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विभाजन – विभीषिका : बिना जड़ों के नई शुरुआत

पाकिस्तान के मोंटगोमरी जिले के उपजाऊ मैदानों में बसे झक्केके गांव में रहते थे। वहीं, 1934 में मेरा जन्म हुआ। पिता किराने की छोटी-सी दुकान चलाते थे। मैं स्कूल नहीं गया, पिता के काम में हाथ बंटाता था। इसलिए कम उम्र में ही लोगों से व्यवहार और कारोबार करना सीख लिया

Written byPanchjanyaPanchjanya
Aug 12, 2025, 08:56 am IST
inभारत, विश्लेषण
दीवान चंद, मूल स्थान -मोंटगोमरी जिला

दीवान चंद, मूल स्थान -मोंटगोमरी जिला

हम पाकिस्तान के मोंटगोमरी जिले के उपजाऊ मैदानों में बसे झक्केके गांव में रहते थे। वहीं, 1934 में मेरा जन्म हुआ। पिता किराने की छोटी-सी दुकान चलाते थे। मैं स्कूल नहीं गया, पिता के काम में हाथ बंटाता था। इसलिए कम उम्र में ही लोगों से व्यवहार और कारोबार करना सीख लिया। हमारा गांव हिंदू और सिख बहुल था, पर कुछ मुस्लिम परिवार भी थे। पर्व-त्योहार पूरे समुदाय को एक साथ जोड़ते थे। लोग एक-दूसरे के सुख-दुख में शामिल होते थे।

1947 में मेरी उम्र केवल 13 वर्ष थी, जब यह सारी शांतिपूर्ण दुनिया अचानक टूट गई। विभाजन की तेज चर्चाओं के बीच दादाजी ने हमें आने वाले खतरे के प्रति सचेत किया था। आसपास के गांवों से हिंसा, विस्थापन और अराजकता की बातें आने लगी थीं। हमारा शांतिपूर्ण गांव अब डर, बेचैनी और अनिश्चितता से भर गया था। वे लोग जो पीढ़ियों से साथ रहते थे, अब अपने भविष्य को लेकर भयभीत थे।

 एक ऐतिहासिक त्रासदी थी भारत विभाजन…

गांव छोड़ने का फैसला कठिन था। हम ट्रक से कसूर स्टेशन गए और बठिंडा के लिए ट्रेन में सवार हुए। यह यात्रा बहुत भयावह, अव्यवस्थित और अनिश्चितताओं से भरी थी। सौभाग्य से हम बड़ी हिंसा से बच गए, लेकिन जब यहां पहुंचे तो सब कुछ खो चुके थे। हमारे न पैसे थे, न सामान और न ही वह जुड़ाव।

बठिंडा में हमने रिश्तेदारों के यहां शरण ली, जहां परिवार की ममता थी, लेकिन विस्थापन की कठिन हकीकत भी थी। न कोई स्थिर आमदनी थी, न जमीन। इसलिए नए जीवन की तलाश में बठिंडा से कुरुक्षेत्र, फिर रतिया मंडी और अंत में बुधलाडा गए। वह समय कठिनाइयों से भरा था। कई बार भोजन कम पड़ता, काम मिलना मुश्किल होता और उम्मीदें कमजोर पड़ जाती थीं। लेकिन हमने हार नहीं मानी।

जब हम अबोहर पहुंचे तो सरकार ने छोटा-सा भूखंड आवंटित किया। यह हमारे लिए पुनर्वास और आशा की पहली किरण थी। अथक परिश्रम से हमने उस सूखे और सुनसान भूखंड को घर और खेत में बदल दिया। विवाह के बाद दो बेटे और चार बेटियों ने मेरे संघर्ष और जुझारूपन की विरासत को संभाला। आज वे सभी आत्मनिर्भर हैं।

मैं अपनी यात्रा (झक्केके से अबोहर तक) को याद करता हूं, तो इसे केवल सीमाओं के पार जाना नहीं मानता, बल्कि यह भय से आशा और निराशा से पुनर्निर्माण की ओर एक यात्रा है। युवा पीढ़ी के लिए यही संदेश है कि शिक्षा को केवल रोजगार के लिए नहीं, बल्कि इतिहास, शासन और समाज की गहरी समझ विकसित करने के लिए महत्व दें।

Topics: विभाजन विभीषिकाVibhajan Vibhishikaपाञ्चजन्य विशेषPanchjanya SpecialTrue Stories of PartitionIndia Pakistan Partition StoriesHindus atrocities in Partitionभारत पाक बंटवारे की कहानीदीवान चंद
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