खेती-किसानी - योजना सही तो लाभ कई
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आधुनिक कृषि विज्ञान-योजना सही तो लाभ कई

भारत की वैदिक कृषि परंपरा प्रकृति प्रदत्त सह-अस्तित्व के सिद्धांत पर आधारित है, लेकिन इस सिद्धांत को दरकिनार कर हम अधिक उत्पादन के लिए जिस आधुनिक कृषि विज्ञान को अपना रहे हैं, वह भूमि, जल, जैव-विविधता और पर्यावरण को प्रदूषित व विकृत कर रहा है (खेती-किसानी-4)

Written byनरेश सिरोहीनरेश सिरोही
Aug 2, 2025, 05:25 pm IST
inभारत, विश्लेषण, पर्यावरण

कृषि, किसान और उसके द्वारा उत्पादित अन्न के महत्व का उल्लेख शास्त्रों में मिलता है। वेदों और उपनिषदों में कहा गया है, ‘अन्नं ब्रह्मा रसं विष्णुं भोक्ता देवो जनार्दनम्’ अर्थात् अन्न ब्रह्म है, उसमें मौजूद सार तत्व विष्णु हैं। उपनिषदों में कृषि को जीवन का आधार कहा गया है, क्योंकि अन्न की प्राप्ति कृषि कार्यों से ही होती है। भूमि, जल, जैव-संपदा एवं जलवायु के सहयोग से विभिन्न जैविक उत्पादों का उत्पादन करने वाले मानवीय उद्यम को ही ‘कृषि’ कहा जाता है।

नरेश सिरोही
राष्ट्रीय उपाध्यक्ष, भाजपा किसान मोर्चा

फसलों का वितरण कैसे हो, ऋ ग्वेद में उसके बारे में भी बताया गया है। जमीन से चार अंगुल अंश भूमि, गेहूं की बाली के नीचे का अंश पशुओं, पहली फसल की पहली बाली अग्नि, बाली से गेहूं अलग करने पर मूठ्ठी भर दाना पंछियों, गेहूं का आटा बनाने पर मुट्ठी भर आटा चीटियों, चुटकी भर गुंथा आटा मछलियों, आटे की पहली रोटी गोमाता, पहली थाली घर के बुजुर्गों को, फिर अपनी थाली और आखिरी रोटी कुत्ते को देनी चाहिए।

सनातन वैदिक कृषि परंपरा प्रकृति प्रदत्त

सह-अस्तित्व के सिद्धांत पर आधारित है और दार्शनिक, वैज्ञानिक व व्यावहारिक दृष्टि से परिपक्व है। यह प्रकृति प्रदत्त सह-अस्तित्व के सिद्धांत के नियमों का सम्मान और पालन करती है तथा मिट्टी में मौजूद सूक्ष्मजीवों, कीट-पतंगों, पशु-पक्षियों सहित सभी जीवों व मानव के पोषण की व्यवस्था करती है।

भारतीय मनीषियों के अनुसार, मानवीय अस्तित्व में केवल मानव का भौतिक यानी स्थूल शरीर नहीं है, बल्कि व्यक्तित्व की आध्यात्मिक संरचना तीन स्तर (स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीर) पर निर्धारित होती है। इनके पोषण की व्यवस्था में भी खाद्यान्नों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। अतः प्रकृति प्रदत्त सह-अस्तित्व के सिद्धांत पर आधारित कृषि पद्धति द्वारा उत्पादित खाद्य पदार्थों में स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीर के पोषण की पूर्ति करने की क्षमता है।

एक ओर इस सिद्धांत पर आधारित कृषि उत्पादन, मानव के ‘स्थूल शरीर’ को शक्ति प्रदान करते हुए क्रियाशीलता बढ़ाता है, वहीं ‘सूक्ष्म शरीर’ की चिंतनशीलता की शक्ति को भी विस्तार देता है तथा ‘कारण शरीर’ यानी अंतःकरण की चेतना को प्रबल करता है। अंत:करण में व्याप्त भाव चेतना को घनीभूत करता है। दूसरी ओर, यह सिद्धांत हमारी सामाजिक, आर्थिक खुशहाली एवं समृद्धि को सुनिश्चित करने
वाला है। आधुनिक कृषि विज्ञान केवल व्यक्ति के भौतिक यानी स्थूल शरीर को ध्यान में रखते हुए उसके पोषण की दृष्टि से खाद्य उत्पादन करता है। हालांकि वर्तमान वैज्ञानिक पद्धति से उत्पादित खाद्यान्न भौतिक शरीर के पोषण की जगह कुपोषण प्रदान कर रहा है।

पाश्चात्य कृषि विज्ञान

विज्ञान किसी भी कालखंड का हो, वह विज्ञान ही होता है। यह इस पर निर्भर करता है कि वैज्ञानिकों का दृष्टिकोण क्या है। अगर दार्शनिक यानी सैद्धांतिक वैज्ञानिक और व्यावहारिक दृष्टि से आपसी सामंजस्य और समन्वय हो, तो वह विज्ञान समस्त मानव जाति और सृष्टि के लिए वरदान साबित होता है। लगभग सभी क्षेत्रों में विज्ञान की खोजों ने मानव जीवन की दुर्गम राह को सुगम बनाने का कार्य किया है। लेकिन आज उसकी कुछ खोज अभिशाप बन गई हैं, जिसके परिणाम प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन और विनाशकारी हथियारों के रूप में सामने हैं।

प्रकृति प्रदत्त सह-अस्तित्व के सिद्धांत को दरकिनार कर एक तरफ हम अधिक उत्पादन के लिए जिस आधुनिक कृषि विज्ञान को अपना रहे हैं, वह भूमि, जल, जैव-विविधता और पर्यावरण को प्रदूषित व विकृत कर रहा है। दूसरी ओर रसायन युक्त खाद्यान्न शरीर में गंभीर बीमारियां पैदा कर रहे हैं। क्या यह ‘कृषि विज्ञान’ वास्तविक विज्ञान है? या विज्ञान के नाम पर मानव अथवा सृष्टि के विनाश का सामान है? लोगों को इस तथ्य से अवगत कराना जरूरी है कि भुखमरी से जूझ रहे देश के वैज्ञानिकों ने खाद्य संकट से निपटने के लिए तात्कालिक उपाय के तौर पर जिस कृषि विज्ञान और तकनीक सहारा लिया, जिसे हरित क्रांति की संज्ञा दी गई, वह केवल उस आपात स्थिति से उबरने भर तक ठीक था। लेकिन उसे दीर्घकालीन टिकाऊ खेती के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता था।

1967 में हरित क्रांति के जनक स्वामीनाथन ने कहा था, ‘‘हम जिस कृषि विज्ञान और तकनीकी का सहारा लेकर आज उत्पादन बढ़ा रहे हैं, यह तत्कालिक समाधान है। लेकिन इसके दूरगामी परिणाम उचित नहीं होंगे। इसके लिए हमें टिकाऊ कृषि पद्धति विकसित करनी पड़ेगी।’’

उन्होंने अपने अंतिम समय में खेती को हरित क्रांति से निकाल कर ‘सदाबहार हरित क्रांति’ की ओर ले जाने का प्रयास किया। कृषि नीति बनाते समय सत्ता में बैठे हमारे राजनीतिक कर्णधारों और नीति निर्माताओं को कृषि, किसान और उसके द्वारा उत्पादित खाद्य पदार्थों के प्रति भारतीय दृष्टि और उसके दार्शनिक यानी सैद्धांतिक पक्ष को समझने की आवश्यकता है। तभी कृषि और किसानों की दशा सुधरेगी।

भारतीय कृषि प्रबंधन

भारतीयों के लिए कृषि परंपरागत रूप से केवल व्यवसाय या आजीविका का साधन नहीं, बल्कि उनके लिए जीवन-पद्धति यानी जीवन जीने का तरीका रही है। भारत की संपूर्ण सभ्यता (सामाजिक, राजनीतिक व आर्थिक प्रगति) और संस्कृति यानी कलात्मक, भावनात्मक और आध्यात्मिक उन्नति का विकास कृषि के इर्द-गिर्द हुआ है। हमारी अर्थव्यवस्था प्राचीन काल से ही कृषि प्रधान रही है और आज भी है। इस जीवन-पद्धति की सर्वाधिक उल्लेखनीय विशेषता यह है कि यह सदा से ही प्राकृतिक संसाधनों के समुचित और टिकाऊ उपयोग के ऊपर आधारित रही है, जिसमें प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा व संवर्धन, सामाजिक एवं आर्थिक जीवन का अभिन्न अंग रहा है। मुद्रा आधारित विनिमय एवं अर्थव्यवस्था से पहले सारा वस्तुपरक विनिमय कृषि उत्पादन और खनिज पदार्थों के माध्यम से चलता था।

गांव ही नहीं, प्राचीन नगरों की सामाजिक एवं आर्थिक व्यवस्था कृषि उत्पादन और ग्रामीण दस्तकारों की रचनात्मकता पर ही टिकी हुई थी। व्यापार एवं उद्योग भी इन्हीं व्यवस्थाओं के आधार पर विकसित हुए थे। महत्वपूर्ण बात यह है कि यह उपभोक्तावाद नहीं, बल्कि उपभोग की वस्तुओं के सीमित, नियमित उपयोग एवं आत्मसंतोष पर आधारित थी। इसलिए उस व्यवस्था में आज की तरह आपाधापी, बेचैनी और मूल्यों के उतार-चढ़ाव से जनित अस्थिरता का कोई स्थान नहीं था, जिसके चलते समाज के सभी समुदायों में आत्मनिर्भरता, आत्मसंतोष और स्वाभिमान सदियों तक अक्षुण्ण रहे। साथ ही, विभिन्न प्राकृतिक संसाधनों का मानव द्वारा भोग उपभोक्तावाद से प्रेरित नहीं होने के कारण प्रकृति और पर्यावरण भी अक्षुण्ण रहे।

स्वतंत्रता के बाद कृषि प्रणाली में बड़े बदलावों के अलावा जैसे-जैसे वस्तुपरक विनिमय आधारित अर्थव्यवस्था की जगह मुद्रा आधारित विनिमय एवं अर्थव्यवस्था का प्रादुर्भाव हुआ, वैसे-वैसे अर्थव्यवस्था के विभिन्न अंगों, व्यवसायों और वर्गों में अत्यंत स्वस्थ एवं सहज मानवीय संवेदना आधारित संबंधों में क्षय होता चला गया। दूसरी ओर, इस व्यवस्था में किसान, भूमिहीन किसान, दस्तकार और अन्य कमजोर वर्गों की दशा और भी दयनीय होती चली गई। खासकर खेती की अनिश्चितता, जलवायु परिवर्तन के प्रभाव, कृषि आदानों की बढ़ती कीमतों, पूजी के अभाव एवं सापेक्ष मूल्य नीति के कारण इनकी दशा समाज के अन्य वर्गों की तुलना में पिछड़ती गई। खेती का व्यवसाय आज भी प्रबंधन की दृष्टि से अधिकांश क्षेत्रों में अति पिछड़ा और अकुशल है। पूंजी की दृष्टि से भी यह अभावग्रस्त है।

राजनीतिक उपेक्षा और इच्छाशक्ति के अभाव के चलते कृषि एक अलाभकारी व्यवसाय के रूप में परिवर्तित हो गया है। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद कृषि विकास के सारे प्रयास उत्पादन बढ़ाने, खाद्यान्न एवं नकदी फसलों की सस्ते दरों पर उपलब्धता के उद्देश्य प्रेरित रहे हैं। लेकिन अधिक उत्पादन के बाद भी किसान सामाजिक और आर्थिक रूप से कैसे और क्यों पिछड़ता चला गया? इस ओर किसी का ध्यान नहीं गया।

देश की विभिन्न कृषि जलवायु क्षेत्र की अलग-अलग योजनाएं बनाकर राज्यों के साथ समन्वय बनाना होगा। कृषि उत्पादन व प्रबंधन, किसानों को मिलने वाले लाभकारी मूल्य, कृषि उत्पादों की उपलब्धता, उनके पौष्टिक व रासायनिक गुण तथा टिकाऊ कृषि के लिए समन्वित कृषि प्रणाली के ऊपर वैज्ञानिक अनुसंधान को बढ़ावा देना होगा। साथ ही, प्रबंधन, प्रशिक्षण एवं जन चेतना के लिए आधुनिकतम सूचना प्रौद्योगिकी का उपयोग भी नितांत आवश्यक है।

 इन खबरों को भी पढ़ें :

10 हजार साल पुराना है भारत का कृषि का ज्ञान-विज्ञान,


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