नई पुस्तक में चार पुरानी किताबों को समेटकर दो भाग
नई पुस्तक चार पुरानी किताबों को समेट कर दो भागों में लाई गई है। इसका पहला भाग जो जून में आया था, प्राचीन भारत और आधुनिक भारत की उपलब्धियों पर था। दूसरा भाग, जो अब चर्चा में है, दो बड़े विचारों को एक साथ रखता है। पहला विचार- मध्यकाल को 1000 से 1700 ईस्वी के सात सौ वर्षों की सुदीर्घ अवधि को अबाध इस्लामिक शासन के रूप में नहीं, बल्कि एक सतत सैन्य और सांस्कृतिक प्रतिरोध और दृढ़ता के काल के रूप में पुनर्परिभाषित करना है। नयी पुस्तक में स्पष्ट रूप से बताया गया है कि भारतीय उपमहाद्वीप ने बार-बार विदेशी आक्रमण, धार्मिक भेदभाव और सामाजिक-आर्थिक संकट झेले, पर स्वदेशी शक्तियों ने लगातार उन आक्रांताओं का प्रतिरोध किया जो घुसपैठ कर रहे थे। दूसरा विचार- भारत की सुशासन की विकास-यात्रा को समझाना है। प्रतिरोध वाले हिस्से में अनेक ऐसे प्रसंग जोड़े गए हैं जो अब तक मुख्यधारा की पाठ्यपुस्तकों में या तो फुटनोट में थे या पूरी तरह अनुपस्थित थे। महाराणा प्रताप और अकबर की सेनाओं के बीच 1582 में विजयादशमी के दिन लड़ा गया दिवेर का युद्ध, जिसे पुस्तक महाराणा के संघर्ष का निर्णायक अध्याय मानती है, को विस्तार से रखा गया है। मेवाड़ की सेना ने इस युद्ध में मुगल सेना को पराजित करके अपने खोए हुए क्षेत्रों पर पुनः अधिकार प्राप्त किया था।
अहोम साम्राज्य और सरायघाट के युद्ध का उल्लेख
इसीप्रकार उत्तर-पूर्व भारत के शक्तिशाली और विशाल अहोम साम्राज्य का उल्लेख है, जिसने लगभग छह सौ वर्षों तक अपनी राजनीतिक स्वतंत्रता बनाए रखी और सरायघाट के युद्ध (1671) में ‘उत्तर-पूर्व के शिवाजी’ कहे जाने वाले वीर योद्धा लचित बरफुकन के नेतृत्व में मुगल सेना को पराजित किया। इसमें दक्षिण भारत के विजयनगर साम्राज्य की सामर्थ्य और प्रतिरोध; मराठों की स्वराज की अवधारणा; जिसे एक स्वतंत्र, स्वशासित भू-भाग की कल्पना के रूप में परिभाषित किया गया है,का भी वर्णन हैI औरंगजेब की जजिया सहित भारी कर लगाने और धार्मिक कट्टरता की नीतियों के विरुद्ध 1669 में गोकुला जाट और 1686 में सिनसिनी के जमींदार राजाराम के नेतृत्व में हुए विद्रोह; सिख गुरुओं की आध्यात्मिक और राजनीतिक दृढ़ता, गुरु अर्जुन देव और गुरु तेग बहादुर के बलिदान, गुरू गोविन्दसिंह के सशस्त्र संघर्ष और खालसा पंथ की स्थापना आदि के माध्यम से स्थापित किया गया है कि विदेशी आक्रमणों का प्रतिरोध केवल उत्तर भारत तक सीमित नहीं था, बल्कि इसकी व्याप्ति अखिल भारतीय थी। इस प्रतिरोध को और व्यापक रूप में दर्शाने के लिए पुस्तक में तीन वीर रानियों को विशेष स्थान दिया गया है: रानी नायकी देवी; जिन्होंने 1178 में कसरहड़ा में मुहम्मद गोरी को हराया, काकतीय वंश की रानी रुद्रमा देवी जिन्होंने 1262 से 1289 तक शासन किया और कई बार दिल्ली सल्तनत का सफल प्रतिरोध किया और कर्नाटक के उल्लाल की रानी अब्बक्का; जिहोने 1525 से 1570 तक पुर्तगालियों से लगातार संघर्ष किया और यूरोपीय ताकतों का विरोध करने वाले शुरुआती भारतीय शासकों में से एक बनीं।
धर्म और संस्कृति की रक्षा को युद्ध की मूल प्रेरणा बताया
पुस्तक में सोदाहरण यह दर्शाया है कि भारत में राज्य-विस्तार मात्र युद्ध की प्रेरणा नहीं; बल्कि धर्म और संस्कृति की रक्षा उसकी मूलप्रेरणा और युद्ध उसका प्रतीक/अभिव्यक्ति था। इसी प्रकार मंदिरों के विनाश और पुनर्निर्माण का इतिहास भी तथ्यात्मक ढंग से रखा गया है। पुस्तक में उदाहरणों के माध्यम से बताया गया है कि कैसे मंदिरों को तोड़कर उनके स्थान पर मस्जिदें बनाई गईं, और कैसे काशी विश्वनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण पहले राजा टोडरमल और राजा मान सिंह ने कराया, फिर औरंगजेब द्वारा ध्वस्त किए जाने के बाद उसका पुनर्निर्माण देवी अहिल्याबाई होल्कर ने करवाया। जब मंदिर बनाना प्रतिबंधित हुआ तो श्रीमंत शंकरदेव, माधवदेव, चैतन्य महाप्रभु, चंडीदास, तुलसीदास, सूरदास, मीरांबाई, गुरू नानक, भक्त नरसी, ललद्यद आदि भक्त कवियों ने अपने हृदयस्पर्शी और लोकप्रिय गीतों और पदों के माध्यम से सनातन धर्म, भारतीयता और आध्यात्मिक भावना की रक्षा कीI भक्तिकाव्य धार्मिक आस्था, सांस्कृतिक प्रतिरोध और अदम्य जिजीविषा का अप्रतिम उदहारण हैI
भारतीय परंपरा में सुशासन की जड़ों की खोज
नई पुस्तक में शासन और सुशासन को केवल पश्चिमी लोकतंत्र (वेस्टमिन्स्टर प्रणाली आदि) की देन न मानकर उसकी जड़ें भारतीय परंपरा में खोजी गई हैं। भारत की सुशासन की समझ वैदिक युगीन सभा/समिति, रामायणकालीन रामराज्य और महाभारतकालीन राजधर्म के अलावा मुंडक उपनिषद, कौटिल्य के अर्थशास्त्र और चोल वंश कालीन सेगोल जैसे विचारों, ग्रंथों और प्रतीकों से विकसित होते हुए आधुनिक संविधान-आधारित लोकतांत्रिक व्यवस्था और नागरिक भागीदारी तक पहुँची है। रामराज्य को इसमें किसी धार्मिक नारे के रूप में नहीं, बल्कि एक आदर्श शासन मॉडल के रूप में परिभाषित किया गया है। गांधीजी ने भी रामराज्य को शुचिता, पारदर्शिता, परदुखकातरता, कल्याण-केंद्रित जनोन्मुखी शासन-व्यवस्था के रूप में परिभाषित किया है। वह सुशासन का मानक है। का उल्लेख किया गया है। इसके साथ ही कई आधुनिक भारतीय संस्थानों के आदर्श वाक्यों जैसे ‘सत्यमेव जयते’, ‘यतो धर्मस्ततो जयः’, ‘धर्मो रक्षति रक्षितः’, ‘वसुधैव कुटुम्बम्’ और ‘योग क्षेम वहाम्यम्’ को भी जोड़ा गया है, ताकि विद्यार्थी को यह समझ आए कि हमारी संवैधानिक संस्थाएँ अपनी प्रेरणा और प्रतीक अपनी ही परंपरा से लेती हैं। इसी अध्याय में राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 को व्यापक जनभागीदारी से निर्मित पब्लिक पॉलिसी का उत्कृष्ट उदाहरण बताया गया है।
युवा पीढ़ी में आत्म-गौरव के पुनर्जागरण का दावा
इस पहल के सबसे पहले और प्रत्यक्ष प्रभावस्वरूप भारत की युवा पीढ़ी में आत्म-गौरव का पुनर्जागरण होगा। पुराने इतिहास-बोध ने एक प्रकार की हीनता और आत्म-विस्मृति पैदा की थी। दूसरा प्रभाव भारत की सांस्कृतिक एकता की समझ विकसित करना होगा। नई पुस्तक दिल्ली-केंद्रित इतिहास का विकेंद्रीकरण करती है। अब विद्यार्थी को भारत एक मानचित्र मात्र नहीं, बल्कि एक जीवंत सांस्कृतिक चेतना का साकार रूप लगेगा। तीसरा प्रभाव शासन के भारतीय मानकों की श्रेष्ठ परम्परा का पुनर्स्थापन होगा। चौथा प्रभाव इतिहास के प्रति आलोचनात्मक और भारत-केन्द्रित दृष्टि का विकास होगाI निष्कर्षतः, इस पहल का सबसे दूरगामी प्रभाव विद्यार्थियों के भविष्य-सम्बन्धी दृष्टिकोण निर्माण में होगा। एक समाज जो अपने अतीत में केवल पराजय देखता है, वह भविष्य में भी केवल अनुकरणजीवी बनता है। एक राष्ट्र जो अपने अतीत में प्रतिरोध और पुनर्निर्माण देखता है, और अपनी शासन परम्परा और प्रतीकों में न्याय,करुणा और कल्याण देखता है, वह भविष्य में आत्मनिर्भर बनकर वैसा ही मॉडल निर्मित करने का उद्यम करता है। यह चेतना ही राष्ट्रीय सांस्कृतिक पुनर्जागरण का मूलमन्त्र है। यह किसी के विपक्ष में नहीं, बल्कि राष्ट्रभाव के पक्ष में है। यह किसी पंथ के विरूद्ध नहीं, बल्कि अपनी सभ्यता के हित में है। यह संशोधन केवल पाठ्यपुस्तक का नहीं, बल्कि राष्ट्रीय आत्मा का नव-संधान हैI आने वाली पीढ़ी यह सीख सकेगी कि भारत केवल एक भू-भाग नहीं, बल्कि एक जीवंत, संघर्षशील और सुशासित सभ्यता की जययात्रा है।














