पाञ्चजन्य के सुशासन संवाद मुंबई में प्रख्यात अभिनेता औऱ महाभारत के श्रीकृष्ण रहे नीतीश भारद्वाज ने ओटीटी को लेकर अहम विचार रखे। उन्होंने वरिष्ठ पत्रकार तृप्ति श्रीवास्तव के साथ विविध विषयों पर चर्चा की। उन्होंने कहा कि ओटीटी की ही देन है कि आज गालियों को न्यू नॉर्मल कहा जा रहा है। इसका असर ये हो रहा है हाल ही में हुए आंदोलनों में प्रधानमंत्री और रक्षा बलों के लिए अपशब्द को भी नॉर्मल कहा जा रहा है।
महाभारत और रामायण एक वक्त में हम सभी देखते थे और अनुभवों को साझा करते थे, लेकिन आज की पीढ़ी फोन में खोई है। क्या दर्शक बदल गए हैं, कंटेंट बदल गया है? आप इस बदलाव को कैसे देखते हैं?
ये बहुत बड़ा बदलाव है। आपने इंस्टाग्राम जैसे प्लेटफॉर्म पर देखा होगा कि 1991 में जो टेलीफोन था वो तार के साथ था। तब सब लोग उसके चारों तरफ बात करने के लिए खड़े होते थे। लेकिन, वक्त बदला और आज ये सब खत्म होता है। पहुंच का ये नकारात्मक रूप देखने को मिला है। आज व्यक्ति के पास हर चीज का एक्सेस इतना अधिक है कि आज चार साल का बच्चा भी मोबाइल देखता है। मैं ये मानता हूं कि 18 वर्ष तक बच्चों को मोबाइल देना ही नहीं चाहिए।
मोबाइल तक बच्चों की पहुंच पर नियंत्रण जिम्मेदारी के साथ एक चुनौती भी है। माता पिता नौकरीपेशा हैं तो मोबाइल बच्चों के लिए विकल्प बन जाता है?
ये विकल्प किताबें भी तो हो सकती हैं। मुंबई में मैंने कई ऐसे बच्चे देखें हैं, जो कि केवल अंग्रेजी में ही बात करते हैं। ऐसे ही पुणे में कुछ लोग केवल मराठी में ही बात करते हैं। उन्हें हिंदी बोलने में झिझक होती है। स्कूलों में सारे क्रियाकलाप अंग्रेजी में हैं। किताबें नहीं पढ़ने का असर हो रहा है कि ऐसे बच्चों की शब्दावली बहुत बिगड़ गई है। इसका एक हल ये ही है कि मोबाइल की जगह बच्चों को किताबें दें।
ओटीटी आने के बाद अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर चीजें हाथ से बाहर निकलती दिख रही हैं। इस रचनात्मक स्वतंत्रता को आप कैसे देखते हैं?
हर चीज की स्वतंत्रता अपने आप में एक वरदान है। जब लोग इस्लामिक देशों में जाते होंगे, तो वहां स्वतंत्रता न होने कारण उन्हें ये समझ आता होगा कि स्वतंत्रता तो वरदान है। लेकिन, स्वतंत्रता को सरकार की जिम्मेदारी बनती है। दूरदर्शन के कारण ही आज लोगों को याद किया जाता है। लेकिन, आज ऐसे रेगुलेशन बना दिया गया है कि दूरदर्शन ने खुद को इर्रीलिवेंट बना लिया है। ओटीटी के मामले में क्या सरकारें ये देख नहीं पा रही हैं कि आपने जो स्वतंत्रता दी है, उसके माध्यम से अमुक चैनल स्थापित होने जा रहे हैं। इनमें दुनियाभर के कंटेंट आ रहे हैं। तो उसका रेग्युलेटरी मैकेनिज्म क्या होना चाहिए?
ओटीटी टीवी का एक ग्लोरिफाईड स्वरूप है। जहां आपको थोड़ा बेहतर बजट मिलता है। लाभ ये होता है कि आप वहां ऐसे प्रोजेक्ट पर वेब सीरीज बना सकते हैं, जिन पर फिल्म नहीं बन सकती है। ओटीटी में आज अपशब्दों में नॉर्मलाइज किया जा रहा है। लेकिन, मेरे लिए इंडिया आज भी भारत है। ओटीटी को रेग्युलेट करने के लिए जो नियम होने चाहिए, वो सही से काम नहीं कर रहा है।
ओटीटी में अपशब्दों में न्यू नॉर्मल बनाने की कोशिश की जा रही है और कह दिया जाता है कि दर्शक समझदार है, उन्हें तय करने दीजिए?
उन्हीं दर्शकों में से कुछ आंदोलनों में प्रधानमंत्री और रक्षा बलों के लिए कितनी अभद्र भाषाओं का इस्तेमाल किया गया। ऐसा इसलिए कि उस पीढ़ी के लिए ये गालियां नॉर्मल हैं। आंदोलनों में लोग कहते हैं यो…दिस इज नॉर्मल। ये भारत की सभ्यता और संस्कृति नहीं है। विदेशों में जाकर देखिए कि उनकी संस्कृति के खिलाफ कुछ बोला जाता है तो वे उठकर खड़े हो जाते हैं। हम क्यों नहीं हो रहे हैं? क्यों हमारी सरकार एक्शन नहीं लेती?
आजकल ओटीटी प्लेटफॉर्म पर कोई भी सीरीज आती है तो विवादों के साथ आती है। विवाद और प्रचार क्या इनके बीच की रेखा धूमिल हो रही है?
विवाद ही तो प्रचार है। विवाद भी एक प्रचार है।
विवादास्पद बनाकर प्रचार करने को आप कैसे देखते हैं?
समय बदल गया है। महाभारत में जिस पैसे पर हमने काम किया, उस पर आज घर में भी काम करने वाला कोई नहीं मिलेगा। आज सब कुछ वाणिज्य है।

















