बहुआयामी वीर सावरकर (10वीं कड़ी)
सावरकर ने भाषा और लिपि को राष्ट्रनिर्माण का महत्वपूर्ण साधन माना और नागरी को राष्ट्रलिपि बनाने और उसे व्यावहारिक रूप से अधिक उपयोगी बनाने के लिए लिपिशुद्धि आंदोलन का नेतृत्व किया
वीर सावरकर देवनागरी को राष्ट्रीय लिपि के रूप में प्रतिष्ठित देखना चाहते थे। यद्यपि इस विचार के वे प्रथम प्रवर्तक नहीं थे, उन्होंने लिपिशुद्धि आंदोलन चलाया और उसके सिद्धांतों का स्वयं पालन किया। वह समूचे भारत के लिए नागरी को समान राष्ट्रीय लिपि बनाने के सबसे मुखर वक्ता थे।
भाषा और लिपि
भाषा और लिपि दोनों भिन्न होती हैं,मनुष्य अपने विचारों और भावों को जिस माध्यम से व्यक्त करता है, उसे भाषा कहते हैं। ध्वनि के माध्यम से होने वाली अभिव्यक्ति पशु-पक्षियों में भी पाई जाती है, मनुष्य की भाषा उसका विकसित रूप है। जब यही मनोगत लिखित रूप धारण करता है, तब उसे लिपि कहा जाता है। बोलना मनुष्य की स्वाभाविक क्रिया है, जबकि लिखना उसकी सांस्कृतिक उपलब्धि है। वाणी क्षणिक होती है, परंतु लेखन स्थायी और दूरगामी प्रभाव वाला होता है। इसलिए मानव-सभ्यता के विकास में लिपि का महत्व अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।
नागरी वर्णमाला
सावरकर के अनुसार नागरी वर्णमाला भारतीय बुद्धि का अद्भुत चमत्कार है, क्योंकि इसमें ध्वनियों का स्थानगत वर्गीकरण किया गया है। संस्कृत के अतिरिक्त किसी भी प्राचीन अथवा आधुनिक लिपि में ऐसा वैज्ञानिक वर्गीकरण नहीं मिलता।
नागरी वर्णमाला का क्रम अत्यंत सूत्रबद्ध है। पहले स्वर, उसके बाद कंठ्य, तालव्य, मूर्धन्य, दंत्य और ओष्ठ्य व्यंजनों का क्रम अत्यंत वैज्ञानिक है। सामान्यतः एक ध्वनि के लिए एक ही वर्ण निर्धारित है। श, ष और स जैसे कुछ अपवाद अवश्य हैं, किंतु उनके उच्चारण में भी सूक्ष्म भेद विद्यमान है।
‘ओंकार’ की उत्पत्ति पर विचार करते हुए सावरकर लिखते हैं कि भारतीय मनीषियों ने संभवतः वर्णों की रचना उच्चारण के समय मुख और शरीर की बनने वाली आकृति के अनुरूप की होगी। अ, उ, ए आदि का उच्चारण करते समय मुख और जिह्वा की जो मुद्रा बनती है, वह उन वर्णों के आकार से साम्य रखती है।
वास्तव में नागरी वर्णों का यह रहस्य मुख-आकृति विज्ञान (Articulatory Phonetics) में निहित है। ऋ ग्वेद-प्रातिशाख्य तथा तैत्तिरीय-प्रातिशाख्य में इसके प्राचीन प्रमाण मिलते हैं। उदाहरणार्थ- ‘ओष्ठयोपसंहृतावेकारोकारौ। उकारोपसंहृततरौ।’ अर्थात् उ और ऊ का उच्चारण करते समय होंठ पूर्णतः गोल और संकुचित हो जाते हैं। महर्षि पाणिनि भी संकेत करते हैं कि ‘अ’ के उच्चारण में मुख अपेक्षाकृत संकुचित रहता है, जबकि ‘आ’ बोलते समय वह पूर्णतः खुल जाता है। इसी कारण नागरी वर्णमाला भारतीय मनीषा की अद्भुत वैज्ञानिक उपलब्धि मानी जाती है।
रोमन या पर्शियन लिपि
सावरकर के अनुसार ऐसी वैज्ञानिक संरचना न तो रोमन लिपि में मिलती है और न ही पर्शियन, चीनी अथवा जापानी लिपियों में। चीनी और जापानी मूलतः चित्रलिपियां हैं। रोमन वर्णमाला में A, B, C, D, E आदि स्वर और व्यंजन मिश्रित क्रम में चलते हैं। पर्शियन में भी अलिफ, बे, पे, ते, जीम आदि का क्रम इसी प्रकार है।
इन लिपियों में अनेक वर्णों का उच्चारण दो या तीन ध्वनियों के योग से होता है। उदाहरण के लिए Y (वाय), W (डब्ल्यू) अथवा अलिफ और जीम जैसे वर्ण। इसके विपरीत नागरी वर्णमाला ध्वनि और वर्ण के बीच अधिक स्पष्ट एवं वैज्ञानिक संबंध स्थापित करती है। इतनी वैज्ञानिकता होने के पश्चात लिपिशुद्धि आंदोलन चलाना पड़ा। इसका कारण स्वयं लिपि नहीं, बल्कि मुद्रण और टंकण की व्यावहारिक कठिनाइयां थीं।
रोमन को बढ़ावा देने के प्रयास
सावरकर का मत था, ‘एक दृष्टि से देखा जाए तो भाषाशुद्धि आंदोलन से भी लिपिशुद्धि आंदोलन अधिक आवश्यक है। भाषाशुद्धि के अधिकांश कारण भावनात्मक हैं, किंतु लिपिशुद्धि की सफलता पर राष्ट्र का केवल भावनात्मक ही नहीं, बल्कि प्रत्यक्ष व्यावहारिक हित भी आधारित है।’ – नागरी लिपि शुद्धि आंदोलन, पृ. 23
सावरकर को आशंका थी कि मुद्रण की सुविधा के नाम पर ब्रिटिश शासन नागरी के स्थान पर रोमन लिपि को बढ़ावा देगा। उस समय कमाल पाशा द्वारा तुर्की में अरबी लिपि छोड़कर रोमन लिपि अपनाने का उदाहरण देकर भारत में भी रोमन लिपि की वकालत की जा रही थी। सुभाषचंद्र बोस जैसे कुछ वरिष्ठ नेता भी इस विचार से प्रभावित थे।
यह दृष्टिकोण सावरकर की स्वतंत्र एवं वैज्ञानिक चिंतन-पद्धति का परिचायक है। वे किसी विचार को केवल उसके विदेशी या प्रचलित होने के कारण स्वीकार नहीं करते थे, बल्कि उसकी उपयोगिता का मूल्यांकन भारतीय परिस्थितियों के आधार पर करते थे।
इसीलिए नागरी को रोमन से भी अधिक सुलभ बनाने के उद्देश्य से सावरकर ने लिपिशुद्धि के निम्नलिखित सुझाव दिए-
- ‘अ’ की बारहखड़ी अ, आ, अि, अी, अु, अू, अे, अै, ओ, औ, अं, अः -इस बारहखड़ी के प्रयोग से आठ अक्षर और आठ टंक कम हो गए। सावरकर ने इसी पद्धति का प्रयोग अंडमान में सैकड़ों निरक्षर बंदियों को साक्षर बनाने के लिए किया था। उनके अनुभव के अनुसार इससे पढ़ना-लिखना सीखना अधिक सरल हो जाता था।
- संयुक्ताक्षरों का सरलीकरण- संयुक्ताक्षरों को तोड़कर लिखने का सुझाव। उदाहरणार्थ-रक्त, पद्म, पद्य आदि जिससे संयुक्ताक्षरों को लगनेवाले अलग टंको की जरुरत नही रही। उसी प्रकार र पांच पद्धति से लिखा जाता था जैसे र, र्य, प्र, ट्र, -य सावरकरजी ने उसे कानायुक्त कर दिया। इसीप्रकार द, त आदि के साथ करनेसे पचास टंक कम हुए।
- कुछ वर्णों के लेखन में एकरूपता – क, फ, र तथा ल जैसे वर्णों के लेखन में एकरूपता लाने का सुझाव दिया, फलतः दस टंक कम हो गए का।
- अर्धाक्षरों का सरलीकरण – ट, ठ, ड, ढ, द, ङ, छ, ह तथा ळ जैसे वर्णों के अर्धरूपों के स्थान पर सरल व्यवस्था अपनाने अथवा अन्य उपयुक्त योजना विकसित करने का सुझाव दिया।
सावरकर के इस सुधार से टंकपेटी में जहां 200 टंक लगते थे वह 80 तक कम हो गए । धनंजय किर के अनुसार टंको की संख्या घटकर मात्र 36 तक रह जाती है । मुद्रण, टंकन तो सुलभ एवम कम खचीला हुआ ही, साथ ही नए सिखनेवाले को सत्तर-पचहत्तर अक्षर कम सीखने पढ़कर शिक्षा सुलभ हो गई। सावरकर के इस कार्य को देखते हुए उन्हें 1934 में दिल्ली में आयोजित हिंदी साहित्य सम्मेलन की लिपि सुधार समिति में सन्मान्य सदस्य के तौर पर चुना गया था । लेकिन स्थानबध्द होने के कारण सावरकर पद स्वीकार नहीं पाए। (रत्नागिरि पर्व)
लिपि-सुधार और गांधीजी
सावरकर का लिपिशुद्धि आंदोलन श्रद्धानंद से आरंभ होकर किर्लोस्कर, बलवंत आदि पत्र-पत्रिकाओं तक पहुंच चुका था। 1934 में इंदौर में आयोजित हिंदी साहित्य सम्मेलन में नागरी लिपि सुधार समिति का गठन हुआ। उसके संयोजक काका कालेलकर ने सावरकर द्वारा प्रचारित ‘अ’ की बारहखड़ी गांधीजी के समक्ष प्रस्तुत की।
यह पद्धति गांधीजी को इतनी उपयुक्त लगी कि उन्होंने हरिजन के मुद्रण में उसका प्रयोग प्रारंभ कर दिया। यह इस बात का प्रमाण है कि राष्ट्रलिपि के विकास के लिए सावरकर द्वारा सुझाए गए तकनीकी एवं रचनात्मक सुधारों को उनके वैचारिक विरोधियों ने भी, बिना उनका नाम लिए, स्वीकार किया। बाद में 1947 में आचार्य नरेंद्र देव की अध्यक्षता में गठित लिपि सुधार समिति ने इस पद्धति को निरस्त कर दिया। हालांकि 1949 में भारत सरकार द्वारा गठित काका कालेलकर की नेतृत्ववाली लिपि सुधार समिति ने सावरकर अनुप्राणित लगभग 75 प्रतिशत सुधार स्वीकृत किए।
राष्ट्रलिपि की संकल्पना
राजा राममोहन राय और ईश्वरचंद्र विद्यासागर देवनागरी के महत्व को भली-भांति समझते थे। गुजरात के उनकी मातृभाषा होने तथा संस्कृत के प्रकाण्ड विद्वान होने के बावजूद स्वामी दयानंद सरस्वती ने हिंदी भाषा और देवनागरी लिपि के प्रयोग पर विशेष बल दिया।
किन्तु न्यायमूर्ति महादेव गोविंद रानाडे संभवतः पहले ऐसे राष्ट्रनेता थे जिन्होंने 1887 में भारतीय राष्ट्रीय सामाजिक सम्मेलन के अवसर पर देवनागरी को राष्ट्रीय लिपि बनाने का विचार स्पष्ट रूप से रखा। उनके जीवनीकार जे. सी. घोष के अनुसार रानाडे भाषा और लिपि को केवल संप्रेषण का माध्यम नहीं, बल्कि राष्ट्रीय एकीकरण का सबसे प्रभावी साधन मानते थे। मराठी की मोडी लिपि के स्थान पर बालबोध (नागरी) के प्रचार में भी उनका महत्त्वपूर्ण योगदान था।
सन् 1905 में वाराणसी में नागरी प्रचारिणी सभा के तत्वावधान में आयोजित राष्ट्रीय अधिवेशन में लोकमान्य तिलक ने कहा था- ‘यदि हम पूरे भारत के लिए एक राष्ट्रीय भाषा चाहते हैं, तो उसकी लिपि देवनागरी ही हो सकती है।’
इसी वर्ष कोलकाता उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश शारदाचरण मित्र ने ‘एक लिपि विस्तार परिषद’ की स्थापना की। इसके माध्यम से 1907 में देवनागर नामक मासिक पत्रिका का प्रकाशन प्रारंभ हुआ, जिसमें बंगला, तमिल, कन्नड़, तेलुगु आदि भाषाओं की सामग्री नागरी लिपि में प्रकाशित की जाती थी। यद्यपि इस पत्रिका का प्रसार सीमित था, फिर भी शारदाचरण मित्र ने जीवनपर्यंत इसका प्रकाशन जारी रखा। उनका यह कार्य सदैव स्मरणीय रहेगा।
नागरी के प्रखर समर्थक
सावरकर का मत था कि यदि सभी भारतीय भाषाएं नागरी लिपि का प्रयोग करें, तो परस्पर संवाद अधिक सरल होगा और भाषाई दूरी स्वतः कम होगी। इसी उद्देश्य से उन्होंने विभिन्न भारतीय भाषाओं के समाचार-पत्रों से अनुरोध किया कि वे कम-से-कम एक स्तंभ नागरी लिपि में प्रकाशित करें। सावरकर जी के इस आह्वान पर गुजराती, बंगाली तथा पंजाबी के कुछ हिन्दू सभा समर्थक वृत्तपत्रों ने नागरी में स्तंभ प्रकाशित किए। उनका यह भी मत था कि यदि उर्दू, अरबी लिपि के स्थान पर नागरी लिपि का प्रयोग करे, तो सामाजिक दूरी और अलगाव की भावना कम हो सकती है। उल्लेखनीय है कि बाद में प्रसिद्ध गांधीवादी आचार्य विनोबा भावे ने भी नागरी लिपि के व्यापक प्रचार का समर्थन किया।
विहंगमावलोकन
सावरकर का मत था कि जिस प्रकार नागरी में आवश्यक सुधार किए जाएं, उसी प्रकार गुरुमुखी, गुजराती, बंगला आदि भारतीय लिपियों में भी समयानुकूल सुधार होने चाहिए। उनका लिपिशुद्धि आंदोलन मराठी से आगे बढ़कर गुरुमुखी तक पहुंच चुका था।
सावरकर के समय लिपिशुद्धि आंदोलन का आधार मुख्यतः मुद्रण और टंकण की तकनीकी कठिनाइयां थीं। आज आधुनिक तकनीक ने उन कठिनाइयों को लगभग समाप्त कर दिया है। अब नागरी लिपि को उसके मूल स्वरूप में ही सरलता और सुविधा से लिखा तथा मुद्रित किया जा सकता है।
किन्तु आज स्थिति एक भिन्न प्रकार की चुनौती प्रस्तुत करती है। हमारी भाषाओं में केवल विदेशी शब्द ही नहीं, अनेक बार पूरे-के-पूरे वाक्य विदेशी भाषाओं के प्रभाव में लिखे और बोले जाते हैं। इससे भी अधिक चिंता का विषय यह है कि हिंदी, मराठी, गुजराती, तमिल, तेलुगु आदि भारतीय भाषाओं के लोग मोबाइल संदेशों, सामाजिक माध्यमों और निजी लेखन में रोमन लिपि का व्यापक प्रयोग करने लगे हैं। सावरकर के समय तकनीकी बाधाएं थीं; आज यह प्रवृत्ति सुविधा, आलस्य अथवा मानसिक पराधीनता से अधिक जुड़ी प्रतीत होती है। संभव है कि यदि सावरकर द्वारा प्रस्तावित कुछ व्यावहारिक सुधार व्यापक रूप से स्वीकार किए गए होते, तो यह समस्या कुछ सीमा तक कम हो जाती।
स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात यदि नागरी को राष्ट्रलिपि के रूप में अपनाकर भारतीय भाषाओं को उसके प्रयोग के लिए प्रोत्साहित किया गया होता, तो विभिन्न भाषाओं के बीच संपर्क और वैचारिक आदान-प्रदान अधिक सहज हो सकता था। नागरी के वैज्ञानिक स्वरूप, उसकी व्यावहारिक उपयोगिता तथा राष्ट्रीय स्तर पर उसकी संभावनाओं को रेखांकित कर सावरकर ने भारतीय भाषिक विमर्श को एक नई दिशा प्रदान की।

















