Archive, Author at पाञ्चजन्य - 1064 का पृष्ठ 158
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देश की मौजूदा आर्थिक स्थिति, जीएसटी, एनपीए, काला धन और रोजगार की स्थिति के संदर्भ में पाञ्चजन्य के सहयोगी संपादक आलोक गोस्वामी ने केन्द्रीय वित्त राज्यमंत्री श्री जयंत सिन्हा से लंबी बातचीत की। यहां हम उसी वार्ता के प्रमुख अंश प्रकाशित कर रहे हैं आज सरकार की तरफ से एक बहुत सुखद अनुभूति कराई जा रही है कि आर्थिक क्षेत्र में प्रगति हो रही है। लेकिन कुछ ऐसे मुद्दे भी होंगे जो स्थिति को असहज करते हैं। आपके हिसाब से वेे मुद्दे कौन से हैं? आज अगर हम संकट के मुद्दों की बात करें तो ऐसे चार मुद्दे नजर में आते हैं। सबसे तात्कालिक और सबसे अधिक खतरे वाला पहला मुद्दा है-एन.पी.ए.। इसके तहत हमें बैंकों को और पूंजी देनी है। इसके साथ ही स्टील, रियल एस्टेट, ऊर्जा जैसे कई उद्योग हैं जो आज संकट में हैं। इसके कारण भी एनपी.ए. का मुद्दा महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि इसके तहत 8 लाख करोड़ के स्ट्रेच्ड एसेस्ट्स हैं। इसके कारण बैंकों को घाटे में जाना पड़ रहा है। इसलिए यह एक बहुत बड़ी समस्या बनी हुई है जिसका हमें जल्द से जल्द समाधान करना है। दूसरा असहज करने वाला मुद्दा है—जी.एस.टी.। इसमें खतरा यह है कि अगर जी.एस.टी. बिल इस मानसून सत्र में पारित नहीं होता तो हम अप्रैल 2017 में इसे लागू नहीं कर पाएंगे। हो सकता है यह 2018 तक  खिंच जाए जब हमारी सरकार का कार्यकाल एक ही साल रह जाएगा जिससे इसके क्रियान्वयन में दिक्कतें आ सकती हैं। इसके लागू होने से आर्थिक प्रगति में गति आएगी, क्योंकि इससे महंगाई कम होगी, रोजगार बढ़ेगा, कंपनियों के खर्चे कम होंगे, 'टैक्स-बेस' बढ़ेगा। तो जी.एस.टी. लागू न होने से हमको काफी हानि हो सकती है। तीसरा और अभी मात्रा की जानकारी न होने वाला मुद्दा है— तेल की कीमतें। ये कीमतें गिरकर 35-40 डालर प्रति बैरल तक आ गई थीं, पर अब 50 डालर हो गई हैं यानी बढ़ती जा रही हैं। अभी तक सबका मानना यही है कि दाम ज्यादा से ज्यादा 55-60 डॉलर प्रति बैरल तक जाएंगे, पर इन सब चीजों के बारे में पहले से नहीं कहा जा सकता। सब अनिश्चित रहता है। भगवान न करे, मध्य एशिया में युद्ध छिड़ गया तो? इराक में चल रहा तेल का उत्पादन अगर आईएसआईएस की वजह से रुक गया तो? सऊदी अरब और ईरान के बीच मौजूदा प्रतियोगी भावना कम हुई तो वे दोनों अपने यहां तेल का दाम बढ़ा सकते हैं। वेनेजुएला में तेल का उत्पादन अच्छा है, मगर वहां भी दिक्कतें चल रही हैं। इन हालात के चलते अगर कीमत 80-90 डॉलर प्रति बैरल पहंुच गई तो भारी मुश्किल खड़ी हो जाएगी।    हमारी चिंता का चौथा विषय है-मानसून यानी बरसात। विशेषज्ञों का मानना है कि इस बार अच्छी बरसात होगी। मौसम विभाग ने 106 प्रतिशत बारिश होने का अनुमान लगाया है। बताया गया कि पूर्वी हिस्से में कम बारिश होगी जबकि वह हिस्सा पूरा मानसून पर आश्रित रहता है। वहां अच्छा पानी नहीं पड़ा तो झारखण्ड वगैरह में दिक्कत पैदा हो जाएगी। वहां पिछले 2 साल से सूखा रहा है। अगर तीसरे साल भी ऐसी ही स्थिति रही तो दिक्तत बढ़ सकती है। पनामा के संदर्भ में चिन्हित लोगों को चिट्ठी लिखने से जांच कितनी आगे बढ़ी है? जांच होती है तो उसके कई कदम होते हैं। पहला कदम चिट्ठी लिखना होता है। हमने मल्टी एजेंसी ग्रुप तैयार किया है। हम यह भी देख रहे हैं कि पनामा पेपर्स के रास्ते हमें और कहां-कहां की खबरें मिल सकती हैं। जी-20 ने कहा है कि विदेशों में टेक्स हैवन्स का जो खेल चलता था, उस पर कड़ाई से रोक लगेगी। इससे जाहिर है, ऐसे तमाम रास्ते बंद हो जाते हैं। हमने कई देशों के साथ करार किए हुए हैं जहां ऐसा पैसा रखा जाता है। वहां से भी हमें सूचियां मिल रही हैं। हमें हर साल सब बैंक खातों की जानकारी मिल जाती है।  क्या ऐसा नहीं है कि इसमें कुछ चीजें तो ऊपर वाले के हाथ में हैं, कुछ ऊपरी सदन के हाथ में? हमें जहां, जो भी अपने काबू की चीज लगी, जिसे हम ठीक कर सकते थे, वह तो हमने ठीक कर ही दी हैं। अब जो बचा है वह हमारे हाथ में नहीं है। किसी भी संकट के वक्त देखा जाता है कि आपके मेक्रो-इकोनॉमिक फंडामेंटल्स कैसे हैं। तो हमने उनको भी मजबूत बना दिया है। तो इन अनिश्चित संकटों से निपटने के लिए हम जो भी कर सकते थे, वह कर दिया है।   एन.पी.ए. की फिलहाल क्या स्थिति है? एन.पी.ए. पर हमने बहुत काम किया है। हमने बहुत पारदर्शी तरीके से, बैंकों के लेखा विवरणों द्वारा इसे सिद्ध किया है। एन.पी.ए. का मामला एक गुब्बारे जैसा समझिए। उसमें भरी जाने वाली हवा है एन.पी.ए.। तो अगर आप एक हद से ज्यादा हवा भर देंगे तो वह फट पड़ेगा। इसलिए हमें जरूरत से ज्यादा हवा यानी एन.पी.ए. को 'पोजीशनिंग' करके उस स्तर पर लाना होगा जिससे गुब्बारा न फटे। इसीलिए हमें एन.पी.ए. पर पूरी तरह से लगाम लगानी होगी। इसलिए एन.पी.ए. को घोषित करना बहुत जरूरी काम था। अगर इसे दबाए रखते तो विस्फोट हो जाता। जिन-जिन देशों में इसका समाधान नहीं किया गया वहां अर्थव्यवस्था धराशायी हो गई। ग्रीस में यही हुआ।  ज्यादा ऋण दिया जाना इसकी वजह बना। उस 'बैलेंसशीट रिसेशन' के कारण जीडीपी सालों तक कम रही है। आज यूरोप में अगर प्रगति नहीं हुई है तो उसका कारण बैलेंसशीट रिसेशन ही रहा है। 90 के दशक में जापान में एक बड़ी गिरावट देखने में आई थी। अभी भी वे उससे उबर नहीं पाए हैं। अमेरिका का हाल सब जानते ही हैं। ल्ल    जीएसटी को पारित कराने के लिए आपकी योजना नंबर 2 है राज्यसभा से इसकी मंजूरी। लेकिन राज्यसभा का रुख देखते हुए, योजना नंबर 1 क्या है? योजना नंबर 1 यही है कि हम इसे राज्यसभा में पेश करें और इस पर वोट हो। वोट होगा तो जीत हमारी होनी चाहिए, क्योंकि आंकड़े फिलहाल हमारे पक्ष में हैं। क्योंकि कांग्रेस और कम्युनिस्ट इसके खिलाफ वोट करें तो भी हम 2/3 बहुमत पा सकते हैं। देखना यही है कि अन्नाद्रमुक क्या करेगी। अन्नाद्रमुक अगर वोट में भाग नहीं लेती तो भी यह पारित हो जाएगा।

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