नई दिल्ली। राजधानी दिल्ली के जंतर-मंतर (Jantar Mantar) पर कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के नेतृत्व में हुए प्रदर्शन को लेकर एक बड़ा विवाद खड़ा हो गया है. आरोप है कि इस आंदोलन को ‘स्वतःस्फूर्त छात्र क्रांति’ या ‘Gen-Z उथल-पुथल’ का रूप दिया जा रहा था, जबकि इसके पीछे विदेश से भारी-भरकम वित्तीय प्रायोजन (Foreign Funding) और सुनियोजित लामबंदी शामिल थी.
विवाद के केंद्र में दुबई स्थित ‘एब्रेको फ्रेट’ (Abreco Freight) के मालिक और केरल मूल के कारोबारी मोहम्मद शाजी मडथिल (शाजी निलंबुर) हैं. आरोप है कि शाजी ने अपने दुबई ऑफिस से 23 मलयाली कर्मचारियों की एक टीम को हवाई टिकट, भोजन, फाइव-स्टार ठहराव और अतिरिक्त भत्ते देकर दिल्ली के प्रदर्शन स्थल पर भेजा था.
गृह मंत्रालय (MHA) पहुंचा मामला; केंद्रीय एजेंसियों से निष्पक्ष जांच की मांग
इस पूरे घटनाक्रम के सामने आने के बाद मोहम्मद शाजी निलंबुर मडथिल के खिलाफ गृह मंत्रालय (Ministry of Home Affairs) में एक औपचारिक शिकायत दर्ज कराई गई है.
शिकायत में आरोप लगाया गया है कि भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा, कानून-व्यवस्था और केंद्र सरकार की नीतियों के खिलाफ माहौल बनाने के लिए ऑफशोर (विदेश स्थित) वित्तीय संसाधनों का इस्तेमाल किया गया है.
याचिकाकर्ताओं ने इस मामले में राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA), प्रवर्तन निदेशालय (ED), गंभीर धोखाधड़ी जांच कार्यालय (SFIO) और इंटेलिजेंस ब्यूरो (IB) से बहु-एजेंसी जांच की मांग की है.
दुबाई कनेक्शन और फंडिंग से जुड़े मुख्य सवाल:
- ‘भारत पैकेज’ और प्रायोजित यात्रा: इरशाद, अनफस और टोयो के नेतृत्व में आए 23 कर्मचारियों के हवाई टिकट, रहने-खाने और दैनिक भत्तों का पूरा खर्च कंपनी द्वारा उठाया गया.
- वित्तीय क्षमता पर संदेह: रिपोर्टों के अनुसार, शाजी मडथिल का पृष्ठभूमि रिकॉर्ड बहुत अमीर कारोबारी का नहीं रहा है और दुबई में उन पर चेक बाउंस व धोखाधड़ी के कई मामले दर्ज हैं. ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या यह पैसा उनका अपना था या किसी बाहरी अंतरराष्ट्रीय संगठन का?
- नागरिकता संशोधन कानून (CAA) विरोधी प्रदर्शनों जैसी पटकथा: सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि 2019-20 के शाहीन बाग आंदोलनों की तर्ज पर ही विदेशी खातों और संस्थाओं से फंड ट्रांसफर कर इस विरोध प्रदर्शन को हवा दी गई.
“यह स्वतःस्फूर्त आंदोलन नहीं, सुनियोजित साजिश”
राजनीतिक विश्लेषकों कि माने तो संयुक्त अरब अमीरात (UAE), अमेरिका और कनाडा से जुड़े संभावित लिंक इस बात की ओर इशारा करते हैं कि यह आंदोलन साधारण छात्र विरोध नहीं था.
“एक कर्मचारी जो अपनी मर्जी से छुट्टी लेकर किसी कारण के समर्थन में आता है, वह उसकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता है। लेकिन जब एक विदेशी नियोक्ता हवाई जहाज का टिकट, होटल, खाना और रुकने की अवधि खुद तय करके कर्मचारियों का जत्था भेजता है, तो यह ‘स्वतःस्फूर्त जन-आंदोलन’ नहीं बल्कि एक सुनियोजित प्रायोजित गतिविधि है।”
क्या केवल 23 कर्मचारी थे या आंकड़ा इससे भी बड़ा है?
क्या शाजी निलंबुर ने केवल 23 कर्मचारियों को ही स्पॉन्सर किया था या फिर केरल से आए अन्य समूहों, सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स और प्रमुख हस्तियों को भी इसी रूट से वित्तीय मदद पहुंचाई गई थी. यह तो जांच के बाद ही स्पष्ट हो पाएगा.
फिलहाल तो 23 कर्मचारियों का जंतर-मंतर पर मनाए गए “जश्न” का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद इसके पीछे काम कर रहे अंतरराष्ट्रीय इस्लामी वित्त संगठनों के संभावित संबंधों की पड़ताल की आवश्यकता है.











