भारतीय राष्ट्रभाव के सामने कट्टरपंथी चुनौती
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तुष्टीकरण और मुस्लिम अलगाववाद : भारतीय राष्ट्रभाव के सामने कट्टरपंथी चुनौती

सांप्रदायिक राजनीति, मुस्लिम तुष्टीकरण और मजहबी पृथकतावाद ने भारतीय राष्ट्रवाद को कमजोर किया और देश बंट गया। दुर्भाग्य से आज भी ये चुनौतियां हैं। सेकुलर नेता सत्ता के लिए घुसपैठियों को भी 'अपना' बता रहे हैं और उनके लिए सड़क से लेकर संसद तक हंगामा कर रहे हैं

Written byPanchjanyaPanchjanya
Aug 11, 2025, 03:25 pm IST
in भारत, विश्लेषण
‘डायरेक्ट एक्शन डे’ के आह्वान के बाद नोआखली में हुए हिंदू नरसंहार का एक दृश्य

‘डायरेक्ट एक्शन डे’ के आह्वान के बाद नोआखली में हुए हिंदू नरसंहार का एक दृश्य

उन्नीस साै सैंतालीस का भारत विभाजन केवल एक राजनीतिक घटना नहीं, बल्कि यह उस विचारधारा की ऐतिहासिक विफलता थी, जो ‘भारत एक है’ के राष्ट्रवादी मूलमंत्र पर आधारित थी। विभाजन का ताना-बाना मुस्लिम पृथकतावाद,कांग्रेस की कमजोर सामंजस्य नीति और ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन की भूमिका की गूढ़ परतों से बुना गया था।

मुस्लिम पृथकतावाद का उदय : तर्क और इतिहास

19वीं शताब्दी के अंतिम दशक में मुसलमानों की राजनीतिक व सामाजिक दशा चिंताजनक थी। सर सैयद अहमद खान ने मुस्लिम समुदाय को शिक्षा और सामाजिक सुधार के माध्यम से पुनर्गठित करने की बात कही, किंतु यह स्पष्ट नहीं कहा— ‘हिंदू और मुसलमान दो अलग-अलग राष्ट्र हैं।’ उस समय उनका लक्ष्य मजबूती से संगठित मुस्लिम समाज बनाना था, जो ब्रिटिश शासन के तहत अपनी साख और राजनीतिक दावेदारी बनाए रख सके। 1906 में मुस्लिम लीग का गठन हुआ, जो मुस्लिम समुदाय के राजनीतिक हितों की रक्षा के लिए बनाई गई पार्टी थी, और धीरे-धीरे राजनीतिक पृथकतावाद के एजेंडे ने जोर पकड़ना शुरू किया।

विभाजन-विभीषिका: एक ऐतिहासिक त्रासदी थी भारत विभाजन…

1930 में इलाहाबाद में अल्लामा इकबाल ने मुस्लिम बहुल क्षेत्रों के लिए राजनीतिक स्वायत्तता की वकालत की, लेकिन उन्होंने अलग मुस्लिम राष्ट्र की मांग स्पष्ट रूप से नहीं की। इस समय तक ‘द्विराष्ट्र का सिद्धांत’ के प्रारंभिक रूप इतिहास में विकसित हो रहे थे। 1940 में लाहौर प्रस्ताव में मुस्लिम लीग ने पहली बार स्पष्ट शब्दों में ‘पाकिस्तान’ की मांग रखी, जो मुस्लिम बहुल प्रांतों के लिए एक स्वतंत्र राजनीतिक इकाई थी। यह ‘द्विराष्ट्र सिद्धांत’ राजनीतिक रूपांतरण था, जिसमें मुसलमानों को एक अलग राष्ट्र की संज्ञा दी गई। राजनीतिक असहमति और सांप्रदायिक तनाव इसे बड़े विभाजन की ओर ले गए।

कांग्रेस और तुष्टीकरण नीति

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने अनेक अवसरों पर मुसलमानों के राजनीतिक अधिकारों को मान्यता दी। ब्रिटिश शासन ने 1909, 1919 और 1935 के अधिनियमों में मुस्लिमों को पृथक मताधिकार दिया, जिससे मुसलमानों को राजनीतिक रूप से अलग पहचान मिली। गांधीजी का खिलाफत आंदोलन (1919–1924) कथित तौर पर हिंदू-मुस्लिम एकता के उद्देश्य से था, लेकिन इसका परिणाम विवादास्पद रहा। इतिहासकारों का मत है कि इस दौरान केरल के मोपला में हिंदू विरोधी हिंसा गहरे मजहबी तुष्टीकरण का परिणाम थी। बहरहाल, गांधीजी के खिलाफत आंदोलन ने कांग्रेस को मुस्लिम समर्थन प्राप्त करने में मदद की, किंतु साथ ही इसने राष्ट्रवादी राजनीति में समझौतों और झुकाव का दौर खोला।

मुस्लिम लीग का आंदोलन और ‘डायरेक्ट एक्शन डे’

1940 से 1946 के बीच मुस्लिम लीग ने पाकिस्तान की मांग को अपना प्रमुख एजेंडा बनाया। 16 अगस्त, 1946 को मुस्लिम लीग ने ‘डायरेक्ट एक्शन डे’ घोषित किया, जिसके दौरान कोलकाता में व्यापक सांप्रदायिक हिंसा हुई, जिसमें हजारों लोग मारे गए। यह हिंसा केवल एक दंगा नहीं थी, बल्कि स्वतंत्र मुस्लिम राष्ट्र की मांग की खुली घोषणा थी।

पृथकतावाद और प्रतिक्रियाएं

वीर सावरकर ने स्पष्ट रूप में मुस्लिम पृथकतावाद का विरोध किया और भारत को सांस्कृतिक रूप से एक हिंदू राष्ट्र माना। उन्होंने कांग्रेस की नीतियों को कमजोर और राष्ट्रघाती बताया। सावरकर की अखंड भारत की संकल्पना उनके हिंदुत्व दर्शन का एक अभिन्न अंग थी। वे कहते थे कि भारत केवल एक भौगोलिक इकाई नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक और ऐतिहासिक सभ्यता थी, जिसका विस्तार हिमालय से हिंद महासागर तक और सिंधु नदी से बर्मा तक था। डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने भी मुस्लिम लीग के मंत्रिमंडल में शामिल होने से इनकार करते हुए कहा, ‘बंगाल में लीग का शासन हिंदू समुदाय के अंत का परिचायक होगा।’ उन्होंने यह बात बंगाल के विभाजन और मुस्लिम लीग की राजनीति के संदर्भ में कही थी, जब वे बंगाल के हिंदुओं की रक्षा के लिए काम कर रहे थे। उनका मानना था कि सांस्कृतिक रूप से हम सब एक हैं, मजहब के आधार पर विभाजन नहीं होना चाहिए। इन दोनों नेताओं ने भारतीय राष्ट्रवाद को सांस्कृतिक एकता पर आधारित देखा और मजहबी पृथकतावाद के प्रति चेतावनी दी।

गांधीजी, नेहरू और जिन्ना के बीच संवाद

1940 के दशक में गांधीजी और नेहरू ने जिन्ना से संवाद बनाए रखने का प्रयास किया। गांधीजी ने जिन्ना को सरकार में हिस्सेदारी देने की पहल की। नेहरू ने 1946 में कहा, कि ‘कोई पुराना समझौता स्वीकार्य नहीं’, जिससे राजनीतिक गतिरोध और बढ़ गया तथा मुस्लिम लीग ने ‘डायरेक्ट एक्शन डे’ की घोषणा की। यह दर्शाता है कि आसन्न सत्ता को लेकर गहराते राजनीतिक मतभेदों ने टकराव की शक्ल ले ली जिसकी परिणति बाद में लाखों लोगों की जान जाने के रूप में हुई।

भारतीय राष्ट्रवाद, सेक्युलरिज्म और तुष्टीकरण

भारतीय राष्ट्र की मूल भावना पंथ और समुदायों से ऊपर उठकर ‘एक भारत’ की अवधारणा पर आधारित थी। कांग्रेस दावा करती रही है कि वह सेक्युलरिज्म—निरपेक्ष नहीं, बल्कि समावेशी थी, जिसमें सभी मत—पंथों के लोगों को समान अधिकार देने की नीति थी। परंतु मुस्लिम हितों के सामने झुक जाने की प्रवृत्ति इतिहास से सिद्ध है। दूसरी ओर मुस्लिम लीग ने अपनी मांगों में भारत को ‘मातृभूमि’ के रूप में स्वीकारने से इनकार किया, अपना अलग राष्ट्र स्थापित करने की मांग की। राजनीतिक तुष्टीकरण के बजाय कांग्रेस को मजबूत सामूहिक राष्ट्रीय आधार पर जोर देना चाहिए था।

विभाजन-विभीषिका: ऐसे शुरू हुई साजिश, कांग्रेस ने टेक दिये थे घुटने; संघ ने हिंदुओं को मुस्लिम इलाकों से था निकाला

विभाजन के बाद का भारत

विभाजन के बाद रा.स्व.संघ तथा अन्य राष्ट्रवादी संगठनों ने सांस्कृतिक एकता पर जोर दिया और तुष्टीकरण की पुनरावृत्ति से बचने की वकालत की। सेकुलर, वामपंथी दृष्टिकोण तथा कांग्रेस की तुष्टीकरण नीति को अक्सर ‘वैचारिक पिलपिलेपन’ के रूप में देखा गया। विभाजन के पीछे मुस्लिम लीग की मांग और कांग्रेस की राजनीतिक कमजोरी, दोनों का योगदान था। आज जब मजहबी आधार पर राजनीति पुनः सक्रिय है, सी.ए.ए., एन.आर.सी. और समान नागरिक संहिता जैसे विवाद उभारे जा रहे हैं, तब 1947 की पृष्ठभूमि को याद रखना आवश्यक है। यह बताता है कि राष्ट्र की एकता आस्था से जुड़े पृथकतावाद या तुष्टीकरण की राजनीति से संभव नहीं, बल्कि मजबूत सांस्कृतिक और वैचारिक आधार पर ही कायम रह सकती है।

1947 का विभाजन भारतीय राष्ट्रवाद के परिदृश्य की एक कड़वी सीख है कि मजहबी अलगाववाद और तुष्टीकरण कभी स्थायी समाधान नहीं दे सकते। राष्ट्र का आधार समावेशी सांस्कृतिक और ऐतिहासिक पहचान होना चाहिए. जहां सभी समुदायों की समान भागीदारी हो। भारत को चाहिए कि वह अपने राष्ट्रपोषक सिद्धांतों को दृढ़ता से थामे और ऐसे अनुभवों से सीख लेकर भविष्य के लिए मजहबी सोच या नेतृत्व से समझौता न करे।

Topics: पाञ्चजन्य विशेषHindu Genocideमुस्लिम अलगाववादविभाजन की विभीषिकाIndia Pakistan Partition Storiesहिंदू नरसंहारreligious separatismMuslim appeasementfundamentalist challengehorrors of partitionMuslim separatismCommunal Politicsscenario of Indian nationalismDirect Action Dayडायरेक्ट एक्शन डे‘मुस्लिम तुष्टीकरण
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