि इस संक्षिप्त किताब में उसका विवरण देने की जरूरत नहीं है।” अब लगभग पूरा कोंकण क्षेत्र आज़ाद हो चुका था। पुर्तगाली सेना इस झटके से पूरी तरह उबर नहीं पाई, हालाँकि वे गोवा में किसी तरह अपना अस्तित्व बनाए रखने में कामयाब रहे, क्योंकि मराठे दूसरी जगहों पर कई अन्य महत्वपूर्ण मामलों में व्यस्त थे। पुर्तगालियों का वह दबदबा, जो कभी केप ऑफ़ गुड होप से लेकर येलो सी (पीले सागर) तक एशियाई जलक्षेत्र में फैला हुआ था, मराठों ने ज़मीन और समुद्र, दोनों जगह खत्म कर दिया।
जब राणोजीराव कोंकण को पुर्तगाली नियंत्रण से मुक्त कराने में लगे हुए थे, तब फारस के सम्राट नादिर शाह ने दिल्ली पर हमला किया और उसे लूटा। बेसिन में जीत के बाद, राणोजीराव सिंधिया और मल्हारराव होल्कर दिल्ली की ओर बढ़े। रॉबर्ट मोंटगोमरी मार्टिन अपनी रचना ‘ब्रिटिश इंडिया’ में लिखते हैं कि “मराठों के डर से फारसियों की ने तेजी से वापसी शुरू कर दी थी।” 14 जून 1739 को, मराठों के छत्रपति शाहू महाराज ने शाही सभा में सार्वजनिक रूप से घोषणा की कि “नादिर शाह मराठों के डर से देश छोड़कर भाग गया था।” नादिर की जल्दबाजी में हुई वापसी ने निज़ाम को मुश्किल स्थिति में डाल दिया। इसके बाद मराठा दिल्ली की ओर चल पड़े ताकि उसे नादिर शाह की ‘हिंदवी स्वराज्य’ विरोधी योजनाओं में शामिल होने और भोपाल में हुई संधि की शर्तों को पूरा न करने के लिए कड़ी सज़ा दे सकें। हालाँकि, उसी समय 22 अप्रैल 1740 को बाजीराव पेशवा का निधन हो गया। रावेरखेड़ी में उनकी समाधि का निर्माण राणोजीराव सिंधिया ने ही करवाया था।
निष्कर्ष
श्रीमंत सुभेदार राणोजीराव सिंधिया एक महान देशभक्त और एक जाने-माने भारतीय योद्धा थे। ‘ऑर्गनाइज़र’ के सबसे लंबे समय तक संपादक रहे और बीजेपी के पूर्व उपाध्यक्ष श्री के. आर. मलकानी ने बताया है कि डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने ग्वालियर में RSS को ‘राणोजी स्वयंसेवक संघ’ कहा था। जिस जगह पर राणोजीराव का निधन हुआ, उस जगह को उनकी याद में ‘राणोगंज’ के नाम से सम्मान दिया जाता है। मराठा सरकार ने उन्हें जो ज़िले सौंपे थे, उन्हें उन्होंने कितनी कुशलता से संगठित किया, इसका सबूत इस बात से मिलता है कि जब उनके बेटे जयाप्पा ने कार्यभार संभाला, तो उनसे सालाना 65.5 लाख रुपये की आय होने का अनुमान था। ‘हिंदवी स्वराज्य’ का झंडा, जिसके लिए राणोजीराव ने कई लड़ाइयों में बहादुरी से लड़ाई लड़ी, उसे उनके बेटे ने भी ऊंचा बनाए रखा। उन्होंने मराठा साम्राज्य के लिए कई संघर्षों में अहम भूमिका निभाई, जिसमें पानीपत की तीसरी लड़ाई भी शामिल थी। बाद के वर्षों में, राणोजीराव के बेटे महाराज महादजी सिंधिया ने दिल्ली पर मराठा वर्चस्व को मज़बूत किया और बाद में पहले आंग्ल-मराठा युद्ध के दौरान वड़गांव में अंग्रेज़ों के खिलाफ जीत हासिल की। राणोजीराव सचमुच एक महान भारतीय योद्धा थे और यह लेखक उन्हें नमन करता है।

















