बलरामपुर। बलरामपुर जिले के चलगली थाना क्षेत्र के ग्राम गम्हरिया निवासी 48 वर्षीय सीताराम सोनवानी कभी उत्तर छत्तीसगढ़ में नक्सली संगठन का एरिया कमांडर था। संगठन में रहते हुए वह बलरामपुर जिले में हुई कई नक्सली गतिविधियों में शामिल रहा। आज वही सीताराम हथियार छोड़कर अपने परिवार के साथ सामान्य जिंदगी बिता रहा है।
छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद के खिलाफ लंबे समय से चल रही लड़ाई अब खत्म हाे चुकी है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने 24 अगस्त 2024 को बस्तर दौरे के दौरान 31 मार्च 2026 तक देश से नक्सलवाद खत्म करने का संकल्प जताया था। इसके बाद सुरक्षा बलों ने लगातार अभियान चलाए। बड़ी संख्या में नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया, जबकि हथियार नहीं छोड़ने वाले कई नक्सली मुठभेड़ों में मारे गए। कभी नक्सल गतिविधियों से प्रभावित रहा उत्तर छत्तीसगढ़ भी अब इस समस्या से मुक्त हो चुका है। इसी बीच बलरामपुर जिले में एक ऐसी कहानी सामने आई है, जो बताती है कि हिंसा का रास्ता छोड़कर सामान्य जीवन में लौटने वाले लोगों की जिंदगी कैसे बदल रही है।
सीताराम सोनवानी ने बताया कि वर्ष 1990 के आसपास उनके क्षेत्र में गरीबी और बेरोजगारी काफी थी। परिवार की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी। घर की हालत सुधारने की उम्मीद में उसने वर्ष 1998 में एमसीसीआई (माओवादी कम्युनिस्ट सेंटर ऑफ इंडिया) में बतौर सैनिक भर्ती होकर हथियार उठा लिया।बाद में एमसीसीआई का भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) में विलय हो गया। इसके बाद संगठन में उसकी जिम्मेदारी बढ़ी और उसे उत्तर छत्तीसगढ़ का एरिया कमांडर बनाया गया। इस दौरान वह संगठन की कई गतिविधियों में शामिल रहा।
सीताराम के अनुसार वर्ष 2003 के आसपास त्रिकुंडा थाना क्षेत्र के मरमा चौकी में पुलिस के साथ नक्सलियों की मुठभेड़ हुई थी। इस दौरान तत्कालीन एसपी शिवराम प्रसाद कल्लूरी के पैर में गोली लगी थी, जबकि नक्सली संगठन के दो सदस्य मारे गए थे। इसके बाद वर्ष 2004 में गोवर्धनपुर में पुलिस के साथ मुठभेड़ हुई थी। इस घटना में उसका साथी शंकर यादव पकड़ा गया था। सीताराम ने बताया कि वर्ष 2005 में उसने नक्सली संगठन छोड़ दिया और अपनी पत्नी विराजो के साथ असम चला गया। वहां करीब 16 वर्षों तक जोरहाट जिले में मजदूरी कर जीवनयापन किया। इस दौरान वह सुरक्षा कारणों से अपने पुराने क्षेत्र से दूर रहा।
कोरोना महामारी के दौरान समाचार पत्रों के माध्यम से उसे सरकार की आत्मसमर्पण और पुनर्वास नीति की जानकारी मिली। उसकी पत्नी भी लगातार उसे हिंसा का रास्ता छोड़कर सामान्य जीवन में लौटने के लिए प्रेरित करती रही। आखिरकार पत्नी की समझाइश और सरकार की पुनर्वास नीति से प्रभावित होकर उसने 26 फरवरी 2021 को तत्कालीन एसपी रामकृष्ण साहू के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया।
आत्मसमर्पण के बाद सीताराम को करीब 14 महीने रामानुजगंज जेल में रहना पड़ा। इसके बाद जमानत मिलने पर वह बाहर आया। सरकार की पुनर्वास योजना के तहत उसे प्रधानमंत्री आवास योजना से पक्का मकान मिला। इससे परिवार को रहने के लिए स्थायी ठिकाना मिल गया। कभी जंगलों में संगठन के साथ जीवन बिताने वाला सीताराम अब परिवार के साथ सामान्य जिंदगी जी रहा है। बुधवार को बलरामपुर के रक्षित आरक्षित परेड ग्राउंड में पुलिस स्मृति दिवस का आयोजन किया गया। इस दौरान आत्मसमर्पण कर मुख्यधारा में लौटे पूर्व नक्सलियों की लंबे समय से लंबित प्रोत्साहन राशि का वितरण किया गया।
जिले के एसपी वैभव बेंकर ने बताया कि बलरामपुर जिले में कुल 24 पूर्व नक्सली आत्मसमर्पण कर चुके हैं। ये सभी अब मुख्यधारा में लौटकर अपने परिवार के साथ जीवनयापन कर रहे हैं। शासन से मिलने वाली इनकी प्रोत्साहन राशि लंबे समय से लंबित थी। अब करीब 3.45 लाख रुपये की राशि प्राप्त हुई है, जिसे संबंधित हितग्राहियों को वितरित किया जा रहा है। सीताराम सोनवानी की कहानी बताती है कि गरीबी और बेरोजगारी के कारण हिंसा के रास्ते पर जाने वाला व्यक्ति भी सही मार्गदर्शन, परिवार के सहयोग और पुनर्वास के अवसर मिलने पर नई शुरुआत कर सकता है। कभी उत्तर छत्तीसगढ़ में नक्सली संगठन की जिम्मेदारी संभालने वाला सीताराम आज अपने परिवार के साथ शांतिपूर्ण जीवन बिता रहा है।

















