“बुझने से पहले लौ तेजी से फड़फड़ाती है” – यह कहावत आज के वामपंथी संगठनों पर बिल्कुल सटीक बैठती है। जैसे-जैसे दुनिया को पता चल रहा है कि वामपंथी विचारधारा ने मानवता को कितनी उथल-पुथल और अराजकता में धकेला है, लोग इससे दूर हो रहे हैं। वामपंथी चरमपंथियों और इनके संगठनों का असर कम हो रहा है। अपनी अहमियत बनाए रखने की हताशा में वे अशांति फैलाने और सामाजिक नियमों को तोड़ने की कोशिश करते हैं। सालों से वामपंथी विचारधाराओं के कारण दुनिया भर में लाखों लोगों की जान गई है।
भारत में उनका असर कम हो रहा है और उनके खत्म होने का खतरा है। ये समूह – ग्लोबल मार्केट की ताकतों और हिंदुओं का ईसाई मत में मतांतरण कराने वाले कुछ मिशनरियों के साथ मिलकर – नेपाल, बांग्लादेश और श्रीलंका जैसी अराजकता फैलाने के लिए स्थानीय तत्वों के साथ मिल रहे हैं। वे जानते हैं कि भारत के युवाओं को निशाना बनाकर – जो आबादी का एक बड़ा हिस्सा हैं – अशांति फैलाई जा सकती है, जिससे समाज और देश दोनों अस्थिर हो सकते हैं।
एक जाने-माने अराजकतावादी, जो ‘इंडिया अगेंस्ट करप्शन’ आंदोलन के दौरान चर्चा में आए थे, वे हमारे संविधान के मूल सिद्धांतों के खिलाफ विरोध और गैर-कानूनी व्यवहार को बढ़ावा देने के लिए समुदायों के बीच अविश्वास पैदा कर रहे हैं। इस बार, वे और कट्टरपंथी वामपंथियों और इस्लामी कट्टरपंथियों की उनकी टीम हिंसा भड़काने के लिए NEET पेपर लीक के मुद्दे का इस्तेमाल करके छात्रों को बरगला रही है।
अगर प्रदर्शनकारी सच में शिक्षा में सुधार और छात्रों की भलाई को लेकर चिंतित हैं, तो उन्हें मोदी सरकार द्वारा शुरू की गई राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 को लागू करने पर ध्यान देना चाहिए। यह नीति, जिसे इसरो के पूर्व प्रमुख स्वर्गीय श्री कस्तूरीरंगन और विशेषज्ञों की एक टीम के मार्गदर्शन में तैयार किया गया था, शिक्षा प्रणाली की चुनौतियों का समाधान देती है। विरोध करने के बजाय, उन्हें इस नीति को लागू करने में शिक्षण संस्थानों और राज्य सरकारों की तरफ से की जा रही कोताही पर बात करनी चाहिए और भविष्य में पेपर लीक को रोकने के उपाय भी सुझाने चाहिए। अगर उनकी नीयत साफ होती, तो वे पेपर लीक की पिछली घटनाओं और अलग-अलग राज्यों में चल रही समस्याओं के बारे में चिंता जताते।
कथित छात्र समर्थकों का मकसद क्या था ?
इस एजेंडे के मकसद अलग थे; इन तथाकथित छात्र समर्थकों का मकसद सरकार और अन्य संवैधानिक संस्थाओं को कमजोर करना, जनता के मन में डर पैदा करना और देश की अंतरराष्ट्रीय छवि को खराब करना था। यह साफ था कि ध्यान हिंदू धर्म और हिंदू संस्कृति पर था, जैसा कि मंच से और प्रदर्शनकारियों द्वारा हिंदू देवी-देवताओं और परंपराओं पर किए गए हमलों से देखा जा सकता है। आतंकवाद और पाकिस्तान का समर्थन करने वाले तथा “भारत को तोड़ने” का आह्वान करने वाले प्रदर्शनकारियों के नारे उनके असली इरादों को और भी साफ़ करते हैं। कोई सच में कैसे मान सकता है कि यह विरोध प्रदर्शन शैक्षिक सुधारों के लिए आयोजित किया गया था?
सकारात्मक बदलावों से युवाओं को हो रहा फायदा
एक देश के तौर पर हम तेजी से आर्थिक तरक्की कर रहे हैं। प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में, पिछले 12 वर्षों में हमारी अर्थव्यवस्था 1.7 ट्रिलियन डॉलर से बढ़कर 4.2 ट्रिलियन डॉलर हो गई है। हम अंतरिक्ष, रक्षा और खिलौना बनाने जैसे कई क्षेत्रों में आगे बढ़ रहे हैं। विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (FDI) बढ़ रहा है और स्टार्टअप्स व यूनिकॉर्न की संख्या में भी बढ़ोतरी हो रही है। यूरोपियन काउंसिल और दूसरे देशों के साथ मुक्त व्यापार करार हमारी विकासगाथा को और बढ़ाएंगे। मूलभूत सुविधाओ का विकास तेज़ी से हो रहा है। जब ऐसे सकारात्मक बदलावों से हमारे युवाओं को फ़ायदा हो रहा है, तो ये विरोध-प्रदर्शन देश के लिए कैसे फ़ायदेमंद हो सकते हैं? असल में, घरेलू और विदेशी दोनों तरह के निवेशक ऐसी उथल-पुथल को अपने निवेश के लिए खतरा मानते हैं। अशांति होने पर निवेशकों, बुद्धिजीवियों और अरबपतियों की चिंताएं बढ़ जाती हैं, जिससे वे अक्सर अपने वित्तीय निवेश पर दोबारा सोचने और देश छोड़ने तक का फैसला कर सकते हैं। कोई यह कैसे कह सकता है कि यह हमारे युवाओं या ‘जेनरेशन Z’ के लिए फ़ायदेमंद होगा?
एफसीआरए भी विरोध की बड़ी वजह
‘फ़ॉरेन कॉन्ट्रिब्यूशन रेगुलेशन एक्ट’ (FCRA) ने उन ताकतों को भी नाराज़ किया है जो “भारत को तोड़ने” की कोशिश कर रही हैं और उन राजनीतिक दलों को भी जो हिंदुओं का ईसाई और इस्लाम में मतांतरित कराने का समर्थन करते हैं। विरोध-प्रदर्शनों के पीछे यह भी एक वजह हो सकती है। विपक्षी दल महिलाओं की तरक्की में मदद करने वाले कदमों, जैसे ‘महिला आरक्षण बिल’ और ‘परिसीमन बिल’, का साफ़ तौर पर विरोध कर रहे हैं। वे छात्रों की चिंता का बहाना बनाकर संसद की कार्यवाही में बाधा डालते हैं और इन ज़रूरी बिलों को पास होने से रोकते हैं।
भारतीय होने के नाते, हमारे लिए यह समझना बहुत ज़रूरी है कि कुछ मुद्दों के पीछे असल मकसद क्या है और हम सोशल मीडिया एल्गोरिद्म और भ्रामक पोस्ट से गुमराह न हों। हमें मामलों को भावनाओं के बजाय तर्क के साथ देखना चाहिए, क्योंकि हमारे किसानों, महिलाओं, छात्रों और युवाओं की भावनाओं का अक्सर देश को कमज़ोर करने के लिए फायदा उठाया जाता है। इसलिए, “राष्ट्र सर्वोपरि” की सोच अपनाना ज़रूरी है ताकि राष्ट्रीय हितों से कोई समझौता न हो।
असामाजिक तत्व क्यों हुए शामिल?
यह चिंता की बात है जब अच्छे मकसद के लिए किए गए विरोध-प्रदर्शन हिंसक हो जाते हैं। अगर मकसद सच में अच्छा था, तो 2,800 से ज़्यादा असामाजिक तत्व इसमें क्यों शामिल थे? उन्होंने महिला पुलिस अधिकारियों समेत पुलिस वालों, आम नागरिकों और उनकी गाड़ियों पर हमला किया और प्रधानमंत्री के ख़िलाफ़ अपशब्द कहे। इन उपद्रवियों का मकसद सरकार को डराना था; उन्होंने धमकी दी कि अगर उनकी मांगें नहीं मानी गईं तो वे संविधान के खिलाफ कदम उठाएंगे। हैरानी की बात यह है कि विरोध-प्रदर्शन के नेता अब इन असामाजिक लोगों के ख़िलाफ़ दर्ज पुलिस केस वापस लेने की मांग कर रहे हैं। हमारे देश के खिलाफ रची जा रही नुकसानदेह साजिशों को पहचानना बहुत जरूरी है।
हम भविष्य में ऐसे और भी विरोध-प्रदर्शनों और गतिविधियों की उम्मीद कर सकते हैं जो सामाजिक व्यवस्था और राष्ट्रीय एकता, दोनों को चुनौती देंगी। इस तरह की अशांति के पीछे मुख्य कारण यह है कि कुछ विपक्षी पार्टियां, कुछ एनजीओ और देश में गड़बड़ी फैलाने वाली ताकतें नहीं चाहतीं कि प्रधानमंत्री मोदी और एनडीए 2029 का आम चुनाव जीतें। वे मोदी और एनडीए को सत्ता से दूर रखने के लिए राष्ट्रीय हितों की परवाह किए बिना तरह-तरह के हथकंडे अपनाएंगे।
‘जेनरेशन Z’ रहे सतर्क
खासकर, हमारी ‘जेनरेशन Z’ को सतर्क रहना चाहिए। हमें इंस्टाग्राम या दूसरे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर दिखने वाली किसी भी भावनात्मक या भारत-विरोधी गतिविधि पर बिना सच्चाई और उसके पीछे के मकसद को जाने आँख बंद करके भरोसा नहीं करना चाहिए। सभी देशों को चुनौतियों का सामना करना पड़ता है, जिनमें अमेरिका और चीन जैसे विकसित देश भी शामिल हैं, लेकिन असली बात यह है कि सरकार और समाज मिलकर इन मुद्दों का सही समाधान कैसे निकालते हैं। ‘जेनरेशन Z’ के बहुत से लोग इस बात से सहमत होंगे कि नरेंद्र मोदी ऐसे प्रधानमंत्री हैं जो अपना हर पल नागरिकों की भलाई और विकास के लिए समर्पित करते हैं। अलग-अलग चिंताओं को दूर करने के उनके व्यापक नज़रिए का पता सिर्फ़ 12 सालों में मेडिकल कॉलेजों और सीटों में हुई भारी बढ़ोतरी से चलता है। 2014 से पहले के 67 सालों और उसके बाद के 12 सालों के विकास के सफ़र की तुलना करने पर सभी क्षेत्रों में तरक्की दिखाई देती है; हम ज़्यादा आत्मनिर्भर बन रहे हैं और वैश्विक मंच पर सम्मान पा रहे हैं।
एक भारतीय होने के नाते, हम बुद्धिमान हैं, जिसका मतलब है कि हमें ज़्यादा जानकारी रखने वाला और सक्रिय होना चाहिए, और हर चीज़ से ऊपर अपने देश की भलाई को प्राथमिकता देनी चाहिए।

















