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बंद हो दोहरे लाभ का खेल

असम और ओडिशा में जनजाति समाज की रैली में हजारों लोग जुटे। दूसरे मत-मजहब को अपना चुके लोगों को दोहरे लाभ से वंचित करने और उन्हें जनजाति सूची से बाहर करने की मांग

अरविंद कुमार रायडॉ. समन्वय नंदWritten byअरविंद कुमार रायandडॉ. समन्वय नंद
Apr 7, 2023, 07:47 am IST
inभारत, असम, धर्म-संस्कृति
गांव में जमीन की माप किए जाने का विरोध करते ग्रामीण

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पूर्वोत्तर सहित देश के अन्य राज्यों के जनजातीय समाज को उनके अधिकारों से वंचित रखा गया। इसलिए अपने अधिकारों से अनजान यह समाज कन्वर्जन का आसान शिकार बना। दूसरी ओर, मत-मजहब में कन्वर्ट होने के बाद भी ये लोग सरकार से जनजातीय समाज को मिलने वाली सुविधाओं का उपभोग करते रहे।

एक लंबे समय तक पूर्वोत्तर सहित देश के अन्य राज्यों के जनजातीय समाज को उनके अधिकारों से वंचित रखा गया। इसलिए अपने अधिकारों से अनजान यह समाज कन्वर्जन का आसान शिकार बना। दूसरी ओर, मत-मजहब में कन्वर्ट होने के बाद भी ये लोग सरकार से जनजातीय समाज को मिलने वाली सुविधाओं का उपभोग करते रहे। लेकिन अब परिस्थितियां बदल रही हैं। समाज अपने हितों की रक्षा के लिए न केवल खड़ा हुआ है, बल्कि उसे मिलने वाली सरकारी सुविधाओं पर डाका डालने वालों के विरुद्ध लामबंद भी हो रहा है। देश के दूसरे हिस्सों से भी यह आवाज उठ रही है कि कन्वर्टेड लोगों द्वारा लिए जाने वाले दोहरे लाभ के खेल को बंद किया जाए।

दरअसल, जनजातीय समाज के जो लोग कन्वर्ट हो गए, वे ‘अल्पसंख्यकों’ को मिलने वाले आरक्षण का लाभ तो उठा ही रहे हैं, सरकार से जनजातीय समाज को जो सुविधाएं दी जाती हैं, उसका भी उपभोग कर रहे हैं। पूर्वोत्तर के जनजातीय समाज को यह बात अब भली प्रकार से समझ आ गई है। दोहरा लाभ लेने वाले ऐसे लोगों को जनजाति सूची से बाहर करने की मांग को लेकर बीते दिनों असम और ओडिशा में विशाल जनसभाएं हुईं।

26 मार्च को असम में गुवाहाटी के खानापाड़ा स्थित पशु चिकित्सा खेल मैदान में जनजाति धर्म-संस्कृति सुरक्षा मंच द्वारा आयोजित विशाल जनसभा में समूचे असम से विभिन्न जनजातीय समाज के महिला-पुरुष सहित 50,000 से अधिक लोग एकत्रित हुए। इस जनसभा में सर्वसम्मति से एक ही मांग उठी कि जो लोग दूसरे मत-मजहब में कन्वर्ट हो चुके हैं, उनका नाम जनजाति सूची से हटाने के साथ उन्हें दी जा रही आरक्षण की सुविधा भी बंद की जाए। समाज का कहना है कि उनकी धर्म-संस्कृति पर भी हमला हुआ है। इस अवसर पर परंपरागत परिधान पहन कर आए जनजातीय समाज के लोगों ने परंपरागत रूप में अपने इष्ट देवताओं की पूजा की। इस आयोजन में जनजाति धर्म-संस्कृति सुरक्षा मंच के अध्यक्ष जलेश्वर ब्रह्म, बोगीराम बोडो भी शामिल हुए। जनसभा में पारित प्रस्ताव के ज्ञापन राष्ट्रपति को भी भेजा गया है।

अतीत में कार्तिक उरांव ने भी संसद में यही मांग उठाई थी। तब इसके लिए गठित संयुक्त संसदीय समिति ने भी इसका समर्थन किया था। लेकिन पूर्ववर्ती सरकारों ने जनजातीय समाज की मांग पर ध्यान नहीं दिया। जनसभा में उपस्थित लोगों का कहना था कि जनजाति समाज अब इस अन्याय को सहन नहीं करेगा। अब ईसाइयत और इस्लाम कबूल कर चुके लोगों के नाम को जानजाति सूची से हटाना ही होगा। जनसभा में एक गीत बज रहा था-‘डी-लिस्टिंग के लिए लड़ाई हो गई शुरू’, जिस पर सभी झूम रहे थे। यह गीत जनजातीय समाज में एक तरह से जोश भरता दिखाई दिया।

पूर्वोत्तर में कन्वर्जन का खेल बहुत पुराना है। पहले मुस्लिम आक्रांताओं ने भोले-भाले जनजाति समाज को बरगलाकर उसकी पूजा-पद्धति को बदला। फिर बाद में अंग्रेजों के आने के बाद बड़े पैमाने पर उनका कन्वर्जन किया गया, जो देश की आजादी के बाद भी जारी रहा। लेकिन तत्कालीन सरकारों ने इस ओर ध्यान नहीं दिया। आज पूर्वोत्तर के नागालैंड, मेघालय और मिजोरम पूरी तरह से ईसाई बहुल राज्य बन गए हैं। वहीं, मणिपुर, मेघालय और असम में भी बड़े पैमाने इस्लाम में कन्वर्जन हुआ है। पूर्वोत्तर के सबसे बड़े राज्य असम के धुबरी, बरपेटा, मोरीगांव, नगांव, होजाई, दक्षिण सालमारा-मानकचार आदि जिले अब पूरी तरह मुस्लिम बहुल हो चुके हैं। आज से 70 वर्ष पूर्व ऐसी स्थिति नहीं थी। अब जनजाति समाज अपने अधिकारों, धर्म-संस्कृति, भाषा, उपासना पद्धति, भेष-भूषा को लेकर जागरूक हो उठा है।

ओडिशा के भुवनेश्वर में आयोजित रैली में प्रस्तुति देते जनजाति समाज के लोग

कन्वर्ट होने के बाद भी ये लोग अल्पसंख्यक होने की सुविधा के साथ-साथ जनजाति वर्ग को मिलने वाली सुविधाएं भी लेते हैं। इस प्रकार ये लोग दोनों प्रकार के लाभ उठा रहे हैं। ये लोग उन लोगों के अधिकार पर डाका डाल रहे हैं, जो अभी भी अपने मूल धर्म और संस्कृति से जुड़े हैं। उन्होंने कहा कि इस मांग को लेकर जनजाति सुरक्षा मंच पहले भी आंदोलन कर चुका है। 2009 में जनजाति समाज के 28 लाख लोगों के हस्ताक्षर वाला एक ज्ञापन राष्ट्रपति को सौंपा गया था। 

उधर, ओडिशा की राजधानी भुवनेश्वर के जनता मैदान में जनजाति समाज की एक विशाल रैली हुई। ओडिशा के जनजाति सुरक्षा मंच द्वारा आयोजित इस रैली में 62 अनुसूचित जनजातियों के हजारों लोगों ने हिस्सा लिया। भुवनेश्वर के तीन हिस्सों से तीन रैलियां निकलीं और कार्यक्रम स्थल पर पहुंचीं। इन रैलियों में जनजाति समाज के लोग अपने परंपरागत वाद्य और वेशभूषा सहित शामिल हुए। उनके हाथों में तख्तियां थीं। कार्यक्रम स्थल पर पहुंचने के बाद समाज की एक सभा हुई।

जनजाति सुरक्षा मंच के राष्ट्रीय सह-संयोजक डॉ. राजकिशोर हांसदा ने सभा को संबोधित करते हुए कहा कि जनजाति समाज के जो लोग अपने पूर्वजों की संस्कृति छोड़कर किसी अन्य मत-पंथ को अपना चुके हैं, उन्हें अनुसूचित जाति से बाहर किया जाए और आरक्षण एवं अन्य सरकारी सुविधाओं से वंचित किया जाए। उन्होंने कहा कि संविधान की धारा 341 के अनुसार अनुसूचित जाति के जो लोग कन्वर्ट होते हैं, उन्हें आरक्षण की सुविधा नहीं मिलती। लेकिन धारा 342 के तहत अनुसूचित जनजाति के लोगों पर यह नियम लागू नहीं है।

इस कारण कन्वर्ट होने के बाद भी ये लोग अल्पसंख्यक होने की सुविधा के साथ-साथ जनजाति वर्ग को मिलने वाली सुविधाएं भी लेते हैं। इस प्रकार ये लोग दोनों प्रकार के लाभ उठा रहे हैं। ये लोग उन लोगों के अधिकार पर डाका डाल रहे हैं, जो अभी भी अपने मूल धर्म और संस्कृति से जुड़े हैं। उन्होंने कहा कि इस मांग को लेकर जनजाति सुरक्षा मंच पहले भी आंदोलन कर चुका है। 2009 में जनजाति समाज के 28 लाख लोगों के हस्ताक्षर वाला एक ज्ञापन राष्ट्रपति को सौंपा गया था। इसके बाद 2020 में भी 288 जिलाधिकारियों के माध्यम से राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को ज्ञापन भेजा जा चुका है। जनजाति सुरक्षा मंच के राष्ट्रीय संयोजक गणेशराम भगत, पवित्र कंहर, बीणापाणि नायक, शक्तिदयाल किस्कू आदि ने भी सभा को संबोधित किया।

Topics: मिजोरमअल्पसंख्यकPresidentपूर्वोत्तरराष्ट्रपतिधर्म-संस्कृति सुरक्षा मंचजनजातीय समाजReligion-Culture Security Forumminoritiesstop double profit gameMeghalayaप्रधानमंत्रीmizoramकन्वर्जनtribal societyConversionnortheastPrime ministerमेघालयनागालैंडNagaland
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