पाकिस्तान और दीर्घकालिक सुरक्षा संकट : विभाजन का मोल
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होम भारत

पाकिस्तान और दीर्घकालिक सुरक्षा संकट : विभाजन का मोल

भारत के विभाजन के साथ, पाकिस्तान की स्थापना ने भारत के लिए न केवल जमीन को बांट दिया बल्कि दीर्घकालिक सुरक्षा संकट का द्वार खोला। मजहबी आधार पर बने उस देश का जनतंत्र स्थिर न रह सका। विभाजन से भारत को एक शत्रु-भाव वाला पड़ोसी मिला

Written byPanchjanyaPanchjanya
Aug 11, 2025, 07:02 pm IST
in भारत
भारत के विभाजन के दौरान भारत आ रही एक ट्रेन (फाइल फोटो)

भारत के विभाजन के दौरान भारत आ रही एक ट्रेन (फाइल फोटो)

उन्नीस साै चालीस के लाहौर प्रस्ताव से लेकर 1947 में अपने निर्माण तक, पाकिस्तान “द्विराष्ट्र सिद्धांत” पर चला यानी ‘मुस्लिम और हिंदू दो अलग-अलग राष्ट्र हैं जो साथ-साथ नहीं रह सकते’। पाकिस्तान का निर्माण इस्लामी पहचान के आधार पर हुआ, जबकि भारत के तत्कालीन नेतृत्व ने बिना इस विषय पर व्यापक चर्चा या जनप्रतिनिधियों के बीच सहमति के, स्थापना से जुड़े दर्द और भारत की आस्थागत सांस्कृतिक पहचान को ‘सेकुलरिज्म’ के फाहों से रूमानी ढंग से ढंकने का लगातार प्रयास किया। डॉ. आंबेडकर ने पाकिस्तान की मांग को एक मजहबी राष्ट्र की ओर झुकाव के रूप में देखा था। उनके अनुसार, ‘पाकिस्तान की नींव इस्लामी पहचान पर आधारित थी। यह सोच बहुलतावाद और पंथनिरपेक्षता के लिए खतरा थी।’ इसके विपरीत डॉ. आंबेडकर ने भारत को एक पंथनिरपेक्ष लोकतंत्र के रूप में देखा।

अक्तूबर 1947: पाकिस्तान की सेना ने कबाइली लश्करों के साथ मिलकर कश्मीर पर हमला किया। यह भारत और पाकिस्तान के बीच पहला युद्ध बना। तबसे युद्ध का वह सिलसिला आज तक जारी है। तत्कालीन कांग्रेस सरकार द्वारा कश्मीर मुद्दे को संयुक्त राष्ट्र में लेकर जाना, अनुच्छेद 370 और नियंत्रण रेखा-ये सब इसी सत्ता संघर्ष की देन हैं। पाञ्चजन्य के प्रथम संपादक और देश के पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेयी ने इसे “विचारधारा का रणक्षेत्र” कहा था। इसके बाद 1965, 1971 और 1999 के युद्धों ने इस संघर्ष को और तीव्र किया और पाकिस्तान की भारत-विरोधी नीति को उजागर किया।

1965: पाकिस्तान ने ऑपरेशन जिब्राल्टर के तहत कश्मीर में घुसपैठ कर युद्ध छेड़ा। भारत ने लाहौर तक घुसकर जवाबी हमला किया।
1971: पाकिस्तान की पूर्वी पाकिस्तान में बांग्लादेशियों पर बर्बरता, मानवाधिकारों के हनन के कारण भारत ने हस्तक्षेप किया। परिणाम यह हुआ कि पाकिस्तान का विभाजन हुआ और बांग्लादेश का जन्म हुआ।

विभाजन-विभीषिका: एक ऐतिहासिक त्रासदी थी भारत विभाजन…

1999 का कारगिल युद्ध: पाकिस्तान की सेना ने कारगिल की चोटियों पर घुसपैठ कर नियंत्रण रेखा पार की। कई चोटियों पर पाकिस्तानी सैनिक खोहों में बंकर बनाकर बैठ गए। इसके बाद भारत ने प्रखर सैन्य अभियान चलाकर इस युद्ध में विजय प्राप्त की। यह तब हुआ जब इससे पहले भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी बस लेकर लाहौर गए थे और दोनों देशों के बीच संबंध सुधारने की अपनी ओर से ईमानदार कोशिश कर रहे थे। लेकिन पाकिस्तान के तत्कालीन सेना प्रमुख जनरल मुशर्रफ ने वहां की नवाज सरकार को अपदस्थ कर कुर्सी कब्जाई और भारत पर युद्ध थोप दिया था।

विभाजन की दूसरी लहर: आतंकवाद 1980 के बाद से पाकिस्तान ने भारत के विरुद्ध ‘प्रॉक्सी वॉर’ शुरू कर दी। पंजाब में अलगाववादी सिख समूहों को हथियार और पैसा पकड़ाकर भारत राज्य के विरुद्ध खालिस्तान आंदोलन के नाम से हिंसक अराजकता फैलानी शुरू कर दी। पंजाब में हिन्दू और केशधारी सिखों के बीच नफरत के बीज बोए गए और हिन्दुओं की चुन-चुनकर हत्याएं की गईं। इसके बाद, जब ये समस्या हद से ज्यादा बढ़ी तो तत्कालीन इंदिरा सरकार ने आपरेशन ब्लू स्टार चलाया और स्वर्ण मंदिर जैसे पवित्र गुरुद्वारे में चौकियां बनाए बैठे हिंसक खालिस्तानी तत्वों को ठिकाने लगाया। इसी तरह पाकिस्तानी सेना की खुफिया एजेंसी आईएसआई ने कश्मीर में आतंकवाद काे हवा दी और भाड़े के जिहादी भेजकर 1980 का दशक खत्म होते तक वहां हिन्दुओं का जीना मुहाल कर दिया।

बर्बर हत्याकांड रचे गए और बड़ी संख्या में कश्मीर घाटी में पीढ़ियों से बसे कश्मीरी पंडितों को रातोंरात जान बचाने के लिए देश के अन्य भागों की ओर पलायन करना पड़ा। कश्मीर घाटी को हिन्दूविहीन बना दिया गया। जिहादियों की तूती बोलने लगी। लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं और संस्थानों को पंगु बना दिया गया। अनुच्छेद 370 की आड़ में हर तरह के भारत विरोधी काम होने लगे। आतंकवादी तत्व दिल्ली की सत्ता तक पर हावी होते गए और तत्कालीन कांग्रेसी सरकारों ने उन्हें खूब शह दी। लेकिन 2014 में दिल्ली में मोदी सरकार के गठन के बाद हालात पर धीरे धीरे काबू पाया जाने लगा। सैन्य और नागरिक स्तर पर कई प्रकार के कदम उठाए गए जिनसे स्थिति नियंत्रण में आने लगी। लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं और संस्थाओं को फिर से बलशाली बनाया गया और अगस्त 2019 में अनुच्छेद 370 हटने के बाद आज स्थिति लगभग नियंत्रण में है। केन्द्र सरकार की आतंकवाद के प्रति जीरो टॉलरेंस की नीति रंग ला रही है। आतंकवाद अंतिम सांस ले रहा है।

26/11, पठानकोट, पुलवामा आईएसआई और पाकिस्तानी सेना ने आतंकवादी संगठनों को प्रशिक्षण, हथियार और शरण दी। 26 नवंबर 2008 को लश्करे तैयबा के कराची से भेजे गए 10 जिहादियों ने मुम्बई में कई ठिकानों पर हमले करके 175 लोगों की जान ले ली। सुरक्षाबलों ने 9 जिहादियों को मार गिराया जबकि एक, अजमल कसाब जिंदा पकड़ा गया था, जिसे बाद में फांसी दी गई थी।

विभाजन-विभीषिका: ऐसे शुरू हुई साजिश, कांग्रेस ने टेक दिये थे घुटने; संघ ने हिंदुओं को मुस्लिम इलाकों से था निकाला

परमाणु हथियार और रणनीतिक अस्थिरता

1998 में भारत ने 11 और 13 मई को पोकरण में परमाणु परीक्षण किए, जिसके जवाब में पाकिस्तान ने भी परमाणु परीक्षण करके यह जताने की कोशिश की कि वह भी परमाणु सामर्थ्य रखता है। हालांकि उसका ऐसा करना उत्तर कोरिया, चीन के कथित सहयोग से संभव हो पाया था। इसके बाद से, हर युद्ध या संघर्ष में पाकिस्तान की ओर से परमाणु धमकी देना एक नियमित नफरती पैंतरा बन गया। पाकिस्तान ने “फुल स्पैक्ट्रम डेटेरेंस” की नीति अपनाई, वहीं भारत ने “पहले उपयोग नहीं” नीति पर कायम रहना चुना। परमाणु हथियारों के सहारे पाकिस्तान अक्सर आतंकवादी गतिविधियों को छिपाने का प्रयास करता है। जैसा कि भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोवल ने कहा है, ”पाकिस्तान की ‘फुल स्पैक्ट्रम डेटेरेंस’ नीति का उद्देश्य पारंपरिक युद्ध में भी परमाणु हथियारों की धमकी देना है। यह नीति आतंकवाद को एक रणनीतिक ढाल देती है, जिससे पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय दबाव से बचने की कोशिश करता है। भारत की ‘पहले उपयोग नहीं’ नीति ज़िम्मेदार और स्थिर है, जबकि पाकिस्तान की नीति अस्थिरता को बढ़ावा देती है।”

भारत की सुरक्षा नीति पर प्रभाव

भारत का सैन्य बजट, आंतरिक सुरक्षा, कूटनीति और वैश्विक रणनीति मोटे तौर पर पाकिस्तान केंद्रित ही रही है। कारण यह कि पाकिस्तान भारत का पड़ोसी तो है लेकिन अपने बनने के दिन से ही अच्छे पड़ोसी की बजाय शत्रुतापूर्ण सोच रखने वाला पड़ोसी है। भारत का सैन्य बजट सतत बढ़ता गया है। एनआईए का गठन हुआ। यूएपीए, एएफएसपीए जैसे कड़े कानून बनाए गए। सीमा सुरक्षा बल की निगरानी का विस्तार किया गया। संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तान के विरुद्ध लगातार प्रामाणिक जानकारी रखते हुए उसकी असलियत उजागर की जाती रही है। भारत अब केवल वार्ता नहीं, बल्कि प्रभावी रणनीति की भाषा बोलता है, जैसा कि 6 मई 2025 को विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने एक सम्मेलन में कहा भी कि, ‘मौजूदा वैश्विक अस्थिरता के बीच भारत की कूटनीति एक अहम भूमिका निभा रही है। भारत उन चुनिंदा देशों में शामिल है, जो एक साथ रूस-यूक्रेन, इस्राएल-ईरान, लोकतांत्रिक पश्चिम और ग्लोबल साउथ, ब्रिक्स और क्वाड के साथ संवाद कर सकता है। भारत ने 40 से अधिक समूहों में भाग लिया है या उन्हें शुरू किया है।’

भारत ने प्रखर सैन्य अभियान चलाकर कारगिल युद्ध में विजय प्राप्त की थी

कूटनीतिक मोर्चे पर संघर्ष

पाकिस्तान ने हमेशा कश्मीर को अंतरराष्ट्रीय मुद्दा बनाने की कोशिश की है। लेकिन उसे हर मंच पर अपना सा मुंह लेकर रह जाना पड़ा है। भारत की आक्रामक रणनीति और ठोस कूटनीति ने तथ्यों को सही परिप्रेक्ष्य में सामने रखा है। इसी का नतीजा है कि आज विभिन्न अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की साख बढ़ी है। 1972 में भारत ने इंदिरा सरकार के तहत शिमला समझौता करके 1971 की जीती बाजी हारी थी, वहीं लाहौर घोषणापत्र, सर्जिकल स्ट्राइक, बालाकोट एयरस्ट्राइक, सिंदूर ऑपरेशन, ऑपरेशन महादेव करके पाकिस्तान को उसकी असलियत दिखाई है।

भारत के लिए सबक

आज जब वैश्विक और क्षेत्रीय राजनीतिक परिदृश्य में तालिबान, चीन-पाकिस्तान गठजोड़ और आईएसआई के जिहादी नेटवर्क सक्रिय हैं, तब यह समझना आवश्यक है कि 1947 का विभाजन मात्र इतिहास नहीं, बल्कि मौजूदा रणनीतिक चुनौतियों की जड़ है। इसे समझते हुए भारत को सजग, सामर्थ्यपूर्ण एवं नैतिक राष्ट्रनीति अपनानी होगी। जब तक भारत इस विभाजन की वास्तविकता, कारणों और दीर्घकालिक प्रभावों को पूरी तरह नहीं समझेगा, तब तक इस सुरक्षा संकट से बाहर निकलना संभव नहीं। पाकिस्तान का जन्म भारत के विभाजन की बड़ी कीमत है, जो सम्पूर्ण उपमहाद्वीप के लिए दशकों से सुरक्षा और स्थिरता की बड़ी चुनौती है।

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