छत्रपति शिवाजी महाराज की पुत्रवधु वीरांगना ताराबाई भोंसले, औरंगजेब के मंसूबों को किया ध्वस्त, सशरीर दक्षिण में गाड़ा
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छत्रपति शिवाजी महाराज की पुत्रवधु वीरांगना ताराबाई भोंसले, औरंगजेब के मंसूबों को किया ध्वस्त, सशरीर दक्षिण में गाड़ा

वीरांगना ताराबाई ने क्रूर मुगल आक्रांता औरंगजेब के साथ भयानक जंग लड़ी। उन्होंने औरंगजेब के मराठा साम्राज्य को ध्वस्त करने के सपने को न केवल चकनाचूर किया वरन् वहीं दक्षिण में औरंगजेब को भी सशरीर गाड़ दिया।

Written byडॉ. आनंद सिंह राणाडॉ. आनंद सिंह राणा
Mar 4, 2025, 09:39 am IST
inभारत
वीरांगना ताराबाई भोंसले

वीरांगना ताराबाई भोंसले

छत्रपति शिवाजी महाराज की पुत्रवधु, छत्रपति राजाराम की धर्मपत्नी ताराबाई भोंसले न केवल भारत वरन् विश्व की अद्भुत एवं अद्वितीय वीरांगना हैं। उन्होंने पति छत्रपति राजाराम की असामयिक मृत्यु के उपरांत सन् 1700 से सन् 1707 तक मराठा साम्राज्य की संरक्षिका बनकर अपनी रणनीति और कूटनीति से क्रूर मुगल आक्रांता औरंगजेब के साथ भयानक जंग लड़ी और औरंगजेब के मराठा साम्राज्य को ध्वस्त करने के सपने को न केवल चकनाचूर किया वरन् वहीं दक्षिण में औरंगजेब को भी सशरीर गाड़ दिया।

छत्रपति सम्भाजी को औरंगजेब ने छलपूर्वक पकड़ा था। औरंगजेब ने सम्भाजी को बलात् इस्लाम कबूल करने के लिए भीषण यातनाएं दी परंतु सफल नहीं हो सका। इसलिए सम्भाजी की जघन्य हत्या कर दी गई। इस तरह स्व के लिए सम्भाजी की पूर्णाहुति हुई थी। सम्भाजी के छोटे भाई राजाराम को छत्रपति बनाया गया। इसके साथ ही मुगलों के विरुद्ध सन् 1689 में स्वतंत्रता संग्राम का उद्घोष हुआ। परंतु दुर्भाग्यवश 1700 में छत्रपति राजाराम का देहावसान हो गया। ऐसी विपरीत परिस्थितियों में चार वर्षीय पुत्र शिवाजी द्वितीय को उत्तराधिकारी बनाकर वीरांगना ताराबाई ने एक संरक्षक परिषद् बनाई और स्वयं उसकी अध्यक्षता ग्रहण की।

महाराष्ट्र में सर्वोच्च सत्ता, अधिकार और निर्देश ताराबाई के हाथों में थे। उन्होंने स्वयं अपना मंत्रिमंडल बनाया जिसमें रामचंद्र नीलकंठ को आमात्य धन्नाजी जाधव को सेनापति, परशुराम त्रयंबक को सेनापति और शंकर जी नारायण को सचिव नियुक्त किया गया। दूसरी ओर राजाराम की मृत्यु का संदेश सुनकर औरंगजेब अत्यधिक प्रसन्न हुआ और उसने अपने शिविर में नौबतें बजवाकर आनंद उत्सव मनाया। उसके सैनिकों और सेनानायकों ने एक-दूसरे को परस्पर बधाइयां दीं परंतु यह सब औरंगजेब का भ्रम था। ताराबाई ने सेना और प्रशासन का योग्यता दक्षता और दृढ़ता से संचालन किया और औरंगजेब की सेनाओं के आक्रमणों का कड़ा मुकाबला ही नहीं किया अपितु मुगल इलाकों में प्रत्याक्रमण कर नेस्तनाबूद भी किया। ताराबाई के नेतृत्व मुगलों के विरुद्ध स्वतंत्रता संग्राम और भी भयानक हो गया था।

ताराबाई के संचालन संगठन और नेतृत्व में मुगलों के विरुद्ध मराठों के सैनिक अभियान और अधिक तीव्र हो गए। राजाराम की मृत्यु से मराठों के आक्रमणों में कोई कमी नहीं आई अपितु आक्रमण राजाराम के शासनकाल की अपेक्षा अधिक तीव्र आकस्मिक और व्यापक हो गए। ताराबाई मुगलों के विरुद्ध सैनिक आक्रमणों को कैसे आयोजित करती थीं और इसके लिए अपने अधिकारियों को किस प्रकार प्रोत्साहित करती थीं। 17 नवंबर 1700 को कान्हो जी जुझारराव को लिखे हुए पत्र से इसका पता चलता है। इसमें कान्हो जी को लिखा कि वह शीघ्र मल्हारराव से जो सिद्धियों के विरुद्ध 7000 सैनिकों के साथ भेजा गया है जाकर मिल जाएं। इसी प्रकार जनवरी 1702 में ऐसा ही एक पत्र प्रतापराव मोरे को लिखा गया था। उसमें संताजी पांघरे की उनके द्वारा मलकापुर के समीप मुगलों की सैनिक चौकी पर अधिकार कर लेने के लिए प्रशंसा की है और मुगलों को निरंतर परेशान करने के लिए प्रोत्साहित किया है, जिससे मुगल विशालगढ़ और अन्य मराठा दुर्गों के विरुद्ध सफलतापूर्वक कार्यवाही नहीं कर सकें। उन्होंने औरंगजेब को विश्वासघाती, षड्यंत्री और कुचक्री बताया है और प्रतापराव को हिदायत दी है कि वह औरंगजेब की विरुद्ध सदैव सतर्क रहें।

वीरांगना ताराबाई के नेतृत्व में मराठों के सेनानायक एवं सेना दक्षिण के सभी मुगल इलाकों में फैल गई और मुगल प्रदेशों में सर्वत्र तहलका मचाया तथा मुगल सैनिक टुकड़ियों को परास्त कर दिया। अगस्त 1700 में हनुमंतराव निंबालकर ने खटाव जिला मुगलों से छीन लिया और राणो जी घोरपड़े ने बागेबाड़ी और इन्दी के समृद्ध प्रदेश मुगलों से जीतकर अपने अधिकार में कर लिए। महाराष्ट्र में मुगल सैनिकों के दबाव को कम करने के लिए मराठों ने खानदेश व बरार में मालवा में उज्जैन, मंदसौर और सिरोंज तक तथा गुजरात में अहमदाबाद की सीमा तक हमले किए और धन हस्तगत किया। इसका कुप्रभाव मुगलों की सुरक्षात्मक कार्रवाई के ऊपर पड़ा और सैनिक शक्ति क्षीण हो गई। दुर्गों में नियुक्त मुगलों के सुरक्षा सैनिक दल भी दुर्बल हो गए। मराठों ने परशुराम त्रयंबक के नेतृत्व में बसंतगढ़, पन्हाला, पवन गढ़ और सन् 1704 में अन्नाजी पंत की वीरता और दुस्साहस से सतारा दुर्ग मुगलों से जीत लिए।

सचिव शंकर जी नारायण के कठिन प्रयासों से मराठों ने सिंहगढ़, राजगढ़, रोहिड़ा और अन्य कुछ दुर्ग भी हस्तगत कर लिए। सन् 1705 में मराठों ने जनवरी में लोहगढ़ और जून में राजमाची और जुलाई में कोण्डना दुर्ग भी मुगलों से जीतकर अपने अधिकार में ले लिया। अब ताराबाई ने पन्हाला में पुनः अपने राज्य का मुख्य कार्यालय स्थानांतरित कर दिया और वहीं से शासन करने लगीं। सन् 1707 में धन्नाजी जाधव ने पूना और चाकन को भी मुगलों से छीन लिया। सन् 1706 में औरंगजेब सेना सहित लौटकर अहमदनगर में अपने शिविर में था तब धनाजी जाधव, नेमोजी शिंदे, दादू मल्हार व रंभा निंबालकर के नेतृत्व में एक बहुत बड़ी सेना उसके डेरे से 6 किलोमीटर दूरी तक आ पहुंची और बड़ी घमासान खूनी लड़ाई के बाद वहां से हटी। इस प्रकार ताराबाई के नेतृत्व में उसके सेनापतियों ने 7 वर्ष की अवधि में साधन संपन्न शक्तिशाली मुगल साम्राज्य और उसकी सत्ता को लुंज-पुंज ही नहीं किया अपितु एक नवीन राज्य निर्मित किया एवं एक नवीन महत्तर महाराष्ट्र को पुनर्जीवित किया।

7 वर्ष के इस स्वतंत्रता संग्राम में मराठों में साहसिक वीरता, उत्कृष्ट सहनशीलता, घोर निराशा में आशा की भावना, आत्मविश्वास, उच्च आदर्शों के प्रति निष्ठा श्रेष्ठ सैनिक नैतिक बल, आत्म बलिदान, राष्ट्रीय और देशप्रेम की उत्कृष्ट भावना जैंसे गुण विकसित किए और इससे वे इतने शक्तिशाली हो गए कि आगामी 3 पीढ़ियों में वे उत्तरी भारत में विजेता के रूप में पहुंच गए। वीरांगना ताराबाई ने औरंगजेब की मानसिक और शारीरिक अवस्था पर भयानक आघात किया और इस स्वतंत्रता संग्राम ने ऐसा भीषण विकराल रूप धारण किया कि दक्षिण में उन्होंने औरंगजेब और उसके साम्राज्य दोनों को ही क्षत-विक्षत कर समाप्त कर दिया। दक्षिण में ही तथाकथित बादशाह और साम्राज्य दोनों की मज़ार बनी।

Topics: छत्रपति शिवाजी महाराजऔरंगजेबपाञ्चजन्य विशेषछत्रपति राजारामताराबाई भोंसले
डॉ. आनंद सिंह राणा
डॉ. आनंद सिंह राणा
'स्व ' के आलोक में भारत के निर्माण और और स्वाधीनता संग्राम के इतिहास में उपेक्षित महान् जनजातीय नायकों,महारथियों और वीरांगनाओं का इतिहास लेखन। प्रकाशन एवं वृत्तचित्र - महाकौशल में स्वाधीनता आंदोलन तथा क्षेत्र की सामाजिक एवं आर्थिक संरचना,म. प्र. में समाज सुधार के विकास का एक विवेचनात्मक अध्ययन : समाचार पत्रों के योगदान के विशेष संदर्भ में, महाकौशल की जनजातियों का सामाजिक , सांस्कृतिक एवं वैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य, सामाजिक समरसता सूत्र, महाकौशल में स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास, चित्रोत्पला त्रैमासिक शोध पत्रिका, भारत का स्वाधीनता संग्राम : महाकौशल, बुंदेलखंड और बघेलखंड प्रांत के संदर्भ में (संदृश्य प्रलेख), म. प्र. शासन जन संपर्क विभाग, स्वदेश समाचार पत्र समूह, विश्व संवाद केंद्र, नई दुनिया, पत्रिका दैनिक भास्कर,पद्मावती एक्सप्रेस आदि समाचार पत्रों में शोध आलेखों का अनवरत प्रकाशन। शोध पत्रिकाओं के साथ सोशल मीडिया के अन्य माध्यमों से शोध आलेखों का प्रकाशन एवं प्रसारण। स्वातंत्र्य समर में महाकौशल की जनजातियों का अवदान और जबलपुर समग्र प्रकाशनाधीन हैं।भारतीय ऐतिहासिक और पौराणिक महत्व के विषयों के साथ स्वाधीनता संग्राम के जनजातीय महारथियों पर विविध चैनलों के माध्यम से 20 से भी अधिक दस्तावेजी वृत्तचित्र (डाक्यूमेंट्री फिल्म) का निर्माण। शोध उपागम - अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना के मार्गदर्शन में 500 से भी अधिक मौलिक शोध आलेख। भारतीय इतिहास, धर्म - दर्शन और संस्कृति के आध्यात्मिक, वैज्ञानिक तथा मनोसामाजिक पहलुओं के प्रति वामियों, मिशनरियों, पश्चिमी विद्वानों, मुस्लिम लेखकों, और तथाकथित सेक्यूलरों के पूर्वाग्रही मत प्रवाह को प्रामाणिकता के आधार खंडित कर वास्तविक मत प्रवाह को प्रस्तुत करने हेतु विविध आयामों में शोधपरक लेखन। भारतीय स्वाधीनता संग्राम और उसके उपरांत 'स्व' के आलोक शोधपरक लेखन। भारतीय संस्कृति के मूलाधार जनजाति कुटुम्ब के विरुद्ध वामियों,मिशनरियों तथाकथित सेक्यूलरों और मुस्लिम लेखकों के द्वारा फैलाए गए वितंडावाद और मंतातरण के कुत्सित षड्यंत्र के विरुद्ध शोधपरक लेखन। शिक्षा - बी. एस-सी, एम. ए.(इतिहास),पी-एच.डी., एल-एल.बी.। संप्रति - प्रो. एवं विभागाध्यक्ष, इतिहास विभाग(30वर्ष अध्यापन का अनुभव )श्रीजानकीरमण कला एवं वाणिज्य महाविद्यालय एवं उपाध्यक्ष इतिहास संकलन समिति महाकौशल प्रांत। जिला संगठक राष्ट्रीय सेवा योजना, जबलपुर (म.प्र.) [Read more]
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