राष्ट्रीय परीक्षा व्यवस्था में सुधार के लिए गठित उच्चस्तरीय टास्क फोर्स पर लोकसभा में चर्चा के दौरान कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी वाड्रा ने पैनल के सदस्य प्रो. वी. कामकोटि को निशाना बनाया। प्रियंका ने कहा कि वह “गौमूत्र एक्सपर्ट” हैं और उनकी विशेषज्ञता शिक्षा या चिकित्सा के क्षेत्र में नहीं है। लेकिन क्या प्रियंका वाड्रा गौ-आधारित उन तमाम अध्ययनों एवं शोध को नकार सकती हैं, जो गाय को माता के रूप में वैज्ञनिकता के साथ सदियों पूर्व से स्थापित करते रहे हैं?
भारत की सांस्कृतिक और दार्शनिक परंपरा में गाय का विशेष स्थान है। वैदिक साहित्य, धर्मशास्त्र, पुराण और आयुर्वेद में गौ को कृषि, पोषण और ग्रामीण अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण आधार माना गया है। अथर्ववेद में गौ को समृद्धि और पोषण का प्रतीक बताया गया है, जबकि आयुर्वेद के अनेक ग्रंथों में पंचगव्य का उल्लेख मिलता है। आयुर्वेदिक परंपरा में पंचगव्य- दूध, दही, घी, गोमूत्र और गोबर का उल्लेख विभिन्न संदर्भों में किया गया है।
अब आधुनिक विज्ञान भी इस दिशा में गंभीरता से शोध कर रहा है। देश-विदेश की प्रतिष्ठित वैज्ञानिक पत्रिकाओं में प्रकाशित अनुसंधान, अमेरिकी पेटेंट तथा भारतीय वैज्ञानिक संस्थानों के अध्ययन यह संकेत देते हैं कि मानकीकृत एवं आसवित गोमूत्र अर्क में ऐसे जैव-सक्रिय तत्व मौजूद हैं, जिनका उपयोग रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने, संक्रमण नियंत्रण तथा औषधियों की प्रभावशीलता बढ़ाने जैसे क्षेत्रों में किया जा सकता है।
आयुर्वेद ने हजारों वर्ष पहले ही पहचान लिया था गाय का महत्व
गोमूत्र के औषधीय गुणों का सबसे प्राचीन उल्लेख महर्षि चरक द्वारा रचित ‘चरक संहिता’ में मिलता है। पं. काशीनाथ शास्त्री एवं डॉ. गोरखनाथ चतुर्वेदी द्वारा संपादित चरक संहिता (चौखम्बा भारती अकादमी, वाराणसी, संस्करण–2016) के सूत्रस्थान, अध्याय–1, श्लोक 100–101 (पृष्ठ–19) में कहा गया है-
“मूत्रं गव्यं रसे तिक्तमधुरं कफवातनुत्। शूलगुल्मोदरआनाहकुष्ठरोगहरं परम्॥”
अर्थात् गोमूत्र कफ एवं वात दोष को शांत करने के साथ पेट संबंधी विकारों तथा त्वचा रोगों में उपयोगी माना गया है। यही उल्लेख यह दर्शाता है कि भारतीय चिकित्सा विज्ञान हजारों वर्ष पूर्व ही गोमूत्र के चिकित्सकीय गुणों से परिचित था।
सुश्रुत ने भी किया औषधीय गुणों का वर्णन
महर्षि सुश्रुत की सुश्रुत संहिता (डॉ. अम्बिकादत्त शास्त्री, चौखम्बा संस्कृत संस्थान, वाराणसी, 2018, सूत्रस्थान अध्याय–45, पृष्ठ–224) में गोमूत्र को कृमिनाशक, श्वास, खांसी तथा चर्म रोगों में उपयोगी बताया गया है।
इसी प्रकार महर्षि वाग्भट ने अष्टांग हृदयम् (कविराज अत्रिदेव गुप्त, चौखम्बा प्रकाशन, वाराणसी, 2014, पृष्ठ–74) में गोमूत्र को ‘विषापहम्’ अर्थात प्राकृतिक विषनाशक बताते हुए इसे शोफ, पाण्डु, अर्श तथा कृमि रोगों में लाभकारी माना है। इन तीनों आयुर्वेदिक ग्रंथों में वर्णित समान निष्कर्ष आधुनिक वैज्ञानिकों के लिए भी अनुसंधान का आधार बने हैं।
आधुनिक प्रयोगशालाओं ने भी खोजे जैव-सक्रिय तत्व
आयुर्वेदिक दावों की वैज्ञानिक जांच के लिए डॉ. संदीप कुमार, डॉ. अंजली मल्होत्रा एवं उनके सहयोगियों ने इंटरनेशनल जर्नल ऑफ फार्मास्यूटिकल साइंसेज़ एंड रिसर्च (आईजेपीएसआर) में वर्ष 2020 में प्रकाशित शोध “बायोकेमिकल एंड एलीमेंटल एनालिसिस ऑफ काउ यूरिन (बोस इंडिकस) एंड इट्स थेराप्यूटिक रेलेवेंस” (वॉल्यूम 11, इश्यू 8, पृष्ठ 3712–3718) में भारतीय नस्ल की गाय के गोमूत्र का अत्याधुनिक आईसीपी-एमएस तथा एचपीएलसी तकनीकों से विश्लेषण किया।
शोध में बताया गया कि गोमूत्र में लगभग 95 प्रतिशत जल, शेष भाग में यूरिया, खनिज लवण, एंजाइम तथा जैव-सक्रिय तत्व पाए जाते हैं। अध्ययन के अनुसार इसमें मौजूद कुछ घटक रोग प्रतिरोधक क्षमता को सक्रिय करने तथा प्राकृतिक एंटीसेप्टिक गुण प्रदान करने की क्षमता रखते हैं। यही कारण है कि वैज्ञानिक समुदाय इसके आणविक स्तर पर और गहन अध्ययन की आवश्यकता बता रहा है।
जीवाणुओं पर प्रभाव ने वैज्ञानिकों का बढ़ाया विश्वास
गोमूत्र के रोगाणुरोधी गुणों पर डॉ. पी. एस. नौटियाल, डॉ. आर. के. दुबे एवं उनके शोध दल द्वारा जर्नल ऑफ केमिस्ट्री (वाइली ऑनलाइन लाइब्रेरी, 2024) में प्रकाशित शोध “इन सिलिको एंड इन विट्रो स्टडीज ऑफ एंटीबैक्टीरियल एक्टिविटी ऑफ काउ यूरिन डिस्टिलेट अगेंस्ट पैथोजेनिक माइक्रोऑर्गेनिज़्म्स” ” विशेष रूप से उल्लेखनीय है।
इस अध्ययन में प्रयोगशाला परीक्षणों के दौरान गोमूत्र अर्क ने स्टेफिलोकोकस ऑरियस तथा ई. कोलाई जैसे संक्रमण फैलाने वाले जीवाणुओं की वृद्धि को रोकने की क्षमता प्रदर्शित की। शोधकर्ताओं ने निष्कर्ष दिया कि गोमूत्र में उपस्थित फेरुलिक एसिड तथा गैलिक एसिड जैसे तत्व जीवाणुओं के प्रोटीन तंत्र को प्रभावित कर सकते हैं। यह अध्ययन इस दिशा में आगे के चिकित्सीय अनुसंधानों का आधार माना जा रहा है।
अमेरिकी पेटेंट ने बढ़ाई वैश्विक विश्वसनीयता
गोमूत्र पर भारत की सबसे महत्वपूर्ण वैज्ञानिक उपलब्धियों में यूएस पेटेंट क्रमांक. 6,410,059 B1 शामिल है। 25 जून 2002 को अमेरिकी पेटेंट एवं ट्रेडमार्क कार्यालय (यूएसपीटीओ) ने डॉ. एस.पी.एस. खनूजा, डॉ. जे.एस. आर्या तथा डॉ. कुमार सुशांत सहित भारतीय वैज्ञानिकों को यह पेटेंट प्रदान किया। यह शोध वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद (सीएसआईआर) तथा केंद्रीय औषधीय एवं सगंध पौधा संस्थान (सीआईएमएपी) द्वारा किया गया था।
इस पेटेंट में गोमूत्र अर्क को ‘बायो-एन्हांसर’ अर्थात ऐसी प्राकृतिक सामग्री बताया गया, जो कुछ औषधियों की जैव-उपलब्धता बढ़ा सकती है। शोध में यह भी उल्लेख किया गया कि नियंत्रित परिस्थितियों में कुछ एंटीबायोटिक एवं कैंसररोधी दवाओं के साथ इसके उपयोग से दवा की प्रभावशीलता कई गुना तक बढ़ने की संभावना देखी गई।
आधुनिक वैज्ञानिक भी बता रहे शोध की आवश्यकता
अब जब आईआईटी मद्रास के निदेशक प्रो. वी. कामकोटि ने जनवरी 2025 में आयोजित ‘स्वदेशी विज्ञान एवं जैविक कृषि सम्मेलन’ में कहा, “वैश्विक विज्ञान पत्रिकाओं और भारतीय पशु चिकित्सा अनुसंधानों के पीयर-रिव्यूड आंकड़े यह संकेत देते हैं कि भारतीय नस्ल की गायों के गोमूत्र में विशिष्ट जैविक गुण मौजूद हैं। आवश्यकता इसके आणविक स्तर पर और अधिक वैज्ञानिक शोध की है।” उन्होंने क्या गलत कहा? वह तो वही बता रहे हैं, जोकि गोमूत्र को लेकर प्राचीन शोध अध्ययन एवं आधुनिक वैज्ञानिक शोध कह रहे हैं।
इसी प्रकार गांधीवादी शोधकर्ता रावजीभाई मणिभाई पटेल ने अपनी पुस्तक “यूरिन थेरेपी–हिस्टॉरिकल एंड प्रैक्टिकल पर्सपेक्टिव” (नवजीवन प्रकाशन, अहमदाबाद, पुनर्मुद्रित संस्करण–2011, पृष्ठ 142–145) में गोमूत्र को प्राकृतिक एंटीसेप्टिक बताते हुए त्वचा संबंधी रोगों में इसके संभावित उपयोग का उल्लेख किया है।
गोमूत्र : परंपरा-विज्ञान का यह संगम और कांग्रेस
आज जब विश्व प्राकृतिक चिकित्सा, जैविक उत्पादों और पारंपरिक ज्ञान की ओर पुनः लौट रहा है, तब गोमूत्र पर हो रहे वैज्ञानिक अध्ययन यह संकेत देते हैं कि भारत की प्राचीन आयुर्वेदिक विरासत आस्था के साथ ही वैज्ञानिक अनुसंधान का भी महत्वपूर्ण आधार बनती जा रही है।
वास्तव में उपलब्ध शोध यह अवश्य बताते हैं कि परंपरा और विज्ञान का यह संगम भविष्य में स्वास्थ्य विज्ञान के नए आयाम खोलता है, इसलिए कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा से प्रश्न आज यही है कि यदि किसी वैज्ञानिक ने उसके अपने अध्ययन के आधार पर किसी भी विषय पर कुछ निष्कर्ष निकाला है तो क्या उसे निशाना बनाया जाना चाहिए? फिर इसके साथ एक प्रश्न यह भी है कि गाय माता को लेकर जो वैज्ञानिक अध्ययन अब तक हुए हैं और जो हो रहे हैं, वे सभी एक बात समान रूप से कह रहे हैं और वह यही है कि गाय का महत्व मनुष्य जीवन के लिए कोई साधारण नहीं। अब प्रियंका गांधी इस बात को कहां-कहां कैसे झुठलाएंगी ?

















