पाञ्चजन्य के सुशासन संवाद ‘ओडिशा की उड़ान 2.0’ संवाद में पाञ्चजन्य में विश्व हिन्दू परिषद के संयुक्त महासचिव डॉ सुरेंद्र जैन से वरिष्ठ पत्रकार अनुराग पुनेठा न विभिन्न विषयों पर बातचीत की। इस मौके पर सुरेंद्र जैन ने राम मंदिर के कथित चढ़ावा चोरी को लेकर बड़ा बयान देते हुए कहा कि देश की जनता इससे प्रभावित नहीं थी। सबको समझ आ रहा था कि इस वितंडावाद का केवल राजनैतिक उद्देश्य था। उनके निशाने पर रामजन्मभूमि या राम मंदिर नहीं, बल्कि हिन्दुओं की आस्था थी, जिसे वो कमजोर करना चाहते थे।
विश्व हिन्दू परिषद की यात्रा को आप किस तरह से देखते हैं?
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की 100 वर्ष की यात्रा किसी एक संगठन की नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण की यात्रा है। यह यात्रा है आत्मग्लानि से आत्मबोध, आत्मविस्मृति से आत्म गौरव की। जब संघ की स्थापना हुई तो कोई भी भारत के बारे में गर्व की बात नहीं करता था। उस दौरान लोग कहते थे कि भारत की नियति टुकड़ों-टुकड़ों में बंट जाना है। उस दौरान तक भारतीय कहलाना गर्व का नहीं, शर्म का विषय माना जाता था। लेकिन, इन 100 वर्षों की यात्रा में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवकों ने घर-घर जाकर लोगों को भारतीयता की जड़ों से जोड़ने का काम किया। आत्मविस्मृति की मायाजाल को संघ ने तोड़ दिया।
करीब 15 साल पहले मैं भुवनेश्वर में एक कार्यक्रम के लिए आया था। कार्यक्रम का नाम था ओडिशा विजन-2020। उस दौरान भी इसी तरह की बातें हुई, लेकिन मन में इस बात का विश्वास नहीं था कि ओडिशा का इस तरह से विकास हो पाएगा। क्योंकि, उस दौरान तक यह देखने को मिल रहा था कि ओडिशा भगवान जगन्नाथ का नाम तो लेता था, लेकिन उनके आदर्शों का पालन नहीं करता था। लेकिन, आज मुझे इस बात की कोई आशंका नहीं है और मैं आश्वस्त हूं कि ओडिशा निश्चित रुप से आगे बढ़ेगा। मेरा ये विश्वास इसलिए है, क्योंकि संघ ने इस देश को इसकी जड़ों के साथ जोड़ा है। संघ के स्वयंसेवक के रूप में इस यात्रा से जुड़कर मैं गौरव की अनुभूति करता हूं।
वीएचपी जैसे संगठनों की स्थापना संघ ने इसीलिए की थी, ताकि देश के साधु संतों के द्वारा लोगों को उनकी जड़ों से जोड़ा जा सके। एक बार डॉ भीमराव अंबेडकर डॉ हेडगेवार से मिले थे और उन्होंने उनसे कहा था कि अगर आप इस देश के साधु संतों से ये कहलवा दें कि छुआ छूत हमारी संस्कृति नहीं है तो छुआछूत रहित सपनों के भारत का निर्माण किया जा सकता है। उसके बाद गुरूजी ने हिंदवासोदरा उडुपी के अंदर इसका ऐलान करवाया था। आज केवल राजनीति में ही छुआछूत दिखाई देता है।
क्या आपको लगता है कि संगठन की यात्रा प्रतिकूलता के साथ ज्यादा रही?
प्रतिकूलता कैसी भी रही हो, वो हमारे लिए खुराक रही है। वो फिर चाहे प्रतिबंध हों या फिर वैचारिक संघर्ष रहा हो। संघ के स्वयंसेवक ने कभी किसी प्रतिकूलता के सामने अपना मस्तक नहीं झुकाया, अपितु उससे प्रेरणा लेकर और अधिक मजबूत होकर निकला। संघ की छवि कभी भी आम जनमानस में नहीं बिगड़ी। बेशक कुछ राजनेता और मीडिया इसे खराब करने की कोशिश करते हैं। लेकिन आम जनमानस में यह हमेशा वैसी ही रही। इसे ऐसे समझा जा सकता है कि जब एक आह्वान पर देश के 60 करोड़ लोग राम मंदिर के निर्माण के लिए अपना योगदान देते हैं तो इससे सिद्ध होता है कि संघ की विश्वसनीयता लोगों के बीच कभी कम नहीं हुई।
राम मंदिर बीते कुछ वक्त में कुछ और ही विषय से चर्चा में है। क्या आपको लगता है कि इससे आम जनमानस इससे आहत हुआ है?
आप जिस विवाद का जिक्र कर रहे हैं, जिसे चंदा चोरी या चढ़ावा चोरी कहा जा रहा है। देश की जनता इससे प्रभावित नहीं थी। सबको समझ आ रहा था कि इस वितंडावाद का केवल राजनैतिक उद्देश्य था। उनके निशाने पर रामजन्मभूमि या राम मंदिर नहीं, बल्कि हिन्दुओं की आस्था थी, जिसे वो कमजोर करना चाहते थे। लेकिन एक क्षण के लिए आस्था नहीं हिली। आज भी प्रतिदिन 80-90 हजार लोग प्रतिदिन राम मंदिर आते हैं। मैं अगर केवल उस के सप्ताह की बात करूं, जब ये विवाद चला तो उस दौरान वो संख्या 92,000 तक पहुंची, लेकिन 60,000 से कम कभी नहीं हुई।
क्या इससे और अच्छे तरीके से निपटा नहीं जा सकता था?
एक विमर्श शायद सूचनाओं के अभाव में उस समय हम स्थापित कर पाने में विफल रहे, “ये चंदा चोरी नहीं थी।” ये 20,000 करोड़ की चोरी तो बिल्कुल नहीं थी। केवल 6 लोगों ने मिलकर एक समूह बनाया और वो गड़बड़ी कहीं भी चढ़ावे में नहीं की गई। ये गड़बड़ी चढ़ावे की गिनती करने में हुई थी औऱ गिनती करने की जिम्मेदारी स्टेट बैंक ऑफ इंडिया की अयोध्या ब्रांच की थी। इसके अलावा जिन लोगों ने ये गड़बड़ी की वो पुजारी नहीं थे, ट्रस्ट के पदाधिकारी भी नहीं थे। वो सब के सब स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के कर्मचारी थे। बहरहाल मामले में केस दर्ज हुई और जब जांच के बाद पता चला कि करीब एक से डेढ़ करोड़ से अधिक की अनियमितता नहीं हुई।
ये पहली बार नहीं है कि इस आदोलन के हर कदम पर आरोप लगे हैं। पहला आरोप शिला पूजन के समय लगा था। जब चढ़ावा मामले में केस दर्ज हुआ तो तो पहला केस खुद ट्रस्ट ने किया था। लेकिन ये भी सच है कि उस दौरान इसे हम सही तरीके से एड्रेस नहीं कर पाए। इसमें हम पीछे रहे।
विश्व हिन्दू परिषद की आगामी योजना क्या है?
भारत की यात्रा मंदिर निर्माण से राष्ट्र मंदिर निर्माण की ओर बढ़ चली है। प्राण प्रतिष्ठा के समय ही सरसंघचालक जी ने एक आह्वान किया था कि आज रामलाल राम मंदिर के अंदर प्रस्थापित हो गए हैं। अब हमें रामलला को प्रत्येक हृदय के अंदर स्थापित करना है। इसलिए राम मंदिर से राष्ट्रमंदिर का यात्रा शुरू हो चुकी है, जिसमें संस्कार देना और अपनी जड़ों की ओर लौटना शामिल है।
ओडिशा में जनजातीय समाज है और उसकी अपनी चिंताएं हैं, संघ और उसके अनुषांगिक संगठन इस पर काम कर रहे हैं। जनजातीय समाज को हिन्दू समाज से जोड़ने की दिशा में प्रयास को किस तरह देखते हैं?
‘अगर जनजातीय हिन्दू नहीं हैं, तो हिन्दू कौन हैं’, राजा राम को या राजकुमार राम को अथवा मर्यादा पुरुषोत्तम राम को भगवान राम बनाने का काम जनजातीय लोगों ने ही किया था। महाराणा प्रताप का साथ उनके परिवार, उनके भाइयों ने तक छोड़ दिया था, लेकिन वहां के जनजातियों ने उनका साथ नहीं छोड़ा था। बप्पा रावल से लेकर महाराणा प्रताप तक 1000 वर्षों तक राष्ट्र की रक्षा के लिए निरंतर काम करते रहे। इसलिए जब कोई देश की जनजातीय समाज को मुख्यधारा से जोड़ने की बात करता है तो वह प्रश्न ही गलत होता है। हमारी मुख्यधारा को देश की जनजातियों ने ही बहाई है। प्रकृति पूजन, वृक्ष पूजन की हमारी मुख्यधारा है और यही वनवासियों की परंपरा है। असल में उन्हें हमसे जोड़ने की जरूरत नहीं है, बल्कि हमें उनसे जुड़ने की जरूरत है।
1970 में पूज्य गुरूजी ने असम में एक जनजातीय सम्मेलन करवाया था। नागालैंड की रानी गाइडील्यू उस सम्मेलन में थीं। वहां एक स्वर में कहा गया कि जनजातीय इस देश के मूल निवासी हैं। जनजातीय समाज हिन्दू समाज का अभिन्न हिस्सा है। ईसाई मिशनरी जनजातियों को काटने में लगे हुए हैं।
क्या हिन्दुत्व और जनजातीय एक-दूसरे के पूरक हैं?
निश्चित रूप से। आप देखेंगे तो पाएंगे कि जनजातियों की सारी परंपराएं हिन्दुत्व से जुड़ी हैं। केवल हिन्दू ही प्रकृति की पूजा करता है। वनवासियों का चिंतन भी यही है। इसलिए वनवासी चिंतन हिन्दू चिंतन से अलग नहीं है।
युवाओं (Gen-Z) से संवाद को आप किस तरह से देखते हैं?
आज से 18 वर्ष पूर्व स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती की उनके चार साथियों के साथ बर्बर हत्या कर दी गई थी। उन्हें गोलियों से भूनने के बाद उन हत्यारों ने कुल्हाड़ी से उनके हाथ-पैर काटे थे। लक्ष्मणानंद सरस्वती ने 1968 में कंधमाल को अपनी कर्मभूमि बनाया था। उन्होंने पांच J (जन, जाति, जंगल, जल, जमीन) को बचाने के लिए काम किया था। क्योंकि इसे ईसाई मिशनरी उनसे छीन रहे थे। उनकी जमीनों पर चर्च बना रहे थे और इनका धर्मान्तरण करा रहे थे। स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती ने लोगों को इससे बचाने के लिए 900 से अधिक एकल विद्यालय कंधमाल में चलाए थे।
पूरे देश में नशा माफिया ईसाई मिशनरी चला रहे हैं। उन्हें 20 बार धमकी दी गई थी, 8 बार हमले किए गए थे। लेकिन, फिर भी उस वक्त का प्रशासन सोया रहा। लक्ष्मणानंद की हत्या पर देश का सेक्युलर मीडिया चुप्पी साधे रहा। लेकिन, जब जनजातीय समाज ने आवाज उठाई तो मनमोहन सिंह ने उसे राष्ट्रीय शर्म करार दे दिया।
क्या अपनी बात को मजबूती से रख पाने में संघ और उसके अनुषांगिक संगठन पीछे रह गए हैं?
मैं इससे सहमत नहीं हूं। विश्व का सबसे बड़ा विमर्श वाला व्यक्ति अगर कोई था, तो वे डॉ हेडगेवार थे। उन्होंने 100 साल पहले कहा था-भारत हिन्दू राष्ट्र है और आज देश के करोड़ों लोग यही कहते हैं। आज विरोधी मीडिया हिन्दू राष्ट्र पर चर्चा कर रहे हैं। लोगों को आज विश्वास हो चला है कि भारत हिन्दू राष्ट्र था, है और रहेगा।















