यूक्रेन के द्वारा रूसी एनर्जी सुविधाओं पर हमलों के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने शुक्रवार को एक कानून को प्रभावी रूप से रोक दिया है। यह कानून उन्हें रूस के तेल के बड़े खरीदारों पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने का अधिकार देता था। इसमें चीन और भारत भी शामिल हैं। कच्चे तेल की कीमतें 110 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर चढ़ गई हैं और अमेरिका में मिडटर्म चुनाव एक महीने से भी कम समय में होने वाले हैं। ऐसे में ट्रंप ने यह कदम उठाया है।
व्हाइट हाउस के बयान में कहा गया है कि लिंडसे ओ. ग्राहम सैंक्शनिंग रशिया एंड ईरान एक्ट ऑफ 2026 के सेक्शन 115 के तहत राष्ट्रपति किसी विदेशी व्यक्ति या प्रतिबंधों को माफ कर सकते हैं, बशर्ते कांग्रेस को यह सर्टिफिकेट दिया जाए कि यह अमेरिका के राष्ट्रीय हित में है। ट्रंप ने यही किया है और कांग्रेस को इसकी जानकारी दे दी है। यह कानून 18 सितंबर को कानून बना था। लेकिन ट्रंप तेल की कीमतें कम करने के कई कदम उठा रहे हैं। पिछले हफ्ते उन्होंने कहा था कि रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने तुरंत तीन लाख टन से ज्यादा डीजल अमेरिका और वैश्विक बाजारों को सप्लाई करने पर सहमति जताई है। नवंबर में और पांच लाख टन तथा उसके बाद एक मिलियन टन डीजल भी आएगा। रूस तीन मिलियन टन डीजल भी जल्दी रिलीज कर सकता है, यह उसकी रिफाइनरियों की हालत पर निर्भर करेगा। ट्रंप ने यूक्रेन से भी कहा है कि सीजफायर के फ्रेमवर्क में रूसी रिफाइनरियों पर हमला न करें।
रूस-अमेरिका डीजल डील
ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (GTRI) के फाउंडर अजय श्रीवास्तव ने कहा कि यह छूट अमेरिकी व्यापार नीति की अनिश्चितता दिखाती है। वाशिंगटन की ये पुरानी नीति है कि पहले वो धमकी देता है, फिर जब लागू करना मुश्किल हो तो पीछे हट जाता है। 9 अक्टूबर को अमेरिका-रूस डीजल समझौते के बाद दूसरे खरीदारों को सजा देना मुश्किल हो गया।
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इंडियन काउंसिल फॉर रिसर्च ऑन इंटरनेशनल इकोनॉमिक रिलेशंस (ICRIER) की प्रोफेसर अर्पिता मुखर्जी ने कहा कि भारत द्वारा रूसी तेल खरीदने से अमेरिकी टैरिफ का खतरा बन रहा था। लेकिन यूरोपीय संघ का मुद्दा और बड़ा है। वह भारत, तुर्की और चीन जैसी जगहों पर कंपनियां बनाकर फिर अपनी कंपनियों को उनके साथ काम करने से रोक रहा है। अमेरिकी कंपनियां भी इनमें से कुछ भारतीय कंपनियों के साथ काम करती हैं जो यूरोपीय संघ की बैन लिस्ट में हैं। अमेरिका अपना रुख नरम कर रहा है क्योंकि रूस के साथ द्विपक्षीय डीजल सप्लाई समझौता हो गया है। इससे मिडटर्म चुनाव से पहले घरेलू और वैश्विक ईंधन कीमतें शांत करने में मदद मिलेगी।
ट्रेड डील की उम्मीद बढ़ी
100 प्रतिशत अमेरिकी टैरिफ का खतरा कम होने से भारत के साथ डील पर सहमति बनने की संभावना बढ़ गई है। भारत और अमेरिका अन्य टैरिफ पर व्यापक सहमति बना चुके हैं। सेक्शन 301 जांच और ट्रेड डील दोनों में दोनों देशों के बीच काफी तालमेल हो गया था। मुख्य मतभेद रूसी तेल खरीद पर टैरिफ का ही था।
विदेश मंत्रालय ने रूसी सैंक्शन एक्ट पर कहा था कि सरकार देश की ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए प्रतिबद्ध है। यह विविध स्रोतों से और बाजार की स्थिति के आधार पर की जाती है। मंत्रालय ने कहा कि प्रस्तावित कानून के भारत-अमेरिका संबंधों और वैश्विक ऊर्जा बाजार पर असर की बात अमेरिकी प्रतिनिधियों से चर्चा में रखी गई है।
भारत ने पहले अमेरिकी सेक्शन 301 जांच के बाद जबरन मजदूरी वाले सामान के आयात पर बैन लगा दिया था। हाल ही में भारत समेत अन्य जी20 देशों ने संयुक्त बयान जारी कर कुछ क्षेत्रों में संरचनात्मक ओवरकैपेसिटी के खिलाफ कार्रवाई करने की प्रतिबद्धता जताई। इनमें ऑटोमोबाइल, इलेक्ट्रिक वाहन, बैटरी, केमिकल्स, सेमीकंडक्टर और सोलर पैनल शामिल हैं। इन क्षेत्रों में अक्सर चीन पर ओवरकैपेसिटी का आरोप लगता है।
वैश्विक स्तर पर महंगाई बढ़ी
काउंसिल ऑन फॉरेन रिलेशंस के अनुसार, अमेरिका में डीजल की औसत कीमत 12 अक्टूबर तक 6.18 डॉलर प्रति गैलन हो गई। साल की शुरुआत में यह 3.48 डॉलर थी। ऊंची ईंधन कीमतें उपभोक्ताओं तक पहुंच रही हैं। सितंबर में कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स 0.6 प्रतिशत बढ़ा, जो अनुमान से ज्यादा था। सालाना महंगाई दर 3.7 प्रतिशत पहुंच गई। पोल बताते हैं कि मिडटर्म चुनाव में यह रिपब्लिकन उम्मीदवारों पर असर डाल सकता है क्योंकि जीवन यापन की लागत मुद्दा बन गया है।

















