दक्षिण कोरिया के बुसान शहर में 19-29 जुलाई तक आयोजित यूनेस्को विश्व धरोहर समिति के 48वें सत्र में सारनाथ के प्राचीन बौद्ध स्थल को विश्व धरोहर सूची में शामिल किया गया।
इसी के साथ भारत में कुल 45 यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल हो गए हैं। भारत अब दुनिया में छठे और एशिया-प्रशांत क्षेत्र में दूसरे स्थान पर है, जहां सबसे अधिक विश्व धरोहर स्थल हैं। इसके अलावा, 69 स्थल विश्व धरोहर की संभावित सूची में भी शामिल हैं।
यूनेस्को की सूची में शामिल बौद्ध स्थल दो प्रमुख हिस्से हैं-चौखंडी स्तूप और सारनाथ के पुरातात्विक अवशेष, जिसमें धमेक स्तूप, धर्मराजिका स्तूप, मूलगंधकुटी विहार और अशोक स्तंभ सहित अनेक महत्वपूर्ण स्मारक शामिल हैं। इसलिए यह स्थल केवल धार्मिक महत्व का नहीं, बल्कि कला, अभिलेख, नगर-इतिहास और राज्य-संरक्षण की दृष्टि से भी बहुत महत्वपूर्ण है। अलग-अलग कालखंड को स्वयं में समेटे ये सभी स्मारक उत्तर प्रदेश के वाराणसी जिले में स्थित हैं और मिलकर सारनाथ के प्राचीन स्थल की समृद्ध स्थापत्य एवं पुरातात्विक विरासत को संरक्षित करते हैं।
सारनाथ 2500 से अधिक वर्ष से बौद्ध श्रद्धालुओं के लिए आस्था, ज्ञान और प्रेरणा का केंद्र रहा है। बौद्ध परंपरा में इस पवित्र स्थल को विभिन्न नामों (ऋषिपत्तन, इषिपत्तन और मृगदाव) से जाना जाता है। ज्ञान प्राप्ति के बाद ईसा पूर्व छठी शताब्दी में भगवान बुद्ध सारनाथ आए और पांच शिष्यों को पहला उपदेश दिया, जिसे ‘धर्मचक्र प्रवर्तन’ अर्थात् ‘धर्म के पहिये को गतिमान करना’ कहा जाता है।
ये हैं विश्व धरोहर
यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल भारत के 45 संपदाओं में से 37 सांस्कृतिक, 7 प्राकृतिक और 1 मिश्रित श्रेणी की हैं। सारनाथ सांस्कृतिक श्रेणी में आता है।
सांस्कृतिक धरोहर
1. आगरा किला (उत्तर प्रदेश)
2. अजंता की गुफाएं (महाराष्ट्र)
3. नालंदा महाविहार का पुरातात्विक स्थल (बिहार)
4. सांची के बौद्ध स्मारक (मध्य प्रदेश)
5. चंपानेर-पावागढ़ पुरातात्विक उद्यान (गुजरात)
6. छत्रपति शिवाजी टर्मिनस (महाराष्ट्र)
7. गोवा के चर्च और कॉन्वेंट (गोवा)
8. धोलावीरा : हड़प्पा नगर (गुजरात)
9. एलीफेंटा की गुफाएं (महाराष्ट्र)
10. एलोरा की गुफाएं (महाराष्ट्र)
11. फतेहपुर सीकरी (उत्तर प्रदेश)
12. ग्रेट लिविंग चोल टेंपल्स (तमिलनाडु)
13. हम्पी के स्मारक समूह (कर्नाटक)
14. महाबलीपुरम के स्मारक समूह (तमिलनाडु)
15. पट्टडकल या पत्तदकल के स्मारक समूह (कर्नाटक)
16. राजस्थान के पहाड़ी किले (राजस्थान)
17. अहमदाबाद का ऐतिहासिक शहर (गुजरात)
18. हुमायूं का मकबरा (दिल्ली)
19. जयपुर शहर (राजस्थान)
20. काकतीय रुद्रेश्वर (रामप्पा) मंदिर (तेलंगाना)
21. खजुराहो के स्मारक समूह (मध्य प्रदेश)
22. महाबोधि मंदिर परिसर, बोधगया (बिहार)
23. भारत के मराठा सैन्य परिदृश्य (महाराष्ट्र और तमिलनाडु)
24. मोइदाम्स-अहोम राजवंश की टीला-दफन प्रणाली (असम)
25. भारत की पर्वतीय रेल (पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और हिमाचल प्रदेश)
26. कुतुब मीनार और उसके स्मारक (दिल्ली)
27. रानी की वाव, पाटन (गुजरात)
28. लाल किला परिसर (दिल्ली)
29. भीमबेटका के शैलाश्रय (मध्य प्रदेश)
30. होयसलों के पवित्र स्थापत्य समूह (कर्नाटक)
31. शांतिनिकेतन (पश्चिम बंगाल)
32. कोणार्क का सूर्य मंदिर (ओडिशा)
33. ताजमहल (उत्तर प्रदेश)
34. ली कॉर्बुजिए का वास्तुशिल्प कार्य (भारत सहित बहुराष्ट्रीय संपदा)
35. जंतर-मंतर, जयपुर (राजस्थान)
36. मुंबई के विक्टोरियन गॉथिक और आर्ट डेको स्थापत्य समूह (महाराष्ट्र)
प्राचीन बौद्ध स्थल, सारनाथ (उत्तर प्रदेश)
प्राकृतिक धरोहर
38. काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान (असम)
39. मानस वन्यजीव अभयारण्य (असम)
40. केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान (राजस्थान)
41. सुंदरबन राष्ट्रीय उद्यान (पश्चिम बंगाल)
42. नंदा देवी और फूलों की घाटी राष्ट्रीय उद्यान (उत्तराखंड)
43. पश्चिमी घाट (महाराष्ट्र, कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु और गुजरात)
44. ग्रेट हिमालयन नेशनल पार्क संरक्षण क्षेत्र (हिमाचल प्रदेश)
मिश्रित धरोहर
45. कंचनजंघा राष्ट्रीय उद्यान (सिक्किम)
सारनाथ का ऐतिहासिक महत्व
सारनाथ का ऐतिहासिक महत्व अत्यंत गहन है। यह केवल एक प्राचीन स्थल नहीं, बल्कि एक जीवित आध्यात्मिक स्मृति है। मौर्य काल से लेकर गुप्त और बाद के कालों तक, यह स्थल निरंतर पूजा, अध्ययन और स्मरण का केंद्र बना रहा। यहीं गाैतम बुद्ध ने चार आर्य सत्यों की व्याख्या की और दुःखों से मुक्ति के लिए आर्य अष्टांगिक मार्ग तथा जीवन में मध्यम मार्ग अपनाने का संदेश दिया। यहीं वाराणसी के धनी व्यापारी (श्रेष्ठि या श्रेठ) के पुत्र यास सांसारिक विलासिता को छोड़कर बुद्ध के छठे शिष्य अरिहंत बने। उनके 54 मित्र भी बुद्ध के अनुयायी बने। इसके बाद बुद्ध ने यहीं प्रथम बौद्ध संघ की स्थापना की, जिसमें 60 भिक्षु थे और जिन्हें धर्म के प्रचार के लिए देश के विभिन्न भागों में भेजा गया। द्वितीय शताब्दी के एक कुषाणकालीन शिलालेख में इस स्थल की महत्ता का उल्लेख है। अत: सारनाथ का यूनेस्को विश्व धरोहर सूची में शामिल होना केवल एक प्रशासनिक घोषणा नहीं, बल्कि भारतीय सभ्यता के स्मृति-मानचित्र पर एक नए अध्याय की शुरुआत है।
पश्चिम से पूरब तक
पूर्वांचल क्षेत्र स्थित यह स्थल अब दुनिया के उन चुनिंदा सांस्कृतिक स्थलों में शामिल हो गया है, जिन्हें मानवता की साझा विरासत के रूप में मान्यता मिली है। वाराणसी आने वाला विदेशी पर्यटक अब केवल काशी के घाटों, मंदिरों और गंगा आरती तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि सारनाथ को भी अपनी यात्रा का अनिवार्य हिस्सा बना सकता है। यह उपलब्धि इसलिए भी विशेष है, क्योंकि उत्तर प्रदेश की विश्व धरोहर पहचान अब तक मुख्यतः आगरा केंद्रित थी। ताजमहल, आगरा किला और फतेहपुर सीकरी ने राज्य को वैश्विक पर्यटन मानचित्र पर तो स्थापित किया, लेकिन पूर्वी उत्तर प्रदेश की सांस्कृतिक धरोहर को वैसी दृश्यता नहीं मिल पाई थी। सारनाथ के जुड़ने से यह संतुलन बदलता है। अब उत्तर प्रदेश की विरासत केवल पश्चिमी गलियारे तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि पूर्वांचल की ओर भी उतनी ही प्रखरता से फैलेगी। यह बदलाव सिर्फ नक्शे पर नहीं, बल्कि पर्यटन, निवेश, शोध और सांस्कृतिक कूटनीति की भाषा में भी महसूस किया जाएगा।
विश्व धरोहर का दर्जा किसी स्थल की सुंदरता का पुरस्कार भर नहीं होता। यह मान्यता उस स्थल की असाधारण सार्वभौमिक महत्ता को स्वीकार करती है। सारनाथ के मामले में यह महत्ता धार्मिक, ऐतिहासिक, पुरातात्विक और कलात्मक-चारों स्तरों पर मौजूद है। यहीं बौद्ध परंपरा ने अपने आरंभिक रूपों में आकार लिया, जहां शिल्प और स्थापत्य ने आध्यात्मिकता को मूर्त रूप दिया और जहां प्राचीन भारत की नगर-संरचना तथा शिलालेखीय परंपरा के संकेत आज भी पढ़े जा सकते हैं। इसीलिए इसका चयन भारत के लिए केवल सम्मान नहीं, बल्कि अपनी विरासत के वैश्विक मूल्य को पुनः पहचाने जाने जैसा है।
पूर्वांचल के लिए इस निर्णय के व्यावहारिक परिणाम भी कम महत्वपूर्ण नहीं हैं। सबसे पहले, पूर्वांचल को केवल धार्मिक-आध्यात्मिक नहीं, बल्कि वैश्विक सांस्कृतिक पर्यटन केंद्र के रूप में भी पहचान मिलेगी। बौद्ध तीर्थयात्रियों के लिए भारत पहले से एक प्रमुख गंतव्य है, लेकिन यूनेस्को की मान्यता के बाद सारनाथ की उपस्थिति और अधिक प्रामाणिक तथा आकर्षक बन जाएगी। इससे घरेलू पर्यटकों के साथ-साथ श्रीलंका, थाईलैंड, जापान, म्यांमार, कोरिया, चीन, वियतनाम और अन्य बौद्ध-बहुल देशों से आने वाले यात्रियों की रुचि भी बढ़ने की संभावना है।
दूसरा प्रभाव स्थानीय अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा। जब कोई स्थल यूनेस्को सूची में शामिल होता है, तो उसके आसपास के क्षेत्रों में होटल, परिवहन, गाइड सेवाओं, हस्तशिल्प, खान-पान, स्मृति-उद्योग और सांस्कृतिक आयोजन के अवसर बढ़ते हैं। सारनाथ के आसपास रहने वाले लोगों के लिए यह बड़ा अवसर है।
तीसरा और शायद सबसे गहरा प्रभाव उत्तर प्रदेश की सांस्कृतिक छवि पर पड़ेगा। लंबे समय तक राज्य की वैश्विक पहचान ताजमहल, मुगल स्थापत्य और आगरा की स्मारक परंपरा से जुड़ी रही। यह पहचान महत्वपूर्ण थी, लेकिन अधूरी भी थी। सारनाथ के आने से अब उत्तर प्रदेश की ऐतिहासिक कथा में बौद्ध, वैदिक, मौर्य, गुप्त और मध्यकालीन सभी परतें अधिक संतुलित ढंग से सामने आएंगी। इससे राज्य की सांस्कृतिक विविधता का एक व्यापक और अधिक प्रामाणिक चित्र बनेगा। यह छवि केवल पर्यटन विभाग के लिए नहीं, बल्कि भारत की सॉफ्ट पावर के लिए भी उपयोगी होगी।

साझा बौद्ध विरासत का केंद्र
भारत की सांस्कृतिक कूटनीति के लिए भी यह उपलब्धि महत्वपूर्ण है। बौद्ध धर्म भारत से निकला और एशिया के विशाल भूभाग में फैला। आज जापान से लेकर दक्षिण-पूर्व एशिया तक करोड़ों लोगों की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक चेतना बौद्ध परंपरा से जुड़ी है। जब सारनाथ जैसे स्थल को विश्व धरोहर का दर्जा मिलता है, तब भारत की सभ्यतागत भूमिका और भी स्पष्ट होती है। यह भूमिका राजनीतिक शक्ति से अलग, लेकिन उससे कम प्रभावशाली नहीं होती। सांस्कृतिक पहचान अक्सर वही संवाद संभव बनाती है, जो औपचारिक कूटनीति नहीं कर पाती। इसलिए सारनाथ को विश्व धरोहर का दर्जा भारत की उस दीर्घकालिक सभ्यतागत छवि को मजबूत करता है, जिसे वह एशिया और विश्व के सामने प्रस्तुत करता रहा है। सारनाथ का विश्व धरोहर सूची में शामिल होना इस बात का प्रमाण है कि भारत की विरासत केवल भव्य स्मारकों तक सीमित नहीं है। इसमें आध्यात्मिक परंपराएं, बौद्ध दर्शन, स्तूप, मठ, शिलालेख और सांस्कृतिक परिदृश्य भी शामिल हैं। सारनाथ इसी व्यापक भारतीय विरासत का प्रतीक है, जहां इतिहास, दर्शन और स्थापत्य का अद्भुत संगम दिखाई देता है।
बौद्ध सर्किट को मिलेगी नई ताकत
यह उपलब्धि बौद्ध पर्यटन सर्किट के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। बौद्ध धर्म के चार प्रमुख तीर्थों (लुंबिनी, बोधगया, सारनाथ और कुशीनगर) में भारत और नेपाल के स्थल शामिल हैं। बोधगया में गाैतम बुद्ध को ज्ञान प्राप्त हुआ, सारनाथ में उन्होंने पहला उपदेश दिया और कुशीनगर में उनका महापरिनिर्वाण हुआ। बोधगया-सारनाथ-कुशीनगर को केंद्र में रखकर भारत के अन्य बौद्ध स्थलों को जोड़कर एक व्यापक बौद्ध पर्यटन मार्ग विकसित करने की संभावनाएं और मजबूत हुई हैं। यदि इन्हें संगठित, सुगम और शोध-समर्थ नेटवर्क के रूप में विकसित किया जाए, तो भारत विश्व के सबसे महत्वपूर्ण बौद्ध विरासत मार्गों में से एक बन सकता है।
भारत सरकार बौद्ध पर्यटन के विकास के लिए कई स्तरों पर काम कर रही है। पर्यटन मंत्रालय की केंद्रीय क्षेत्र की योजनाओं ‘स्वदेश दर्शन’ और ‘प्रसाद’ के तहत राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को वित्तीय सहायता दी जाती है। ‘बौद्ध सर्किट’ को स्वदेश दर्शन योजना के तहत एक प्रमुख थीमैटिक सर्किट के रूप में चिन्हित किया गया है। इसके तहत आंध्र प्रदेश में 35.24 करोड़, बिहार में 95.18 करोड़, गुजरात में 26.68 करोड़, मध्य प्रदेश में 74.02 करोड़ और उत्तर प्रदेश में श्रावस्ती-कुशीनगर-कपिलवस्तु बौद्ध सर्किट के विकास के लिए 87.89 करोड़ रुपये की परियोजनाएं स्वीकृत की गई हैं। ‘प्रसाद’ योजना के तहत 2020-21 में सिक्किम के युकसोम में चार संरक्षक संतों के तीर्थस्थलों पर तीर्थयात्रा सुविधाओं के विकास के लिए 33.32 करोड़ रुपये मंजूर किए गए। इसके अलावा, पूंजी निवेश के लिए राज्यों को विशेष सहायता योजना के तहत उत्तर प्रदेश के श्रावस्ती में 80.24 करोड़ रुपये की लागत से ‘एकीकृत बौद्ध पर्यटन विकास’ परियोजना को मंजूरी दी गई।
यही नहीं, बौद्ध विरासत और एशियाई देशों के बीच सांस्कृतिक सहयोग को बढ़ावा देने के लिए संस्कृति मंत्रालय ने अंतरराष्ट्रीय बौद्ध परिसंघ के सहयोग से प्रथम एशियाई बौद्ध शिखर सम्मेलन आयोजित किया। इसमें 26 एशियाई देशों के 130 विदेशी प्रतिनिधियों सहित 650 से अधिक प्रतिनिधियों ने भाग लिया। सम्मेलन में 12 देशों के राजनयिक और महायान तथा थेरवाद परंपराओं के 40-40 भिक्षु भी शामिल हुए। अब इस शिखर सम्मेलन को प्रत्येक दो वर्ष में आयोजित करने का निर्णय लिया गया है।
ऐतिहासिक गौरव से विश्व धरोहर तक
सम्राट अशोक ने सारनाथ में ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी में अनेक निर्माण कार्य करवाए। इनमें लगभग 30 मीटर ऊंचे धर्मराजिका स्तूप का निर्माण और अशोक स्तंभ स्थापित करना शामिल था। इस स्तंभ के शीर्ष पर सिंह प्रतिमाएं थीं, जिसे राष्ट्रीय प्रतीक के रूप में अपनाया गया है। इससे इस स्थल का महत्व भारतीय राष्ट्रीय चेतना से भी गहराई से जुड़ जाता है। यूनेस्को की मान्यता इस बहुस्तरीय विरासत को अंतरराष्ट्रीय संरक्षण के दायरे में लाती है।
पुरातत्वविदों के अनुसार, अशोक के अलावा दूसरी और पहली सदी के दौरान शुंग काल में विशाल स्तूप के चारों ओर प्रस्तर निर्मित वेदिकाओं का निर्माण कराया गया। कुषाण काल में कनिष्क के शासनकाल में बौद्ध भिक्षु बल ने यहां लाल बलुआ पत्थर से निर्मित बोधिसत्व की प्रतिमा और एक विशाल छत्र प्रतिष्ठित कराया। इसी काल में कई विहारों का भी निर्माण हुआ। गुप्त काल में सारनाथ कला और स्थापत्य का प्रमुख केंद्र बना रहा। इसी दौरान धमेक स्तूप को अलंकृत प्रस्तरों से सुसज्जित कर उसकी भव्यता बढ़ाई गई। चंद्रगुप्त द्वितीय के शासनकाल में भारत आए चीनी यात्री फाह्यान ने सारनाथ में चार स्तूप और दो विशाल विहारों के विद्यमान होने का उल्लेख किया है। सातवीं शताब्दी में हर्षवर्धन के शासनकाल में भारत आए चीनी यात्री ह्वेनत्सांग ने भी सारनाथ का विस्तृत वर्णन किया है। उसके अनुसार, यहां बुद्ध की धातु से निर्मित एक विशाल प्रतिमा प्रतिष्ठित थी, जिसमें उन्हें धर्मचक्र प्रवर्तन करते हुए दर्शाया गया था। उसने यहां एक विशाल विहार और 1500 से अधिक बौद्ध भिक्षुओं के निवास करने का भी उल्लेख किया है।
11वीं शताब्दी में भारत पर हुए मुस्लिम आक्रमणों से सारनाथ भी अछूता नहीं रहा। इस दौरान यहां स्थित विहारों और स्तूपों को क्षति पहुंचाई गई। हालांकि, 1026 ई. में स्थिरपाल और वसंतपाल नामक दो भाइयों ने क्षतिग्रस्त धर्मराजिका स्तूप का पुनर्निर्माण कराया। 12वीं शताब्दी सारनाथ के वैभव की अंतिम प्रमुख शताब्दी रही। इस काल में गढ़वाल शासक गोविंदचंद्र की पत्नी कुमारदेवी ने यहां एक विशाल विहार का निर्माण कराया, जिसे ‘धर्मचक्र जिन विहार’ कहा गया। इसके बाद उत्तर भारत में हुए इस्लामी आक्रमणों के कारण सारनाथ का यह पवित्र स्थल धीरे-धीरे इतिहास के अंधकार में खो गया।
काल के प्रवाह में विस्मृत हो चुके इस ऐतिहासिक पुरास्थल को भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग और स्वतंत्र पुराविदो ने पुनः प्रकाश में लाए। कर्नल मैकेंजी और अलेक्जेंडर कनिंघम सहित अनेक पुरातत्वविदों तथा विभाग द्वारा समय-समय पर किए गए पुरातात्विक उत्खननों में कई मनौती स्तूप, विहार, बौद्ध-शैव प्रतिमाएं और अन्य पुरावशेष प्राप्त हुए। इन सभी महत्वपूर्ण पुरावशेषों को सारनाथ स्थित संग्रहालय में सुरक्षित रखा गया है।
सारनाथ के स्मारकों को भारत सरकार ने राष्ट्रीय धरोहर के रूप में संरक्षित किया है। यह स्थल वर्ष 1998 से विश्व धरोहर की संभावित सूची में शामिल था। लगभग 28 वर्षों की दीर्घ प्रतीक्षा के बाद महात्मा बुद्ध से संबंधित इस पवित्र और ऐतिहासिक पुरास्थल का विश्व धरोहर सूची में शामिल होना स्वागत योग्य है। शांति और मानवता का संदेश देने वाली बुद्ध की प्रथम उपदेश स्थली को मिली यह वैश्विक मान्यता भारत ही नहीं, बल्कि संपूर्ण विश्व के लिए गौरव का विषय है।
– डॉ. शुभम केवलिया
चुनौतियां भी कम नहीं
यूनेस्को की मान्यता बड़ी उपलब्धि है, लेकिन इसका वास्तविक लाभ तभी मिलेगा, जब पर्यटन और संरक्षण के बीच संतुलन कायम रखा जाए। बढ़ती पर्यटक संख्या के साथ पुरातात्विक अवशेषों की सुरक्षा, स्वच्छता, यातायात प्रबंधन, पर्यावरण संरक्षण और स्थानीय समुदाय की भागीदारी पर विशेष ध्यान देना होगा। विश्वस्तरीय पर्यटन सुविधाएं विकसित करते समय यह भी सुनिश्चित करना होगा कि अत्यधिक व्यावसायीकरण से सारनाथ की ऐतिहासिक प्रामाणिकता और आध्यात्मिक वातावरण प्रभावित न हो। विश्व धरोहर का दर्जा केवल पर्यटन बढ़ाने का अवसर नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए विरासत को सुरक्षित रखने की जिम्मेदारी भी है। कुल मिलाकर सारनाथ की यूनेस्को मान्यता पूर्वांचल के लिए आशा, उत्तर प्रदेश के लिए अवसर और भारत के लिए सभ्यतागत सम्मान का प्रतीक है। यह केवल एक स्थल की उपलब्धि नहीं, बल्कि भारत की स्मृति, विविधता और सांस्कृतिक निरंतरता की वैश्विक स्वीकृति है। सारनाथ अब केवल अतीत की धरोहर नहीं, बल्कि भविष्य के पर्यटन, शोध, सांस्कृतिक कूटनीति और भारत के बढ़ते सांस्कृतिक आत्मविश्वास का भी प्रतीक है।
















