सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि हिंदू धर्म छोड़कर इस्लाम अपनाने वाला व्यक्ति केवल अपने पूर्व सामाजिक वर्ग के आधार पर ‘पिछड़ा वर्ग मुस्लिम’ (बीसी मुस्लिम) श्रेणी में आरक्षण का दावा नहीं कर सकता। न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति चंद्रशेखर की पीठ ने मद्रास उच्च न्यायालय के फैसले को बरकरार रखते हुए तमिलनाडु सरकार की अपील खारिज कर दी। यह मामला कन्वर्जन के बाद पिछड़े वर्ग के आरक्षण की पात्रता और समुदाय प्रमाणपत्र जारी करने के नियमों से जुड़ा है।
सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि हिंदू सामाजिक व्यवस्था से निकलकर गैर-हिंदू बनने वाला व्यक्ति संविधान के अनुच्छेद 16(4) के अंतर्गत केवल अपने कन्वर्जन से पहले की सामाजिक स्थिति के आधार पर सकारात्मक कार्रवाई यानी आरक्षण का लाभ नहीं मांग सकता। इसके लिए संबंधित कानूनों और निर्धारित पात्रता शर्तों का पालन आवश्यक है। इस फैसले से यह स्पष्ट हुआ है कि कन्वर्जन और किसी अधिसूचित पिछड़े समुदाय का सदस्य होना दो अलग-अलग कानूनी प्रश्न हैं।
क्या है पूरा मामला?
यह विवाद तमिलनाडु सरकार के 9 मार्च, 2024 को जारी सरकारी आदेश संख्या जीओ (एमएस) संख्या 31 से जुड़ा है। इस आदेश के तहत पिछड़ा वर्ग (बीसी), अति पिछड़ा वर्ग (एमबीसी), विमुक्त समुदायों (डीएनसी) और अनुसूचित जातियों (एससी) से संबंधित ऐसे लोगों को इस्लाम अपनाने के बाद ‘पिछड़ा वर्ग मुस्लिम’ श्रेणी में शामिल करने का प्रावधान किया गया था, जो कन्वर्जन से पहले इन सामाजिक श्रेणियों में आते थे। सरकार की मंशा यह थी कि इस्लाम अपनाने वाले ऐसे लोगों को आरक्षण का लाभ प्राप्त करने में कठिनाई न हो। इस संबंध में तमिलनाडु पिछड़ा वर्ग आयोग ने 6 फरवरी, 2024 को सरकार को सिफारिश भी भेजी थी। हालांकि, इस सरकारी आदेश की संवैधानिक वैधता को न्यायालय में चुनौती दी गई। मद्रास उच्च न्यायालय की मदुरै पीठ ने 25 जून, 2026 को इस आदेश को असंवैधानिक घोषित करते हुए निरस्त कर दिया। इसके बाद तमिलनाडु सरकार ने उच्च न्यायालय के फैसले को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी। सर्वोच्च न्यायालय ने 15 अक्तूबर, 2026 को सरकार की अपील खारिज करते हुए उच्च न्यायालय के निर्णय को बरकरार रखा।
ऐसे शुरू हुआ विवाद
इस मामले के याचिकाकर्ता समीर अहमद एन. ने 2015 में इस्लाम अपनाया था। कन्वर्जन के बाद उसने अपना नाम बदल लिया और इस्लामी रीति-रिवाजों के अनुसार विवाह किया। बाद में उसने मुस्लिम लेब्बाई समुदाय का प्रमाणपत्र प्राप्त करने के लिए आवेदन किया। हालांकि, संबंधित तहसीलदार ने उसका आवेदन खारिज कर दिया। इसके बाद उसने मद्रास उच्च न्यायालय की मदुरै पीठ का रुख किया। याचिकाकर्ता का पक्ष था कि तमिलनाडु सरकार के 9 मार्च, 2024 के आदेश के आधार पर उसे पिछड़ा वर्ग मुस्लिम श्रेणी का प्रमाणपत्र दिया जा सकता है। सुनवाई के दौरान उच्च न्यायालय ने सरकारी आदेश की वैधता पर भी विचार किया। अदालत ने पाया कि सरकार का आदेश पूर्व न्यायिक निर्णयों के अनुरूप नहीं था। न्यायालय ने आदेश को असंवैधानिक घोषित कर दिया और तहसीलदार द्वारा प्रमाणपत्र देने से इनकार करने के निर्णय को बरकरार रखा। इसके बाद मामला सर्वोच्च न्यायालय पहुंचा।
ये जातियां हैं ओबीसी में
तमिलनाडु में सभी मुस्लिम जातियों को एक समान रूप से पिछड़ा वर्ग मुस्लिम श्रेणी में शामिल नहीं किया गया है। राज्य के संबंधित आरक्षण कानून के तहत अधिसूचित सात मुस्लिम जातियों को इस श्रेणी में रखा गया है। इनमें शामिल हैं: अंसार, दक्खनी मुस्लिम, दुबेकुला, लब्बाई, जिसमें रौथर और मरकयार शामिल हैं, मपिल्ला, शेख और सैयद। मुस्लिम लेब्बाई समुदाय इसी अधिसूचित सूची का हिस्सा है। इस मामले में मुख्य कानूनी प्रश्न यह था कि क्या हिंदू धर्म से इस्लाम अपनाने वाला व्यक्ति केवल कन्वर्जन और अपने पुराने सामाजिक वर्ग के आधार पर इन अधिसूचित समुदायों में से किसी एक का सदस्य माना जा सकता है! मद्रास उच्च न्यायालय ने कहा था कि किसी व्यक्ति को सरकारी आदेश के माध्यम से किसी विशिष्ट मुस्लिम समुदाय में शामिल मान लेने भर से उस समुदाय की सदस्यता और उससे जुड़े आरक्षण की पात्रता स्थापित नहीं हो जाती। सर्वोच्च न्यायालय ने उच्च न्यायालय के फैसले को बरकरार रखा।
अनुच्छेद 16(4) क्या कहता है?
संविधान का अनुच्छेद 16 सरकारी नौकरियों में अवसर की समानता से संबंधित है। इसके खंड (4) के तहत राज्य को ऐसे पिछड़े वर्गों के लिए नियुक्तियों या पदों में आरक्षण की व्यवस्था करने का अधिकार है, जिनका राज्य की राय में सरकारी सेवाओं में पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं है। इस प्रावधान का उद्देश्य सामाजिक पिछड़ेपन और सरकारी सेवाओं में अपर्याप्त प्रतिनिधित्व से जुड़ी असमानताओं को दूर करना है। हालांकि, किसी व्यक्ति की आरक्षण के लिए पात्रता निर्धारित करने में केवल उसकी पुरानी सामाजिक पहचान पर्याप्त नहीं होती। संबंधित समुदाय की अधिसूचित स्थिति और लागू कानूनी शर्तें भी महत्वपूर्ण होती हैं। सर्वोच्च न्यायालय के फैसले का आशय यह है कि किसी अन्य मत—पंथ को अपनाने के बाद व्यक्ति अपने पूर्व सामाजिक वर्ग के आधार पर स्वतः किसी दूसरी मजहब समुदाय-आधारित आरक्षण श्रेणी का सदस्य नहीं बन जाता।
कैसे अलग है यह मामला?
इस विवाद को समझने के लिए अनुसूचित जाति और पिछड़े वर्ग की श्रेणियों के बीच अंतर करना आवश्यक है। संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश, 1950 के तहत अनुसूचित जाति का दर्जा सामान्यतः हिंदू, सिख और बौद्ध मत मानने वाले व्यक्तियों तक सीमित है। इस आदेश में समय-समय पर संशोधन भी हुए हैं। इसके विपरीत, अन्य पिछड़ा वर्ग या राज्य की पिछड़ा वर्ग मुस्लिम श्रेणी के लिए अलग कानूनी प्रावधान और अधिसूचित समुदायों की सूचियां लागू होती हैं। इसलिए अनुसूचित जाति का दर्जा और पिछड़े वर्ग के आरक्षण की पात्रता एक ही बात नहीं हैं। वर्तमान मामले में विवाद विशेष रूप से तमिलनाडु की पिछड़ा वर्ग मुस्लिम श्रेणी और कन्वर्जन के बाद समुदाय प्रमाणपत्र जारी करने से संबंधित था।
फैसले का व्यापक महत्व
सर्वोच्च न्यायालय का यह निर्णय कन्वर्जन के बाद आरक्षण की पात्रता निर्धारित करने में राज्य सरकारों की शक्तियों और कानूनी सीमाओं से जुड़ा है। यह बताता है कि किसी सरकारी आदेश के माध्यम से आरक्षण की श्रेणी में पात्रता निर्धारित करते समय संवैधानिक प्रावधानों, लागू कानूनों और पहले से मौजूद न्यायिक निर्णयों का पालन करना आवश्यक है। तमिलनाडु सरकार का 2024 का आदेश उन लोगों के लिए था, जो हिंदू धर्म को छोड़कर कोई अनय मत अपना लिया है। यही वोट बैंक की राजनीति है। सर्वोच्च न्यायालय ने मद्रास उच्च न्यायालय का फैसला बरकरार रखते हुए स्पष्ट किया कि हिंदू धर्म से इस्लाम अपनाने मात्र से व्यक्ति को ‘पिछड़ा वर्ग मुस्लिम’ श्रेणी में आरक्षण की पात्रता नहीं मिल जाती। किसी भी आरक्षण का लाभ लेने के लिए संबंधित समुदाय की मान्यता और लागू कानूनी शर्तों को पूरा करना आवश्यक है। यह निर्णय तमिलनाडु के विवादित सरकारी आदेश और उससे जुड़े कानूनी प्रश्नों के संदर्भ में आया है।

















