Explainer: उपनिषदों और गीता में है 'जल' का वर्णन, ऋग्वेद में 'चेतना और प्राण शक्ति' बताया गया
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Explainer: उपनिषदों और गीता में है ‘जल’ का वर्णन, ऋग्वेद में ‘चेतना और प्राण शक्ति’ बताया गया

गीता में श्रीकृष्ण ने जल की महिमा को ईश्वरीय ऊर्जा कहा है। सर्वव्यापी सत्ता के रूप में कहा है। वे कहते हैं प्रकृति का हर रूप अंतत उन्ही का विस्तार है।

Written byएजेंसीएजेंसी — edited by Lalit Fulara
Jul 7, 2026, 05:15 pm IST
inविश्लेषण

जल अमृत है। जल को प्राण कहा गया है। जल प्रत्येक प्राणी के लिए अपरिहार्य है। प्रत्येक प्राणी जल पर निर्भर है। सम्पूर्ण विश्व में पेयजल की कमी हो रही है। नदियों का जल घट रहा है। जल स्रोत सूख रहे हैं। विश्व का तापमान बढ़ा है। तापमान बढ़ने से ऋतु चक्र में परिवर्तन हो रहा है। कहीं अत्यधिक गर्मी है कहीं पर अतिवृष्टि तो कही शीत से लोग पीड़ित हैं। मानसून ने बड़ी प्रतीक्षा कराई। मानसून शब्द अरबी भाषा के मौसम शब्द से लिया गया है। इसका अर्थ मौसम या ऋतु होता है। यह शब्द मुख्य रूप से अरब सागर में हवा की दिशा में होने वाले बदलावों के लिए प्रयोग किया जाता है। ऋतु शब्द संस्कृत का है। यह वैदिक संस्कृत से लिया गया है। इसका अर्थ यज्ञ या धार्मिक अनुष्ठान से है। भारतीय दर्शन में ऋतु में छह हैं। बसंत ऋतु की बड़ी महिमा बताई गई है। इसे ही ऋतुओं का राजा कहा गया है। इसके बाद ग्रीष्म ऋतु है। वर्षा ऋतु मोहक होती है। किसान अपनी खेती की तैयारी में लग जाते हैं। इसके बाद हेमंत ऋतु। फिर शिशिर ऋतु। इसी तरह शब्द है ऋत। कई बार ऋत को ऋतु और ऋतु को ऋत कह दिया जाता है। ऋत वैदिक दार्शनिक अवधारणा है। यह प्रकृति का शाश्वत अनुशासन है। ऋतु एक चक्र है। मौसम है।

ऋग्वेद में जल को आपः कहकर दिव्य चेतना और प्राण शक्ति कहा गया

जल जीवन का मुख्य आधार है। ऋग्वेद में जल को आपः कहकर दिव्य चेतना और प्राण शक्ति कहा गया है। जल मात्र भौतिक तत्व नहीं है। यह माँ के समान पालक भी है। जल के देवता वरुण हैं। ऋग्वेद में कहा गया है कि, जल में सभी रोगों को दूर करने की क्षमता है। जल के देवता वरुण ब्रम्हांड के नियमों (ऋत) को बनाए रखते हैं। पर्जन्य देव वर्षा बादल बिजली के देव हैं। जल का दार्शनिक वर्णन उपनिषदों में किया गया है।

छांदोग्य उपनिषद में जल को प्राण और ईश्वर के निकट माना गया है। जल ही अन्न और जीवन है। महर्षि उद्दालकअपने पुत्र श्वेतकेतु को समझाते हैं कि जल के बिना कुछ भी सम्भव नहीं है। जल न हो तो अन्न नहीं होगा। बिना अन्न के जीवन नहीं हो सकता। कहा कि जल में ईश्वरीय तत्व होता है। जैसे जल में नमक घुला हो वह अदृश्य रहता है लेकिन बूंद में स्वाद होता है। वैसे ही निराकार जीवों में सभी जगह और हर जीव में व्याप्त है। अथर्ववेद में जल को “शिवोतम” रस कहा गया है। सामवेद में जल को सोमजल कहा गया है। रामचरितमानस में जल पंच महाभूतों में आधार है।

गीता में श्रीकृष्ण ने जल की महिमा को ईश्वरीय ऊर्जा कहा

गीता में श्रीकृष्ण ने जल की महिमा को ईश्वरीय ऊर्जा कहा है। सर्वव्यापी सत्ता के रूप में कहा है। वे कहते हैं प्रकृति का हर रूप अंतत उन्ही का विस्तार है। श्रीकृष्ण ज्ञान विज्ञान योग के सातवें अध्याय के आठवें श्लोक में कहते हैं- हे अर्जुन, मैं जल में रस (स्वाद) हूँ। सूर्य और चंद्रमा का प्रकाश हूँ। यहां श्रीकृष्ण कह रहे हैं कि जल न केवल माध्यम है बल्कि मनुष्य की प्यास बुझाने वाली तृप्ति है (स्वाद है)। वह साक्षात परमात्मा का रूप है। गीता में सीधे जल के भौतिक गुणों की पूजा करने की जगह उसके आध्यात्मिक महत्व को समझाया गया है। जल जीवन की दिव्यता है। जल जीवन का आधार है। जल संपूर्ण सृष्टि की उत्पत्ति का मूल आधार है। गीता और हिंदू दर्शन में जल को (नारायण) कहा गया है। अयन या निवास जिसका रूप माना गया है। हम सबको जल को व्यर्थ नहीं बहाना चाहिए। जल प्रदूषित नहीं करना चाहिए। जल स्रोतों को प्रदूषण से बचाना चाहिए। हम सबकी जिम्मेदारी भी है और कर्तव्य भी है। बताया जाता है कि पृथ्वी में 3 प्रतिशत पेयजल है। इसी तीन प्रतिशत में जमी बर्फ, ग्लेशियर भी हैं। शेष जल समुद्री खारा है।

पेयजल का संकट गहराता जा रहा है। पूर्व में नदियों-झीलों का जल पीने योग्य होता था। अब नहीं। वर्ष 90 और 95 तक कुओं से पानी मिलता रहा है। इससे पूर्व सैकड़ों शताब्दियों से कुओं का खुदवाया जाना, ईश्वरीय पुण्य का कार्य माना जाता था। तब के कालखंड में राजा भी कुएं बनवाते थे। यह कार्य सिर्फ मैदानी क्षेत्रों तक सीमित नहीं था। दुर्गम और पहाड़ी पथरीले क्षेत्र में भी राजाओं और संपन्न लोगों द्वारा कुएं बनवाये जाते थे। कुओं से पेयजल के साथ सिंचाई भी होती थी। सिंचाई के लिये कुओं से पानी निकालने के लिए बैलों का प्रयोग होता था। पानी निकालने वाला पात्र चमड़े का होता था। उसे “पुर” कहा जाता था। कई क्षेत्रों में सिंचाई के पानी को कुओं से निकालने के लिए चरखा (डिब्बे) वाला प्रयोग होता था। यह प्राचीन काल की बातें नहीं हैं। आधुनिक और स्वतंत्र भारत में भी होता था।

प्लास्टिक शहर से गांव पहुंची…मानवता को कर रही है नुकसान

आज स्थिति भयावह है। गांव में भी बोतलबन्द पानी बिक रहा है। 20 रुपये किलो गेहूं है, 20 रुपये की ही पानी की 1 लीटर की बोतल है। कहीं खरीदो, कहीं पियो। कहीं फेंको। प्लास्टिक बोतलों, डिब्बों, थैलियों को आधुनिक प्रगतिशील पर्यटनवादी भारतीयों ने हिमालय सहित सभी पवित्र पहाड़ी क्षेत्र तक पहुंचाने का महती काम किया है। प्लास्टिक कचरे को नदियों में डालने की कार्रवाई जारी है। जल स्रोतों तक प्लास्टिक पहुंच गई है। जलीय जीवों के पेट में तो प्लास्टिक है ही। गायों व अन्य जीवों के पेट में प्लास्टिक घुस गई है। जानवर मर रहे हैं। वैज्ञानिक सचेत कर रहे हैं। पहले प्लास्टिक की बोतलों में दवा आई। फिर पानी आया। फिर पाउच में पानी और दारू भी आई। अब तो दारू भी प्लास्टिक बोतल में बिक रही है। बोतलों का उत्पादन बढ़ा है।

प्लास्टिक सम्पूर्ण मानवता का अतिरिक्त नुकसान कर रही है। प्लास्टिक शहर से गांव पहुंची। नगर के साथ गांव में प्लास्टिक कचरा बढ़ा है। शहरों ने तालाबों को निगल लिया। गांव के तालाबों को प्लास्टिक निगल रही है। ट्रकों प्लास्टिक तालाबों में भारी पड़ी है। तालाब झील पट रहे हैं। कुआं खत्म होकर पुरातात्विक हो गए। तालाब, झीलें, नदियां सूख रहे। समुद्री तटीय महानगरीय क्षेत्र कूड़ा से पटे पड़े हैं। इसके बावजूद दावा है महानगरीय अतिरिक्त सभ्य हैं। प्रगतिशील हैं। वह इंडियन भी हैं। सरकारें पॉलिथीन नहीं रोक पा रहीं। उसकी फैक्ट्रियां बढ़ी हैं।

नदी घाटी वाला राष्ट्र भारत सदा से है। सिंधु, सरस्वती, सतलुज, राप्ती, कावेरी, कृष्णा, ब्रह्मपुत्र, गंगा, यमुना, चंबल सई वाला भारत आहत है। गंगा अब निर्मल नही हैं। यमुना का जल आचमन लायक नहीं है। सरकारें आरोप-प्रत्यारोप के खेल में जुटी रहती हैं। सरकारें चुनावों से बनती हैं। आती हैं- जाती हैं। जल प्रदूषण, नदी प्रदूषण, पर्यावरण प्रदूषण, ध्वनि प्रदूषण एवं वायु प्रदूषण कभी चुनाव में मुद्दा नहीं रहता है। चुनाव में पानी की बात नहीं उठती है। दलों के लिए जाति सर्वोपरि है। वर्ग आगे हैं। दलों की नीतियों में जिताऊ और वोट जुटाऊ प्रत्याशियों की खोज है। जिस देश के लोग गेहूं-चावल बेचकर पानी पीने को मजबूर हों। वह मरे समाज ही कहे जाएंगे। मरा ही समझो। रहीम ने कहा रहिमन पानी राखिए। बिन पानी सब सून। जल संरक्षण के लिए समाज और सरकार दोनों को आगे आना होगा। जल संरक्षण न के बराबर है। जल संचयन की सरकारी बैठकें बेमतलब हैं। अच्छा होता जल संरक्षण, संचयन को बढ़ावा दिया जाता। जागरूकता लाने का काम किया जाता। मजबूत जल नीति जनहितकारी बनाया जाना लोकहित होगा।

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