मेरा जन्म अक्टूबर 1943 में रावलपिंडी में हुआ था। मेरे पिता का नाम राम सिंह और माता का नाम शकुंतला देवी था। परिवार में मेरे
दादा-दादी, तीन बहनें, छोटा भाई जीत सिंह ओबरॉय और मैं था। मैं इतना छोटा था कि विभाजन की घटनाओं को अपनी आंखों से देखकर पूरी तरह याद रख पाना संभव नहीं था। लेकिन मां, दादा-दादी और परिवार के बुजुर्गों से उस भयावह दौर की बातें इतनी बार सुनीं कि आज भी लगता है, जैसे सब कुछ मेरी आंखों के सामने हुआ हो।
रावलपिंडी में हमारा परिवार सुख से रहता था। पिता जी के पास राशन का डिपो था और हमारी राशन की दुकान भी थी। किसी ने नहीं सोचा था कि एक दिन घर, दुकान और वर्षों से बसा जीवन छोड़कर केवल जान बचाने के लिए निकलना पड़ेगा।
विभाजन के समय हालात बिगड़ने लगे। डर और मार-काट की खबरों के बीच हमारा परिवार दूसरे हिंदू-सिख परिवारों के साथ रावलपिंडी छोड़कर कश्मीर के रास्ते भारत के लिए निकल पड़ा। करीब 10-20 बसों में अनेक परिवार सवार थे। सबके मन में बस एक ही इच्छा थी कि किसी तरह सुरक्षित भारत पहुंच जाएं।
कश्मीर की ओर बढ़ते हुए कोहाला गांव के पास अचानक बसों के चालक गाड़ियां छोड़कर चले गए। परिवारों से भरी बसें अनजान जगह पर असहाय खड़ी थीं। तभी सामने से मुसलमानों की एक बड़ी भीड़ आई और बसों पर टूट पड़ी। लोगों ने जान बचाने की उम्मीद में अपने जेवर और रुपये-पैसे तक निकालकर दे दिए। लेकिन लूटपाट के बाद मार-काट शुरू हो गई। उसी हिंसा में मेरे पिता राम सिंह जी की हत्या कर दी गई।
मेरी मां के लिए वह क्षण कितना भयावह रहा होगा, इसका अंदाजा आज भी नहीं लगाया जा सकता। आंखों के सामने पति की हत्या और साथ में छोटे बच्चे तथा बुजुर्ग सास-ससुर। शोक मनाने का भी समय नहीं था। मारे गए लोगों के शव उनके परिजनों को नहीं सौंपे गए। पहचान कराने के बाद शवों पर तेल डालकर उन्हें एक साथ जला दिया गया। मेरे पिता भी उन्हीं में थे। हम उन्हें अंतिम विदाई तक नहीं दे सके। किसी तरह हम कश्मीर पहुंचे। अब पूरे परिवार की जिम्मेदारी मां के कंधों पर थी। कश्मीर से हमें हवाई जहाज से दिल्ली भेजा जाना था। जहाज में बैठने की अफरा-तफरी में मेरा छोटा भाई जीत सिंह नीचे ही रह गया। मां को जब पता चला तो वह जहाज से उतर गईं। पति को रास्ते में खो चुकी मां अपने बच्चे को पीछे छोड़कर कैसे जातीं। बाद में अगले जहाज से हम दिल्ली पहुंचे।
दिल्ली में सबसे पहले हम बिड़ला मंदिर में रुके। इसके बाद पहाड़गंज पहुंचे और रहने के लिए मकान तलाशा। मेरी मासी भी हमारे साथ थीं। काफी प्रयास के बाद एक दो मंजिला मकान मिला। एक मंजिल पर हमारा परिवार और दूसरी पर मासी का परिवार रहने लगा। यहीं से उजड़े हुए जीवन को फिर से जोड़ने की शुरुआत हुई। इसके बाद हम पंजाब के गोराया में जाकर बस गए। आज मेरे दादा-दादी और तीनों बहनें इस दुनिया में नहीं हैं। उनके साथ उस दौर को देखने और जीने वाली कई आवाजें भी खामोश हो गईं। लेकिन उनकी सुनाई हुई बातें आज भी मेरे भीतर जीवित हैं।
रावलपिंडी मेरे लिए आज भी केवल एक शहर नहीं है। वह हमारे घर, पिता की राशन की दुकान और उस जीवन का नाम है, जो वहीं छूट गया। हम भारत पहुंच गए, लेकिन मेरे पिता हमारे साथ भारत नहीं पहुंच सके।
जोगिंदर सिंह ओबरॉय
मूल निवासी: रावलपिंडी, पाकिस्तान















