पांञ्चजन्य के सुशासन संवाद मुंबई में प्रख्यात फिल्म निर्देशक चंद्र प्रकाश द्विवेदी से वरिष्ठ पत्रकार अनुराग पुनेठा ने विभिन्न मुद्दों पर बात की। पेश हैं उसके अंश-
आज बॉलीवुड की स्थिति कैसी है?
इस देश में कौटिल्य, अशोक, चोल हैं। यदि हिन्दू समाज ने क्षत्रपति शिवाजी महाराज की खुले मन से मदद की होती तो उन्हें सूरत नहीं जाना पड़ता। कड़वी मगर सच्चाई यही है कि हमारा समाज अपनी जिम्मेदारी लेने को तैयार नहीं है। इसीलिए हम लोग कल्पना करते हैं कि चोल कब आएंगे। आप अपने बालक को विश्व के श्रेष्ठ विद्यालयों में पढ़ाना चाहते हैं। लेकिन, क्या कोई माता पिता ये तय करता है कि मैं अपने बच्चे को सर्वश्रेष्ठ सिनेमा दिखाऊंगा? इस पर तो कोई बात ही नहीं होती। मैंने एक चाणक्य तो बना लिया, लेकिन मेरे जीवन का बड़ा समय इसे बनाने में नहीं, बल्कि सत्ता के साथ लड़ने में लगा। सच्चाई यह है कि समाज की सिनेमा में कोई भागीदारी नहीं है।
इसलिए, समाज ये अपेक्षा भी न करे, जो समाज चाहता है। सिनेमा बनाने वाला जो करोड़ों लगाता है, उसके लिए लाभ पहली शर्त है। शिकायत मुझे फिल्मकारों से नहीं, बल्कि समाज से है।
ये सिर्फ एक विचारधारा के परिप्रेक्ष्य में रखने की चुनौती है या फिर आपने चूंकि एक तरह की फिल्में बनाईं, जिसमें इतिहास और संस्कृति थी तो आपको अधिक झेलना पड़ा?
पहले तो हमारे पास ऐसा कोई ठोस कारण नहीं था कि हम इसके लिए लड़ें। लेकिन, अब दूसरी मानसिकता भीड़ की है। उदाहरण के तौर पर पद्मावत फिल्म, जिसे 4 राज्यों ने बैन किया था। जबकि, सुप्रीम कोर्ट ने ये कहा था कि अगर कोई दंगा होता है तो सरकारें उसे रोकें। तो क्या हमारे राज्यकर्ताओं ने इसे माना? वो किसे खुश करने में लगे थे। भारत में फिल्मों के प्रमाणन के लिए सीबीएफसी है। लेकिन दूसरा सच ये भी है कि आज भारत के हर गली मोहल्ले में यह है।
क्या सारा दोष समाज पर ही मढ़ देना, एक फिल्म निर्माता की तरफ से ज्यादती नहीं है?
इस देश में करीब 300 रामायण हैं और इस पर सबसे गंभीर अध्ययन फादर कामिल बुल्के का है। बेल्जियम के रहने वाली पादरी बुल्के भारत क्रिश्चियनिटी का प्रचार करने आए थे। यहां वो तुलसी रचित रामायण पढ़ते हैं औऱ फिर इसका अध्ययन करते हैं। फादर बुल्के ने कहा था-राम की कथा विश्व मानवता की कथा है। ये भारत की परंपरा रही है कि सभी लेखकों ने मूल कहानी की आत्मा को शामिल करते हुए उसे अपने हिसाब से लिखा है।
क्या फिल्में बैलेंस होनी चाहिए, इतिहास का पुनर्पाठ हो, लेकिन फैक्ट्स के साथ सेंटिमेंट को भी समझा जाए?
मुझे चाणक्य धाराविक को फिर से बनाने का प्रस्ताव एक बड़ी कंपनी के द्वारा आया था। उसमें चाणक्य को धूर्त और दुष्ट दिखाने की मांग की गई। सवाल ये खड़ा हुआ कि जो काम मैंने 30 साल पहले किया था, तो क्या 30 साल बाद बाजार और लोगों के मनोरंजन के लिए ।
एक फिल्ममेकर की कमाई दर्शकों के प्रेम पर निर्भर होती है?
इतिहास से लगाव होना अच्छी बात है, लेकिन समाज को बदलने के लिए आप अमेरिका में बैठकर काम नहीं कर सकते।
क्या सिनेमा की भाषा नहीं बदली है? क्या भारत का जनमानस बदला है?
मैं आइटम सॉन्ग का सबसे बड़ा विरोधी हूं, तब तक जब तक कि मैंने नाट्य शास्त्र नहीं पढ़ा। क्योंकि, उसके प्रथम अध्याय में ही भरत मुनि ने लिखा है कि नाट्य में सब कुछ होना चाहिए। सिनेमा एक विशुद्ध व्यवसाय है। जब भी आप कोई अच्छी फिल्म देखते हैं, वो बाई डिजाइन बहुत कम होती है। बाई डिफॉल्ट बहुत ज्यादा होती है।















