देश की मौजूदा आर्थिक स्थिति, जीएसटी, एनपीए, काला धन और रोजगार की स्थिति के संदर्भ में पाञ्चजन्य के सहयोगी संपादक आलोक गोस्वामी ने केन्द्रीय वित्त राज्यमंत्री श्री जयंत सिन्हा से लंबी बातचीत की। यहां हम उसी वार्ता के प्रमुख अंश प्रकाशित कर रहे हैं आज सरकार की तरफ से एक बहुत सुखद अनुभूति कराई जा रही है कि आर्थिक क्षेत्र में प्रगति हो रही है। लेकिन कुछ ऐसे मुद्दे भी होंगे जो स्थिति को असहज करते हैं। आपके हिसाब से वेे मुद्दे कौन से हैं? आज अगर हम संकट के मुद्दों की बात करें तो ऐसे चार मुद्दे नजर में आते हैं। सबसे तात्कालिक और सबसे अधिक खतरे वाला पहला मुद्दा है-एन.पी.ए.। इसके तहत हमें बैंकों को और पूंजी देनी है। इसके साथ ही स्टील, रियल एस्टेट, ऊर्जा जैसे कई उद्योग हैं जो आज संकट में हैं। इसके कारण भी एनपी.ए. का मुद्दा महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि इसके तहत 8 लाख करोड़ के स्ट्रेच्ड एसेस्ट्स हैं। इसके कारण बैंकों को घाटे में जाना पड़ रहा है। इसलिए यह एक बहुत बड़ी समस्या बनी हुई है जिसका हमें जल्द से जल्द समाधान करना है। दूसरा असहज करने वाला मुद्दा है—जी.एस.टी.। इसमें खतरा यह है कि अगर जी.एस.टी. बिल इस मानसून सत्र में पारित नहीं होता तो हम अप्रैल 2017 में इसे लागू नहीं कर पाएंगे। हो सकता है यह 2018 तक  खिंच जाए जब हमारी सरकार का कार्यकाल एक ही साल रह जाएगा जिससे इसके क्रियान्वयन में दिक्कतें आ सकती हैं। इसके लागू होने से आर्थिक प्रगति में गति आएगी, क्योंकि इससे महंगाई कम होगी, रोजगार बढ़ेगा, कंपनियों के खर्चे कम होंगे, 'टैक्स-बेस' बढ़ेगा। तो जी.एस.टी. लागू न होने से हमको काफी हानि हो सकती है। तीसरा और अभी मात्रा की जानकारी न होने वाला मुद्दा है— तेल की कीमतें। ये कीमतें गिरकर 35-40 डालर प्रति बैरल तक आ गई थीं, पर अब 50 डालर हो गई हैं यानी बढ़ती जा रही हैं। अभी तक सबका मानना यही है कि दाम ज्यादा से ज्यादा 55-60 डॉलर प्रति बैरल तक जाएंगे, पर इन सब चीजों के बारे में पहले से नहीं कहा जा सकता। सब अनिश्चित रहता है। भगवान न करे, मध्य एशिया में युद्ध छिड़ गया तो? इराक में चल रहा तेल का उत्पादन अगर आईएसआईएस की वजह से रुक गया तो? सऊदी अरब और ईरान के बीच मौजूदा प्रतियोगी भावना कम हुई तो वे दोनों अपने यहां तेल का दाम बढ़ा सकते हैं। वेनेजुएला में तेल का उत्पादन अच्छा है, मगर वहां भी दिक्कतें चल रही हैं। इन हालात के चलते अगर कीमत 80-90 डॉलर प्रति बैरल पहंुच गई तो भारी मुश्किल खड़ी हो जाएगी।    हमारी चिंता का चौथा विषय है-मानसून यानी बरसात। विशेषज्ञों का मानना है कि इस बार अच्छी बरसात होगी। मौसम विभाग ने 106 प्रतिशत बारिश होने का अनुमान लगाया है। बताया गया कि पूर्वी हिस्से में कम बारिश होगी जबकि वह हिस्सा पूरा मानसून पर आश्रित रहता है। वहां अच्छा पानी नहीं पड़ा तो झारखण्ड वगैरह में दिक्कत पैदा हो जाएगी। वहां पिछले 2 साल से सूखा रहा है। अगर तीसरे साल भी ऐसी ही स्थिति रही तो दिक्तत बढ़ सकती है। पनामा के संदर्भ में चिन्हित लोगों को चिट्ठी लिखने से जांच कितनी आगे बढ़ी है? जांच होती है तो उसके कई कदम होते हैं। पहला कदम चिट्ठी लिखना होता है। हमने मल्टी एजेंसी ग्रुप तैयार किया है। हम यह भी देख रहे हैं कि पनामा पेपर्स के रास्ते हमें और कहां-कहां की खबरें मिल सकती हैं। जी-20 ने कहा है कि विदेशों में टेक्स हैवन्स का जो खेल चलता था, उस पर कड़ाई से रोक लगेगी। इससे जाहिर है, ऐसे तमाम रास्ते बंद हो जाते हैं। हमने कई देशों के साथ करार किए हुए हैं जहां ऐसा पैसा रखा जाता है। वहां से भी हमें सूचियां मिल रही हैं। हमें हर साल सब बैंक खातों की जानकारी मिल जाती है।  क्या ऐसा नहीं है कि इसमें कुछ चीजें तो ऊपर वाले के हाथ में हैं, कुछ ऊपरी सदन के हाथ में? हमें जहां, जो भी अपने काबू की चीज लगी, जिसे हम ठीक कर सकते थे, वह तो हमने ठीक कर ही दी हैं। अब जो बचा है वह हमारे हाथ में नहीं है। किसी भी संकट के वक्त देखा जाता है कि आपके मेक्रो-इकोनॉमिक फंडामेंटल्स कैसे हैं। तो हमने उनको भी मजबूत बना दिया है। तो इन अनिश्चित संकटों से निपटने के लिए हम जो भी कर सकते थे, वह कर दिया है।   एन.पी.ए. की फिलहाल क्या स्थिति है? एन.पी.ए. पर हमने बहुत काम किया है। हमने बहुत पारदर्शी तरीके से, बैंकों के लेखा विवरणों द्वारा इसे सिद्ध किया है। एन.पी.ए. का मामला एक गुब्बारे जैसा समझिए। उसमें भरी जाने वाली हवा है एन.पी.ए.। तो अगर आप एक हद से ज्यादा हवा भर देंगे तो वह फट पड़ेगा। इसलिए हमें जरूरत से ज्यादा हवा यानी एन.पी.ए. को 'पोजीशनिंग' करके उस स्तर पर लाना होगा जिससे गुब्बारा न फटे। इसीलिए हमें एन.पी.ए. पर पूरी तरह से लगाम लगानी होगी। इसलिए एन.पी.ए. को घोषित करना बहुत जरूरी काम था। अगर इसे दबाए रखते तो विस्फोट हो जाता। जिन-जिन देशों में इसका समाधान नहीं किया गया वहां अर्थव्यवस्था धराशायी हो गई। ग्रीस में यही हुआ।  ज्यादा ऋण दिया जाना इसकी वजह बना। उस 'बैलेंसशीट रिसेशन' के कारण जीडीपी सालों तक कम रही है। आज यूरोप में अगर प्रगति नहीं हुई है तो उसका कारण बैलेंसशीट रिसेशन ही रहा है। 90 के दशक में जापान में एक बड़ी गिरावट देखने में आई थी। अभी भी वे उससे उबर नहीं पाए हैं। अमेरिका का हाल सब जानते ही हैं। ल्ल    जीएसटी को पारित कराने के लिए आपकी योजना नंबर 2 है राज्यसभा से इसकी मंजूरी। लेकिन राज्यसभा का रुख देखते हुए, योजना नंबर 1 क्या है? योजना नंबर 1 यही है कि हम इसे राज्यसभा में पेश करें और इस पर वोट हो। वोट होगा तो जीत हमारी होनी चाहिए, क्योंकि आंकड़े फिलहाल हमारे पक्ष में हैं। क्योंकि कांग्रेस और कम्युनिस्ट इसके खिलाफ वोट करें तो भी हम 2/3 बहुमत पा सकते हैं। देखना यही है कि अन्नाद्रमुक क्या करेगी। अन्नाद्रमुक अगर वोट में भाग नहीं लेती तो भी यह पारित हो जाएगा।
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देश की मौजूदा आर्थिक स्थिति, जीएसटी, एनपीए, काला धन और रोजगार की स्थिति के संदर्भ में पाञ्चजन्य के सहयोगी संपादक आलोक गोस्वामी ने केन्द्रीय वित्त राज्यमंत्री श्री जयंत सिन्हा से लंबी बातचीत की। यहां हम उसी वार्ता के प्रमुख अंश प्रकाशित कर रहे हैं आज सरकार की तरफ से एक बहुत सुखद अनुभूति कराई जा रही है कि आर्थिक क्षेत्र में प्रगति हो रही है। लेकिन कुछ ऐसे मुद्दे भी होंगे जो स्थिति को असहज करते हैं। आपके हिसाब से वेे मुद्दे कौन से हैं? आज अगर हम संकट के मुद्दों की बात करें तो ऐसे चार मुद्दे नजर में आते हैं। सबसे तात्कालिक और सबसे अधिक खतरे वाला पहला मुद्दा है-एन.पी.ए.। इसके तहत हमें बैंकों को और पूंजी देनी है। इसके साथ ही स्टील, रियल एस्टेट, ऊर्जा जैसे कई उद्योग हैं जो आज संकट में हैं। इसके कारण भी एनपी.ए. का मुद्दा महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि इसके तहत 8 लाख करोड़ के स्ट्रेच्ड एसेस्ट्स हैं। इसके कारण बैंकों को घाटे में जाना पड़ रहा है। इसलिए यह एक बहुत बड़ी समस्या बनी हुई है जिसका हमें जल्द से जल्द समाधान करना है। दूसरा असहज करने वाला मुद्दा है—जी.एस.टी.। इसमें खतरा यह है कि अगर जी.एस.टी. बिल इस मानसून सत्र में पारित नहीं होता तो हम अप्रैल 2017 में इसे लागू नहीं कर पाएंगे। हो सकता है यह 2018 तक  खिंच जाए जब हमारी सरकार का कार्यकाल एक ही साल रह जाएगा जिससे इसके क्रियान्वयन में दिक्कतें आ सकती हैं। इसके लागू होने से आर्थिक प्रगति में गति आएगी, क्योंकि इससे महंगाई कम होगी, रोजगार बढ़ेगा, कंपनियों के खर्चे कम होंगे, 'टैक्स-बेस' बढ़ेगा। तो जी.एस.टी. लागू न होने से हमको काफी हानि हो सकती है। तीसरा और अभी मात्रा की जानकारी न होने वाला मुद्दा है— तेल की कीमतें। ये कीमतें गिरकर 35-40 डालर प्रति बैरल तक आ गई थीं, पर अब 50 डालर हो गई हैं यानी बढ़ती जा रही हैं। अभी तक सबका मानना यही है कि दाम ज्यादा से ज्यादा 55-60 डॉलर प्रति बैरल तक जाएंगे, पर इन सब चीजों के बारे में पहले से नहीं कहा जा सकता। सब अनिश्चित रहता है। भगवान न करे, मध्य एशिया में युद्ध छिड़ गया तो? इराक में चल रहा तेल का उत्पादन अगर आईएसआईएस की वजह से रुक गया तो? सऊदी अरब और ईरान के बीच मौजूदा प्रतियोगी भावना कम हुई तो वे दोनों अपने यहां तेल का दाम बढ़ा सकते हैं। वेनेजुएला में तेल का उत्पादन अच्छा है, मगर वहां भी दिक्कतें चल रही हैं। इन हालात के चलते अगर कीमत 80-90 डॉलर प्रति बैरल पहंुच गई तो भारी मुश्किल खड़ी हो जाएगी।    हमारी चिंता का चौथा विषय है-मानसून यानी बरसात। विशेषज्ञों का मानना है कि इस बार अच्छी बरसात होगी। मौसम विभाग ने 106 प्रतिशत बारिश होने का अनुमान लगाया है। बताया गया कि पूर्वी हिस्से में कम बारिश होगी जबकि वह हिस्सा पूरा मानसून पर आश्रित रहता है। वहां अच्छा पानी नहीं पड़ा तो झारखण्ड वगैरह में दिक्कत पैदा हो जाएगी। वहां पिछले 2 साल से सूखा रहा है। अगर तीसरे साल भी ऐसी ही स्थिति रही तो दिक्तत बढ़ सकती है। पनामा के संदर्भ में चिन्हित लोगों को चिट्ठी लिखने से जांच कितनी आगे बढ़ी है? जांच होती है तो उसके कई कदम होते हैं। पहला कदम चिट्ठी लिखना होता है। हमने मल्टी एजेंसी ग्रुप तैयार किया है। हम यह भी देख रहे हैं कि पनामा पेपर्स के रास्ते हमें और कहां-कहां की खबरें मिल सकती हैं। जी-20 ने कहा है कि विदेशों में टेक्स हैवन्स का जो खेल चलता था, उस पर कड़ाई से रोक लगेगी। इससे जाहिर है, ऐसे तमाम रास्ते बंद हो जाते हैं। हमने कई देशों के साथ करार किए हुए हैं जहां ऐसा पैसा रखा जाता है। वहां से भी हमें सूचियां मिल रही हैं। हमें हर साल सब बैंक खातों की जानकारी मिल जाती है।  क्या ऐसा नहीं है कि इसमें कुछ चीजें तो ऊपर वाले के हाथ में हैं, कुछ ऊपरी सदन के हाथ में? हमें जहां, जो भी अपने काबू की चीज लगी, जिसे हम ठीक कर सकते थे, वह तो हमने ठीक कर ही दी हैं। अब जो बचा है वह हमारे हाथ में नहीं है। किसी भी संकट के वक्त देखा जाता है कि आपके मेक्रो-इकोनॉमिक फंडामेंटल्स कैसे हैं। तो हमने उनको भी मजबूत बना दिया है। तो इन अनिश्चित संकटों से निपटने के लिए हम जो भी कर सकते थे, वह कर दिया है।   एन.पी.ए. की फिलहाल क्या स्थिति है? एन.पी.ए. पर हमने बहुत काम किया है। हमने बहुत पारदर्शी तरीके से, बैंकों के लेखा विवरणों द्वारा इसे सिद्ध किया है। एन.पी.ए. का मामला एक गुब्बारे जैसा समझिए। उसमें भरी जाने वाली हवा है एन.पी.ए.। तो अगर आप एक हद से ज्यादा हवा भर देंगे तो वह फट पड़ेगा। इसलिए हमें जरूरत से ज्यादा हवा यानी एन.पी.ए. को 'पोजीशनिंग' करके उस स्तर पर लाना होगा जिससे गुब्बारा न फटे। इसीलिए हमें एन.पी.ए. पर पूरी तरह से लगाम लगानी होगी। इसलिए एन.पी.ए. को घोषित करना बहुत जरूरी काम था। अगर इसे दबाए रखते तो विस्फोट हो जाता। जिन-जिन देशों में इसका समाधान नहीं किया गया वहां अर्थव्यवस्था धराशायी हो गई। ग्रीस में यही हुआ।  ज्यादा ऋण दिया जाना इसकी वजह बना। उस 'बैलेंसशीट रिसेशन' के कारण जीडीपी सालों तक कम रही है। आज यूरोप में अगर प्रगति नहीं हुई है तो उसका कारण बैलेंसशीट रिसेशन ही रहा है। 90 के दशक में जापान में एक बड़ी गिरावट देखने में आई थी। अभी भी वे उससे उबर नहीं पाए हैं। अमेरिका का हाल सब जानते ही हैं। ल्ल    जीएसटी को पारित कराने के लिए आपकी योजना नंबर 2 है राज्यसभा से इसकी मंजूरी। लेकिन राज्यसभा का रुख देखते हुए, योजना नंबर 1 क्या है? योजना नंबर 1 यही है कि हम इसे राज्यसभा में पेश करें और इस पर वोट हो। वोट होगा तो जीत हमारी होनी चाहिए, क्योंकि आंकड़े फिलहाल हमारे पक्ष में हैं। क्योंकि कांग्रेस और कम्युनिस्ट इसके खिलाफ वोट करें तो भी हम 2/3 बहुमत पा सकते हैं। देखना यही है कि अन्नाद्रमुक क्या करेगी। अन्नाद्रमुक अगर वोट में भाग नहीं लेती तो भी यह पारित हो जाएगा।

Written byArchiveArchive
Jun 13, 2016, 12:00 am IST
inArchive

''पटरी पर लाए हैं विकास की गाड़ी''

दिंनाक: 13 Jun 2016 13:05:42

  आपको लगता है कि इस बार यह पारित हो जाएगा?

हम तो यही सोचते हैं कि इस बार यह पारित हो जाएगा। ये हमारी अपेक्षाएं हैं और इसीलिए हम इसे पेश करके इस पर बहस और वोट चाहते हैं। हमारे वित्त मंत्री ने पिछली बार बजट पर जवाब देते हुए साफ कहा था कि कांग्रेस की इस पर तीन शर्तें बिल्कुल गलत हैं। इसलिए हमको उन शर्तों को नहीं मानना चाहिए। हमने उनकी एक शर्त 1 प्रतिशत सप्लाई टैक्स वाली मानी है।

  आर्थिक मोर्चे पर चार प्रमुख संकटों की बात हुई। चार प्रमुख सफलताएं क्या रहीं आपकी?

नंबर एक सफलता तो हमारा आर्थिक स्थिति में सुधार लाना ही है। हमें सरकार की कमान मिली तो विकास पटरी पर नहीं था। उसे हम पटरी पर लाए। इतना ही नहीं, विकास की पैसेंजर ट्रेन को हमने राजधानी एक्सप्रेस बनाया। हम जिन आंकड़ों के आधार पर विकास की समीक्षा करते हैं, चाहे वह आर्थिक घाटा हो, चालू खाता घाटा हो, मुद्रास्फीति हो, जीडीपी प्रगति दर हो, पूंजी निवेश की दर हो, ये सारे सूचक बिगड़ी हालत में थे। यानी विकास की रेल पटरी से उतरी पड़ी थी। हमने इसे संकट के दौर से न सिर्फ उबारा, बल्कि इसे पूरे विश्व में चमकता सितारा बनाया। यह हुआ नंबर एक यानी-मेक्रो इकोनोमिक स्टेबिलाइजेशन यानी आर्थिक स्थायित्व के लिए बड़े उपाय। आर्थिक घाटे को हम 4.4 से 3.5 प्रतिशत पर ले आए, मुद्रास्फीति को 10 से 5.6 प्रतिशत पर ले आए, चालू खाता घाटा 5 प्रतिशत था, उसे 1-1.5 प्रतिशत कर दिया।
नंबर दो है सामाजिक सुरक्षा का मोर्चा, जिसके अंतर्गत जन-धन योजना, जीवन ज्योति, सुरक्षा बीमा, मुद्रा आदि आते हैं। सामाजिक सुरक्षा के लिहाज से ये ऐतिहासिक काम हैं।
नंबर तीन-जन-निवेश में क्रांति आई है। चाहे हम सड़कों के माध्यम से देखें, सिंचाई, रेल या ऊर्जा के माध्यम से देखें।
नंबर चार है-ग्रामीण क्रांति। हर गांव में सड़क, बिजली, शौचालय, हर खेत को पानी, इसके जरिए ग्रामीण क्षेत्र में क्रांति लाए हैं हम। गांवों में हम इन बुनियादी सुविधाओं को युद्ध स्तर पर पूरा कर रहे हैं।

  इस सरकार से लोगों की सबसे बड़ी उम्मीद भ्रष्टाचार को समाप्त करने की रही है, आपके अभियान की क्या स्थिति है? 

निस्संदेह हमलोग भ्रष्टाचार को खत्म करना चाहते हैं। कालाधन भ्रष्टाचार का ही एक चिन्ह है।दोनों एक दूसरे पर आश्रित हैं। कालाधन कम करें तो भ्रष्टाचार भी कम होगा। इसलिए हमने दोनों में दबाव बनाया है। भ्रष्टाचार को लेकर हमारे किए कामों को सब जानते ही हैं, पर काले धन पर हमारे काम के दो पहलू हैं। पहला, किसी का काला धन देश में हो या विदेश में, हमने एक कम्प्लायंस विंडो खोलकर लोगों को एक मौका दिया है जिसमें वे जो भी पैसा सार्वजनिक करना चाहते हैं, कर दें। इसके साथ हमने एक जुर्माना दर भी जोड़ी। अगर कालाधन विदेश में था तो जुर्माना 30 प्रतिशत था, देश में था तो यह दर 15 प्रतिशत थी। यानी बचने का रास्ता नहीं था। साथ ही हमने एक शॉर्ट कम्प्लायंस विंडो भी दी दोनों तरह के कालेधन के लिए, 1 जून से 30 सितंबर तक की। इस दौरान काले धन को सार्वजनिक करें। इससे हमें बहुत ज्यादा पैसा मिलने की अपेक्षा नहीं थी, न ही यह हमारा लक्ष्य था। हमारा लक्ष्य था, लोगों को एक मौका देना ताकि बाद में कोई यह न कह सके कि उसे न्याय का मौका नहीं दिया गया। अब हमने वह विंडो बंद कर दी है, चाहे किसी के पास विदेशी काला धन हो, या देश में। अब जो कानून बना है वह बहुत सख्त है। हमने बाजार में जो कालाधन घूम रहा था, उस पर भी लगाम लगाई है। नगद ही नहीं, बड़ी मात्रा में गैर नकद लेन-देन पर भी हमारी नजर रहेगी, हमने रियल एस्टेट में 20 हजार से ज्यादा नगद राशि देना बंद करा दिया है। इससे भ्रष्टाचारियों का भ्रष्टाचार करना मुश्किल हो गया है।

 रोजगार का अकाल है। क्या यह बात सच है?

अभी इसके पूरे आंकड़े नहीं आए हैं क्योंकि इससे संबंधित डाटा उपलब्ध ही नहीं है। आज भी लोग 2011-13 के आंकड़े ही देख रहेे हैं। जो आंकड़े आए हैं, उनमें दो बड़ी कमियां हैं। यह जरूर है कि मुद्रा के तहत करीब 3.48 करोड़ लोगों में डेढ़ लाख करोड़ के आस-पास राशि वितरित हुई है। 

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