मेरा जन्म पाकिस्तान के वर्तमान लायलपुर जिले के गांव गढ़ फतेहशाह में हुआ था। दादा टेक सिंह सम्मानित व्यक्ति थे। उनसे गहरे पारिवारिक मूल्यों और संस्कारों की सीख मिली। हमारा गांव आपसी सद्भाव और पारस्परिक मेल-जोल का प्रतीक था, जहां सिख और हिंदू रहते थे। धर्म या जाति के आधार पर कोई भेदभाव नहीं था। लोग एक-दूसरे की फसल काटने में मदद करते और सुख-दुख साझा करते थे। सामाजिक आयोजन और त्योहार भी सामूहिक रूप से मनाए जाते थे।
परिवार की राजनीति में कोई रुचि नहीं थी। स्वतंत्रता और विभाजन की बातें हमारे लिए दूर की थीं और बंटे हुए भारत की कल्पना असंभव लगती थी। जब छह साल का था, तब अचानक विभाजन की खबर हमारे गांव तक पहुंची। फिर चाचा शहर से लौटकर आए तो बंटवारे की चिंता बढ़ाने वाली खबरें सुनाईं। कुछ ही समय बाद, एक सरकारी अधिकारी गांव आया और घोषणा की कि सभी गैर-मुस्लिम परिवारों को गांव छोड़ना होगा।
तुष्टीकरण और मुस्लिम अलगाववाद : भारतीय राष्ट्रभाव के सामने कट्टरपंथी चुनौती
हालांकि, तब तक दंगे की आंच गांव तक नहीं पहुंची थी। लेकिन लेकिन आसपास के इलाकों से नरसंहार और बर्बर हमलों की कहानियां लगातार सुनाई दे रही थीं। डर और अनिश्चितता ने पूरे समुदाय को जकड़ लिया था। पिता ने हालात की गंभीरता को समझते हुए पुश्तैनी घर छोड़ने का दर्दनाक फैसला लिया। आगे क्या होगा, इसकी तैयारी का कोई समय नहीं था।
परिवार ने खाने की चीजें, कुछ सोने के आभूषण उठाए और बाकी सब कुछ पीछे छोड़ दिया। भारतीय सेना द्वारा भेजी गई सैन्य बसों में हमें ले जाया गया। ये बसें विभिन्न गांवों से आए शरणार्थी परिवारों से भरी हुई थीं। भारत में हमारा पहला ठिकाना अमृतसर था। कुछ समय बाद हम डबवाली और अंततः मलोट पहुंचे, जहां जीवन को फिर से संवारने की लंबी प्रक्रिया शुरू की। कई वर्षों तक बेहद साधारण परिस्थितियों में जीवन यापन करते रहे। उस स्थिरता को पाने के लिए संघर्ष करते रहे, जो पीछे पाकिस्तान में खो दी थी।
मैंने दोबारा पढ़ाई शुरू की और मैट्रिक तक पढ़ाई की। इसके बाद स्थानीय कमेटी में क्लर्क की नौकरी मिली, जो एक नियमित आय का साधन बनी। धीरे-धीरे परिवार की स्थिति बेहतर होती गई। मलोट में एक छोटा सा घर खरीदने में सफल रहा और स्थायी रूप से बसने का निर्णय लिया।

















