बांग्लादेशी घुसपैठ के कारण वनवासी समाज के अस्तित्व पर संकट : चंपाई सोरेन
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बांग्लादेशी घुसपैठ के कारण वनवासी समाज के अस्तित्व पर संकट : चंपाई सोरेन

चंपाई सोरेन ने कहा कि संथाल परगना के दर्जनों गांव ऐसे हैं, जहां अब वनवासी परिवार नहीं मिलते

Written byShivam DixitShivam Dixit
Sep 5, 2024, 09:57 pm IST
in भारत, झारखण्‍ड

रांची । झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री चंपाई सोरेन ने एक बार फिर राज्य में बांग्लादेशी घुसपैठ को लेकर गहरी चिंता व्यक्त की है। विशेष रूप से संथाल परगना क्षेत्र में हो रही बांग्लादेशी घुसपैठ के कारण वनवासी समाज के अस्तित्व पर गंभीर संकट उत्पन्न हो गया है। गुरुवार को सोशल मीडिया के माध्यम से चंपाई सोरेन ने संथाल परगना के कई गांवों में वनवासी समाज के समाप्त हो जाने पर सवाल उठाया।

चंपाई सोरेन ने कहा कि संथाल परगना के दर्जनों गांव ऐसे हैं, जहां अब वनवासी परिवार नहीं मिलते। उन्होंने उदाहरण के तौर पर पाकुड़ जिले के जिकरहट्टी गांव का संथाली टोला का उल्लेख किया, जहां अब एक भी संथाल परिवार नहीं रहता। इसी तरह मालपहाड़िया गांव में आदिम जनजाति का कोई भी सदस्य नहीं बचा है। चंपाई ने सवाल उठाया कि आखिर इन भूमिपुत्रों का क्या हुआ? उनके घरों और जमीनों पर अब किसका कब्जा हो गया?

उन्होंने बरहेट के गिलहा गांव की एक घटना का भी जिक्र किया, जहां एक वनवासी परिवार की जमीन पर जबरन कब्रिस्तान बनाया गया। इस तरह की घटनाएं संथाल परगना के कई क्षेत्रों में हो रही हैं। चंपाई सोरेन ने वीर भूमि भोगनाडीह और उसके आसपास के क्षेत्रों में वनवासी परिवारों की संख्या घटने पर चिंता जताई।

घुसपैठ से वनवासियों की जमीनों पर कब्जा

सोरेन ने कहा कि वीर सिदो-कान्हू और तिलका मांझी जैसे महान वनवासी नेताओं ने जल, जंगल और जमीन की लड़ाई में विदेशी अंग्रेजों के सामने कभी घुटने नहीं टेके, लेकिन आज उनके वंशजों की जमीनों पर घुसपैठिए कब्जा कर रहे हैं। उन्होंने वनवासी समाज की माताओं, बहनों और बेटियों की सुरक्षा को लेकर भी चिंता जाहिर की।

चंपाई सोरेन ने कहा कि यह घुसपैठ का मुद्दा उनके लिए राजनैतिक नहीं, बल्कि सामाजिक मुद्दा है। उन्होंने कहा कि यदि हम इस पर खामोश रहे, तो आने वाली पीढ़ियां हमें कभी माफ नहीं करेंगी। उन्होंने वनवासी समाज को संगठित होने और इस गंभीर समस्या के खिलाफ आवाज उठाने का आह्वान किया।

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Shivam Dixit
Shivam Dixit
अनुभवी भारतीय पत्रकार, मीडिया एवं सोशल मीडिया विशेषज्ञ, राष्ट्रीय स्तर के पुरस्कार विजेता, और डिजिटल रणनीतिकार। वर्ष 2015 में पत्रकारिता की शुरुआत। प्रिंट, TV और डिजिटल मीडिया संस्थानों में विभिन्न भूमिकाओं में कार्य किया। भारत की प्रथम SMS समाचार एजेंसी "न्यूज़ नेटवर्क ऑफ इंडिया" (NNI) में रिपोर्टर कोऑर्डिनेटर के रूप में काम किया, डिजिटल मीडिया के अनोखे प्रोजेक्ट "इंडियाज़ पेपर" का नेतृत्व करते हुए 500 समाचार वेबसाइटों का प्रबंधन किया। भारत के अलग अलग राज्यों के लगभग 1000 स्थानीय पत्रकारों से जुड़ा यह प्रोजेक्ट "लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स" में दर्ज है। वर्ष 2022 से राष्ट्रीय साप्ताहिक पत्रिका पाञ्चजन्य (1948 में स्थापित) में उपसंपादक के रूप में कार्यरत हैं। शिवम् की पत्रकारिता में राष्ट्रीयता, सामाजिक मुद्दों और तथ्यपरक रिपोर्टिंग पर जोर रहा है। उनकी कई रिपोर्ट्स, जैसे- नूंह (मेवात) हिंसा, हल्द्वानी वनभूलपुरा हिंसा, जम्मू-कश्मीर पर "बदलता कश्मीर", "नए भारत का नया कश्मीर", "370 के बाद कश्मीर", "टेररिज्म से टूरिज्म", और अयोध्या राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा से पहले के बदलाव जैसे "कितनी बदली अयोध्या", "अयोध्या का विकास", और "अयोध्या का अर्थ चक्र", कई राष्ट्रीय मंचों पर सराही गई हैं। उपलब्धियों में देवऋषि नारद पत्रकार सम्मान (2023) शामिल है, जिसे उन्होंने जहांगीरपुरी हिंसा के मुख्य आरोपी "अंसार खान" की साजिश को उजागर करने के लिए प्राप्त किया। [Read more]
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