शिक्षा केवल लिटरेसी नहीं, संस्कार और संस्कृति पर आधारित होनी चाहिए : सरसंघचालक मोहन भागवत जी
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शिक्षा केवल लिटरेसी नहीं, संस्कार और संस्कृति पर आधारित होनी चाहिए : सरसंघचालक मोहन भागवत जी

100 वर्ष की संघ यात्रा: नए क्षितिज व्याख्यानमाला के ‘जिज्ञासा समाधान’ कार्यक्रम में सरसंघचालक मोहन भागवत जी ने कहा— शिक्षा का उद्देश्य सुसंस्कृत मनुष्य बनाना है। तकनीक साधन बने, साध्य नहीं

Written byShivam DixitShivam Dixit
Aug 28, 2025, 07:48 pm IST
inभारत, संघ @100, दिल्ली
श्री मोहन भागवत जी, सरसंघचालक, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ

श्री मोहन भागवत जी, सरसंघचालक, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ

नई दिल्ली । संघ शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में दिल्ली के विज्ञान भवन में मंगलवार, 26 अगस्त से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) द्वारा आयोजित तीन दिवसीय व्याख्यानमाला कार्यक्रम ‘100 वर्ष की संघ यात्रा: नए क्षितिज’ शुरू हो गया है। आज 28 अगस्त को इस कार्यक्रम का तृतीय और अंतिम दिन है। आज राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ‘जिज्ञासा समाधान’ के तहत कार्यक्रम में सम्मलित हुए अतिथियों के प्रश्नों का उत्तर दिया।

कार्यक्रम का संचालन करते हुए दिल्ली प्रांत कार्यवाह अनिल गुप्ता ने कहा- आज के त्रिदिवसीय उद्बोधन व संवाद कार्यक्रम के तृतीय दिवस पर आपका स्वागत है। आज का दिन त्रिवेणी संगम का दिन है—जिज्ञासा, समाधान और ज्ञान—तीनों का सुंदर संगम।

सौभाग्य से हमारे मध्य पूज्य सरसंघचालक जी और माननीय सरकार्यवाह जी उपस्थित हैं। पूज्य सरसंघचालक जी हमारी जिज्ञासाओं का समाधान करेंगे। ज्ञान अनंत है, जिज्ञासा भी अनंत है। जिज्ञासा और समाधान का संगम ही ज्ञान तक पहुँचाता है। ज्ञान सर्वदा अनंत रहेगा, इसलिए जिज्ञासाएँ भी बनी रहेंगी और उनके समाधान की प्रक्रिया भी चलती रहेगी।

दिल्ली प्रांत कार्यवाह ने बताया कि इस कार्यक्रम के लिए लगभग 218 जिज्ञासाएँ प्राप्त हुई हैं। साथ ही लगभग 148 फीडबैक और सुझाव भी प्राप्त हुए हैं, जिन्हें पूज्य सरसंघचालक जी को सौंप दिया गया है। संघ की यह यात्रा है, इसमें सब कुछ अत्यंत महत्त्वपूर्ण है और जो भी उचित और संभव होगा, वह किया जाएगा।

218 प्रश्नों को विषयवार 21 समूहों में बाँटा गया है। प्रत्येक समूह में प्रश्न का मर्म और भाव सुरक्षित रखा गया है।

पहला प्रश्न – शिक्षा और संस्कारों को लेकर

तकनीक और आधुनिकीकरण के युग में संस्कार और परंपराओं के संरक्षण की चुनौती को संघ किस प्रकार देखता है?

क्या आपको लगता है कि देश की शिक्षा प्रणाली में गुलामी मानसिकता की झलक अब भी है? शिक्षा और प्रशासनिक प्रणाली में सुधार की कितनी आवश्यकता है? संघ के नाते हम इसमें कैसे सुधार ला सकते हैं?

इसी से जुड़े अन्य प्रश्न—

मिशनरी और पब्लिक स्कूलों में शिक्षा के नाम पर संस्कृति को धूमिल किया जा रहा है। इस पर संघ का क्या विचार है?
क्या रंगमंच को केवल गतिविधि न मानकर अनिवार्य विषय बनाया जा सकता है, जिससे विद्यार्थी बचपन से ही कला और संस्कृति से जुड़ सकें?

वैदिक गुरुकुल शिक्षा धारा और 64 कलाओं को मुख्य धारा से जोड़ने तथा इस दिशा में निष्ठापूर्वक कार्य करने वालों की सहायता कैसे की जा सकती है? कक्षा 6 से 12 तक संस्कृत भाषा को अनिवार्य बनाने पर संघ का क्या मत है?

सरसंघचालक जी का उत्तर

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने उत्तर देते हुए कहा- तकनीक और आधुनिकता का शिक्षा से कोई विरोध नहीं है। जैसे-जैसे मनुष्य का ज्ञान बढ़ता है, नई तकनीकें आती हैं। उनका उद्देश्य मनुष्य के कल्याण हेतु होता है। तकनीक का उपयोग मनुष्य के हाथ में है—वह साधन बने, साध्य न बने।

पुराने समय में कहा जाता था—“पहले लाठी पहलवान को चलाती है, बाद में पहलवान लाठी को।” आजकल कहा जाता है—“पहले मोबाइल हम सुनते थे, अब मोबाइल हमें सुनता है।”

इससे बचने के लिए शिक्षा आवश्यक है। तकनीक का मालिक मनुष्य हो, तकनीक मनुष्य की मालिक न बने।

शिक्षा का अर्थ केवल लिटरेसी (पढ़ना-लिखना) नहीं है, केवल स्कूलिंग और इनफॉर्मेशन क्रैमिंग नहीं है। शिक्षा का उद्देश्य है—मनुष्य को सुसंस्कृत और वास्तविक मनुष्य बनाना। ऐसी शिक्षा मिलने पर मनुष्य तकनीक का सदुपयोग दवाई की तरह कर सकता है।

गुलामी की मानसिकता और शिक्षा

सरसंघचालक जी ने कहा- हमारी शिक्षा पद्धति को पहले ही नष्ट कर दिया गया था और नई प्रणाली इसलिए लाई गई थी कि हम सदा गुलाम बने रहें। उस शिक्षा का उद्देश्य हमारे विकास का नहीं, बल्कि विदेशी शासकों के लिए इस देश पर शासन आसान करना था।

अब हम स्वतंत्र हैं, इसलिए केवल शासन चलाना नहीं, बल्कि जन-पालन और मानसिकता निर्माण करना है। इसके लिए बच्चों को भूतकाल की गौरवपूर्ण जानकारी भी मिलनी चाहिए, जिससे उनमें आत्मगौरव जागृत हो। धीरे-धीरे यह जागरूकता बढ़ रही है और नई शिक्षा नीति में भी इसे सम्मिलित करने का प्रयास हुआ है।

सरसंघचालक जी ने कहा- नागपुर में प्रचारक रहते हुए एक सज्जन मिले—केरल के आईपीएस अधिकारी। वे लुंगी और कुर्ता पहनकर कार्यालय जाते थे। नागपुर में जब ऐसे ही वेश में गए तो डांटा गया और कहा गया कि ड्रेस कोड के अनुसार सूट-कोट-टाई पहनना आवश्यक है। उन्होंने खादी कुर्ता-पजामा भी अपनाया, पर उसे भी अस्वीकार कर दिया गया।

उन्होंने मुझसे कहा—“नागपुर जैसी गर्मी में यह ड्रेस कैसे पहनी जाए? यह बदलना चाहिए।”

बाद में पता चला कि प्रशासनिक सेवाओं में ड्रिंकिंग एटिकेट्स तक सिखाए जाते हैं। विदेश सेवा वालों को यह आवश्यक हो सकता है, पर क्या हर जगह इसकी आवश्यकता है..? इस तरह की व्यवस्थाओं में परिवर्तन होना चाहिए।

भारतीय दृष्टिकोण

सरसंघचालक जी ने कहा- स्वतंत्रता के बाद परिवर्तन हुए हैं, पर अभी भी गुंजाइश है। शिक्षा और प्रशासनिक प्रणाली को हमारी परंपरा, मूल्यों और संस्कृति के अनुरूप होना चाहिए। यह धार्मिक (religious) नहीं, बल्कि सामाजिक (social) है।

उदाहरण—

  • माता-पिता का सम्मान करना
  • बड़ों के सामने नम्रता रखना
  • अहंकार से दूर रहना

ये मूल्य यूनिवर्सल हैं। भोजन हाथ से करें या चाकू-कांटे से—यह छोटी भिन्नता है। लेकिन मूल संस्कार सबमें समान हैं।

भाषाएँ भी इसी दृष्टि से—अंग्रेज़ी सीखने में कोई बुराई नहीं। भाषा एक माध्यम है। मैंने भी अंग्रेज़ी उपन्यास पढ़े हैं, पर मेरे संस्कारों या हिंदुत्व प्रेम में कोई कमी नहीं आई। समस्या तब है जब हम अंग्रेज़ी साहित्य पढ़ें और प्रेमचंद या हमारी परंपरा का साहित्य छोड़ दें। हमारे पास रामायण, महाभारत, उपनिषदों से लेकर आधुनिक काल तक समृद्ध साहित्य है। उसकी शिक्षा सबको मिलनी चाहिए। यह धार्मिक शिक्षा नहीं है, बल्कि समाज का साझा सांस्कृतिक आधार है।

उन्होंने कहा-  शिक्षा संस्कारों और संस्कृति पर आधारित हो। कला, संगीत, नाटक आदि सहगामी नहीं, बल्कि अनिवार्य अंग हों। नई शिक्षा नीति में पंचकोशीय विकास और कला, योग, क्रीड़ा का समावेश आशाजनक है। एकदम बदलाव संभव नहीं, परंतु धीरे-धीरे सही दिशा में परिवर्तन हो रहा है। कला और संस्कृति से विहीन व्यक्ति को शास्त्रों ने भी “साक्षात पशु” कहा है।

Topics: शिक्षा और संस्कारMohan Bhagwat speechRSS education visionविज्ञान भवन कार्यक्रमRashtriya Swayamsevak Sanghमोहन भागवतनई शिक्षा नीति 2020पाञ्चजन्य विशेषसंघ शताब्दी वर्षRSS
Shivam Dixit
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अनुभवी भारतीय पत्रकार, मीडिया एवं सोशल मीडिया विशेषज्ञ, राष्ट्रीय स्तर के पुरस्कार विजेता, और डिजिटल रणनीतिकार। वर्ष 2015 में पत्रकारिता की शुरुआत। प्रिंट, TV और डिजिटल मीडिया संस्थानों में विभिन्न भूमिकाओं में कार्य किया। भारत की प्रथम SMS समाचार एजेंसी "न्यूज़ नेटवर्क ऑफ इंडिया" (NNI) में रिपोर्टर कोऑर्डिनेटर के रूप में काम किया, डिजिटल मीडिया के अनोखे प्रोजेक्ट "इंडियाज़ पेपर" का नेतृत्व करते हुए 500 समाचार वेबसाइटों का प्रबंधन किया। भारत के अलग अलग राज्यों के लगभग 1000 स्थानीय पत्रकारों से जुड़ा यह प्रोजेक्ट "लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स" में दर्ज है। वर्ष 2022 से राष्ट्रीय साप्ताहिक पत्रिका पाञ्चजन्य (1948 में स्थापित) में उपसंपादक के रूप में कार्यरत हैं। शिवम् की पत्रकारिता में राष्ट्रीयता, सामाजिक मुद्दों और तथ्यपरक रिपोर्टिंग पर जोर रहा है। उनकी कई रिपोर्ट्स, जैसे- नूंह (मेवात) हिंसा, हल्द्वानी वनभूलपुरा हिंसा, जम्मू-कश्मीर पर "बदलता कश्मीर", "नए भारत का नया कश्मीर", "370 के बाद कश्मीर", "टेररिज्म से टूरिज्म", और अयोध्या राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा से पहले के बदलाव जैसे "कितनी बदली अयोध्या", "अयोध्या का विकास", और "अयोध्या का अर्थ चक्र", कई राष्ट्रीय मंचों पर सराही गई हैं। उपलब्धियों में देवऋषि नारद पत्रकार सम्मान (2023) शामिल है, जिसे उन्होंने जहांगीरपुरी हिंसा के मुख्य आरोपी "अंसार खान" की साजिश को उजागर करने के लिए प्राप्त किया। [Read more]
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