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‘टुकड़े- टुकड़े’ सोच उजागर

पित्रोदा ने अपने बयान में पूर्वी भारत के लोगों को चाइनीज नस्ल जैसा, उत्तर भारत के लोगों को अंग्रेज, पश्चिम भारत के लोगों को अरब और दक्षिण के लोगों को अफ्रीकी नस्ल जैसा कहा है

Written byरमेश शर्मारमेश शर्मा
May 13, 2024, 12:20 pm IST
inभारत, विश्लेषण
राहुल गांधी के सलाहकार सैमपित्रोदा

राहुल गांधी के सलाहकार सैमपित्रोदा

कांग्रेस की सलाहकार टोली के प्रमुख सदस्य अमरीका में रह रहे सैम पित्रोदा ने रंग, क्षेत्र और कद-काठी के आधार पर भारतीय समाज को विभाजित करने संबंधी अंग्रेजों के षड्यंत्र को एक बार फिर स्थापित करने का प्रयास किया है। अंग्रेजों ने अपनी सत्ता बनाए रखने के लिए सामाजिक और क्षेत्र विभाजन का यही षड्यंत्र किया था। इस प्रकार का विभाजन भारतीय परंपरा, दर्शन और संस्कृति का तो अपमान है ही, यह भारत के संविधान की भावना के भी विपरीत है।

सैम पित्रोदा कभी मध्यम वर्ग से अधिक कर वसूलने की सलाह देते हैं, तो कभी विरासत में मिली संपत्ति का एक बड़ा भाग सरकार द्वारा ले लेने की बात बोलते हैं। जब सर्वोच्च न्यायालय के आदेश से अयोध्या में भगवान रामलला जन्मस्थान मंदिर बनने का मार्ग प्रशस्त हुआ तब उन्होंने मंदिर को अनावश्यक बताया था। अब पित्रोदा का नया वक्तव्य आया है। इसमें उन्होंने भारत के निवासियों को उनके रंग, क्षेत्र एवं कद-काठी के आधार पर वर्गीकृत किया है और विदेशी नस्लों से जोड़ा है।

पित्रोदा ने अपने बयान में पूर्वी भारत के लोगों को चीनी नस्ल जैसा, उत्तर भारत के लोगों को अंग्रेजी, पश्चिम भारत के लोगों को अरब और दक्षिण के लोगों को अफ्रीकी नस्ल जैसा कहा है। पित्रोदा यहीं तक सीमित नहीं रहे। उन्होंने यह भी कहा कि दक्षिण भारत के लोग अपेक्षाकृत अधिक बुद्धिमान होते हैं। पित्रोदा का यह बयान अमेरिका से आया है। वे कांग्रेस के वरिष्ठ सदस्य और ओवरसीज कांग्रेस के अध्यक्ष रहे हैं। कांग्रेस की यह शाखा अमेरिकी और यूरोपीय देशों में सक्रिय है। कांग्रेस के सलाहकार समूह के महत्वपूर्ण सदस्य पित्रोदा स्वर्गीय राजीव गांधी के विश्वस्त रहे और उन्हें राहुल गांधी का भी सलाहकार माना जाता है।

विभेद पैदा करने वाला यह वक्तव्य ऐसे समय आया है जब पूरा देश 18वीं लोकसभा के चुनाव में जुटा है। तीन चरणों का मतदान हो चुका है। चार चरणों का मतदान अभी शेष है। लोकसभा के इस चुनाव में भी वर्ष 2019 की भांति सांस्कृतिक राष्ट्रभाव और सामाजिक एकत्व भाव प्रबल हो रहा है। परिणाम तो 4 जून को आएंगे किन्तु अभी यह माना जा रहा है कि इस सांस्कृतिक राष्ट्रभाव और एकत्व का झुकाव भाजपा की ओर है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पहले कार्यकाल में अपना पद संभालते ही इस एकत्व पर जोर दिया था। उनका नारा था- ‘सबका साथ, सबका विकास और सबका विश्वास’। समय के साथ अयोध्या में राम जन्मस्थान मंदिर योजना ने भी आकार लिया। अब यह प्रधानमंत्री मोदी का नारा हो या कालचक्र का अपना प्रभाव कि सामाजिक एकत्व और सांस्कृतिक राष्ट्रभाव इन दस वर्षों में अधिक मुखर हुआ है। इसका आधार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को माना जा रहा है। लोकसभा के इस चुनाव में इसकी झलक स्पष्ट है। इस वातावरण से उन राजनीतिक दलों को अपनी सफलता कुछ दूर दिखाई दे रही है जिनका लक्ष्य केवल सत्ता पाना है।

विपक्ष ने सामाजिक एकत्व में सेंध लगाने के लिए पहले जाति आधारित जनगणना और पंथ आधारित आरक्षण पर बहुत जोर दिया, फिर शब्दांतरण से मुस्लिम समाज के आरक्षण का संकेत भी आया। इंडी गठबंधन के महत्वपूर्ण घटक लालू प्रसाद यादव ने तो मुसलमानों को आरक्षण देने की बात खुलकर कही। इन बातों का प्रभाव तीसरे चरण के मतदान में नहीं दिखा। पहले और दूसरे चरण के मतदान के रुझान में तो मीडिया ने यह अनुमान भी व्यक्त किया इस बार भाजपा दक्षिण भारत के केरल और तमिलनाडु में भी खाता खोल सकती है।

पित्रोदा के उक्त वक्तव्य में अंग्रेजों जैसे षड्यंत्रों की झलक है जो उन्होंने भारत में अपनी जड़ों को जमाने के लिए किए थे। उनकी घोषित नीति थी-‘बांटो और राज करो’। इसी षड्यंत्र के अंतर्गत उन्होंने विभाजन के बीज बोए थे। अपनी ‘डिवाइड एण्ड रूल’ थ्योरी में अंग्रेजों ने जो बिंदु उठाए थे, ठीक वही बिंदु पित्रोदा के वक्तव्य में हैं। अंग्रेजों ने सबसे पहले आर्यों को हमलावर बताया था, और उन्हें यूरोपीय नस्ल से जोड़ा था दक्षिण भारत को उत्तर भारत से अलग बताया और वनवासियों को अफ्रीकन नस्ल से जोड़ा था। अंग्रेजों ने अपनी सत्ता की जड़ें जमाने के लिये समाज को बांटने का काम केवल भारत में ही नहीं किया, पूरी दुनिया में किया, वे जहां भी गए वहां किया। अमेरिका और अफ्रीकी में तो रंग के आधार पर कानून भी बनाए गए थे।

दक्षिण अफ्रीका में गांधी जी ने सबसे पहला आंदोलन रंग भेद के विरुद्ध ही किया था। भारत में सामाजिक विभाजन को गहरा करने के लिए अंग्रेजों ने जाति, पंथ और क्षेत्र को आधार बनाया। इसी आधार पर सेना गठित की और जेल मैनुअल बनाया। अधिकांश प्रांतों में दो रेजिमेंट बनाई गईं। जैसे पंजाब रेजिमेंट भी और सिख रेजिमेंट भी, राजस्थान रेजिमेंट भी और राजपूताना राइफल्स भी, मराठा रेजिमेंट भी और महार रेजिमेंट भी। अंग्रेजों ने पंथ के आधार पर मुस्लिम रेजिमेंट भी बनाई थी। पर सबकी भर्ती की प्राथमिकता में अंतर था।
भारत में अंग्रेजों द्वारा जाति, पंथ, भाषा, क्षेत्र, रंग और कदकाठी के आधार पर बोई गई इस विष बेल को वामपंथी विचारकों ने खाद -पानी देकर बनाए रखा। कहना न होगा कि पित्रोदा के बयान में अंग्रेजी साजिश और वामपंथी कुतर्कों की पूरी झलक है।

उत्तर से दक्षिण तक भारत की एकत्व अवधारणा

इस वक्तव्य के बाद तूफान उठना ही था। चूंकि यह वक्तव्य न केवल भारतीय सामाजिक संरचना और सांस्कृतिक अवधारणाओं के विरुद्ध है अपितु संविधान की भावना के भी विरुद्ध है। भारतीय वाड़मय पूरे विश्व को एक कुटुम्ब मानता है। दक्षिण भारत की धरती का विकास उत्तर भारत में जन्मे भगवान परशुराम जी ने किया और दक्षिण भारत में जन्मे आदि शंकराचार्य ने पूरे भारत में वैदिक पीठ स्थापित की। भगवान नारायण का निवास दक्षिण के महासागर में है और भगवान शिव का निवास उत्तर के हिमालय पर।

कैलाश पर निवास करने वाले शिव के लिये एक प्रार्थना है- ‘कर्पूर गौरम् करुणावतारम्’ अर्थात वे कपूर के समान गौरवर्ण हैं। तो दक्षिण के महासागर में निवास करने वाले नारायण के लिये प्रार्थना है- ‘मेघवर्णम् शुभांगम्’ अर्थात वे बादलों के समान काले हैं। दो ईश्वर अलग-अलग रंग के हैं, राम सांवले हैं और लक्ष्मण गोरे, कृष्ण काले हैं तो बलराम गोरे।

भारत में न तो रंग का कोई भेद है, न क्षेत्र का। लेकिन विदेशी सत्ताओं ने ऐसे बीज बोए जिनका उपयोग आज भी कुछ राजनीतिक दल कर रहे हैं। पित्रोदा का बयान आते ही सामाजिक क्षेत्र में गहरी प्रतिक्रिया हुई। भाजपा और प्रधानमंत्री नरेंद्र्र मोदी ने बिना विलंब किए जवाबी हमला बोला। पहले तो कांग्रेस ने वक्तव्य से किनारा किया और यह कहकर अपना बचाव किया कि यह पित्रोदा की निजी राय है किन्तु जब बात न बनी तो कांग्रेस नेता जयराम ने पित्रोदा के कांग्रेस से त्यागपत्र देने और पार्टी द्वारा स्वीकार करने की सूचना मीडिया को दी।

अब सैम पित्रोदा का त्यागपत्र वास्तविक है या चुनावी वातावरण में बचाव की रणनीति, यह सत्य तो भविष्य में ही स्पष्ट होगा। किन्तु इस वक्तव्य से यह बात एक बार फिर प्रमाणित हो गई कि अंग्रेज भले भारत से चले गए पर उनकी रीति-नीति पर चलने वाले लोग अभी भारत में हैं और वे अंग्रेजियत का पूरी शक्ति से पालन कर रहे हैं, भारत को अंग्रेजों की नीतियों का रंग देने के अभियान में जुटे हैं। वे यह भूल जाते हैं कि राजनीति अलग है और राष्ट्रनीति अलग। भारत राष्ट्र और भारतीय समाज किसी भी राजनीति से ऊपर है। सत्ता और राजनीति को राष्ट्र एवं समाज की सेवा का माध्यम होना चाहिए न कि समाज और राष्ट्र में विभेद के बीज बोकर सत्ता का मार्ग बनाना चाहिए।

Topics: Indian Society‘बांटो और राज करो’पाञ्चजन्य विशेषSam Pitrodaसैम पित्रोदाDivide and Ruleसबका साथ सबका विकास और सबका विश्वासSabka Saath Sabka Vikas and Sabka Trustभारतीय समाज
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