वाल्मीकि रामायण अथवा उस पर आधारित श्रीराम का इतिहास केवल भारत तक सीमित नहीं है। यह प्राचीन काल से ही विश्व की अनेक भाषाओं और संस्कृतियों में प्रतिष्ठित रहा है। इसी वैश्विक स्वीकार्यता और साहित्यिक महत्ता के कारण इसे ‘आदिकाव्य’ कहा जाता है।
चीन में तीसरी शताब्दी में ‘अनामक जातकम्’ तथा पांचवीं शताब्दी में ‘दशरथ जातकम्’ का अनुवाद किया गया। तिब्बती और खोतानी भाषाओं में भी रामायण के अनेक रूप उपलब्ध हैं। बौद्ध परंपरा से संबंधित रामायण-जातकों का 5वीं शताब्दी में सिंहली भाषा में अनुवाद हुआ। बर्मा (म्यांमार) में ‘महायम वथतू’, कंबोडिया में ‘रामकीर्ति’, जावा में ‘पुरानी रामकाकविन’ तथा लाओस में ‘राम जातक’ वाल्मीकि रामायण से प्रेरित प्रमुख कृतियां हैं।
……………………….
फलक में भेंट लिए खड़ी शूर्पणखा के पीछे एक महिला संभवत: दासी है, जिसका उल्लेख किसी भी ग्रंथ में नहीं है। बाईं ओर राम भव्य इमारत के सामने बैठे हैं। संभवतः उनकी दाईं ओर कमल को लिए हुए महिला सीता हैं।
थाईलैंड के राजा राम प्रथम ने ‘रामकियन’ के रूप में रामकथा का संकलन कराया, जिसमें 2,976 पृष्ठ और 50,286 दोहे हैं। जापानी भाषा में भी रामायण के पांच रूप प्रचलित हैं। अरबी भाषा में वादी-उल-बुस्तानी ने रामायण का अनुवाद किया। इनके अतिरिक्त ब्राजील, बुल्गारिया, चेक गणराज्य (पूर्व चेकोस्लोवाकिया), मिस्र, फ्रांस, जर्मनी, हंगरी, इटली, नॉर्वे, रूस, स्पेन, स्वीडन, तुर्की और यूक्रेन सहित अनेक देशों में भी रामायण के अनुवाद उपलब्ध हैं।

रामकथा का प्रभाव साहित्य तक सीमित नहीं रहा; उसने विश्व की कला और संस्कृति को भी गहराई से प्रभावित किया है। कंबोडिया और इंडोनेशिया के पाषाण शिल्पों में रामायण के दृश्य इसकी वैश्विक सांस्कृतिक छाप के सशक्त प्रमाण हैं। विश्व के सर्वाधिक मुस्लिम आबादी वाले देश इंडोनेशिया में लगभग 87 प्रतिशत लोग इस्लाम मानते हैं, फिर भी वहां हिंदू और बौद्ध विरासत सुरक्षित है। विशेष रूप से बाली द्वीप अपने 20,000 से अधिक मंदिरों के लिए हिंदू संस्कृति का प्रमुख केंद्र माना जाता है।
इंडोनेशिया का प्रसिद्ध प्रम्बानन मंदिर भगवान शिव को समर्पित है। लगभग 47 मीटर ऊंचे इस मंदिर की दीवारों पर रामायण, महाभारत और हिंदू धर्म से जुड़े प्रसंगों की सुंदर नक्काशी मिलती है। यह मंदिर इंडोनेशिया की बहुलतावादी संस्कृति और प्राचीन भारतीय प्रभाव का सशक्त प्रतीक है।
दक्षिण-पूर्व एशिया में रामायण
दक्षिण-पूर्व एशिया में रामायण के प्रसार का सबसे प्राचीन अभिलेखीय प्रमाण कंबोडिया से मिलता है। इतिहासकार आर. सी. मजूमदार ने Inscriptions of Kambuja (पृष्ठ 19) में उल्लेख किया है कि चित्रसेन का 598 ई. का थमा क्रे अभिलेख संस्कृत के अनुष्टुप छंद में सात पंक्तियों का है। इसमें सोमश्रवण द्वारा त्रिभुवनेश्वर और सूर्य की प्रतिमाएं स्थापित कराने तथा मंदिर में रामायण, महाभारत और पुराणों की प्रतियां नित्य पाठ के लिए समर्पित करने का उल्लेख है। इससे स्पष्ट होता है कि छठी शताब्दी तक कंबोडिया में रामायण धार्मिक और सांस्कृतिक जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुकी थी।
इन अभिलेखों से स्पष्ट है कि उस काल तक कंबोडिया में रामायण और महाभारत धार्मिक एवं सांस्कृतिक जीवन का अभिन्न हिस्सा बन चुके थे। इंडोनेशिया में रामकथा का पहला शिलालेखीय प्रमाण 732 ई. के राजा संजय के अभिलेख में मिलता है। इसमें उनकी दिग्विजय की तुलना भगवान राम के पूर्वज राजा रघु की विजय से की गई है, जिसका वर्णन कालिदास ने ‘रघुवंश’ महाकाव्य में किया है। एच. बी. सरकार की पुस्तक Corpus of the Inscriptions of Java के अनुसार, 821 से 938 ई. के बीच जावा के कई अभिलेखों में रामायण से जुड़े नाम मिलते हैं। इनमें रावण, पवन, आयुद्ध, भरत, राम, लाघव (राघव), रामायण, अज, सीता, बाली और लक्ष्मण प्रमुख हैं।

इन उल्लेखों से स्पष्ट है कि नौवीं-दसवीं शताब्दी तक मध्य जावा में रामायण के पात्रों और कथा से समाज परिचित था। रामायण वहां साहित्य से आगे बढ़कर सांस्कृतिक स्मृति, नामकरण और राजकीय वैधता का आधार बन चुकी थी। रामायण के सार्वजनिक पाठ और नाट्य-प्रदर्शन का सबसे प्राचीन अभिलेखीय प्रमाण 907 ई. के राजा बलितुंगकालीन जावानीस शिलालेख में मिलता है। इसमें रामायण और महाभारत पर आधारित प्रस्तुतियों का उल्लेख है।
अभिलेख के अनुसार, सी नालू ने कीचक की शैली में भीमकुमार का नृत्य-पाठ किया, सी जलुक ने बांसुरी वादन के साथ रामायण का पाठ किया, जबकि सी मुंगमुक और सी गालिकी ने देवताओं के सम्मान में वायंग यानी छाया-नाटक और विशेष रूप से भीमकुमार प्रस्तुत किया। विद्वानों के अनुसार, ‘भीमकुमार’ संभवतः महाभारत के घटोत्कच प्रसंगों से जुड़ा है, जिसने जावानीस वायंग परंपरा को कई लोकप्रिय कथानक दिए।

ओर मुख और ऊपर एक आंख है। लेकिन चित्र में उसके दो चेहरे और चार आंखें हैं।
प्राचीन जावा की रामायण (Old Javanese Ramayana—OJR) पर एशिया और यूरोप के अनेक विद्वानों ने शोध किया है। केर्न, जुयनबोल, स्टटरहाइम, गोरिस, आइचोले, पोएर्बत्जारका, बर्ग, घोष, फादर कामिल बुल्के और हूयकास जैसे अध्येताओं के शोध से माना जाता है कि OJR का प्रारंभिक भाग संस्कृत के भट्टिकाव्य पर आधारित है। भट्टिकाव्य, जिसका मूल नाम रावणवध है, महाकवि भट्टि ने छठी-सातवीं शताब्दी में गुजरात के वलभी में राजा श्रीधरसेन के समय रचा था। इसमें रामजन्म से रावण-वध और राम के राज्याभिषेक तक की कथा है। यह काव्य साहित्यिक सौंदर्य के साथ संस्कृत व्याकरण-शिक्षण के लिए भी प्रसिद्ध है।
प्राचीन जावा की रामायण इंडोनेशिया के सबसे प्रभावशाली ग्रंथों में रही है। राजा बलितुंग (898–910 ई.) के शासनकाल से लेकर आज तक यह इंडोनेशिया की सांस्कृतिक चेतना, साहित्य, रंगमंच और लोकजीवन का अभिन्न हिस्सा बनी हुई है।
प्राचीन जावा की रामायण इंडोनेशिया के सबसे प्रभावशाली ग्रंथों में रही है। मध्य एवं पूर्वी जावा के राजा बलितुंग (898-910 ई.) के शासनकाल से लेकर आज तक यह इंडोनेशिया की सांस्कृतिक चेतना, साहित्य, रंगमंच और लोकजीवन का अभिन्न हिस्सा बनी हुई है।

प्रम्बानन के मंदिरों का निर्माण
प्रम्बानन मंदिर समूह की नींव 856 ई. में शैलेंद्र शासकों द्वारा रखी गई। मुख्य शिव मंदिर की दाईं ओर ब्रह्मा और बाईं ओर विष्णु के मंदिर हैं। पूरे परिसर को स्थानीय रूप से ‘लारा जोंगरांग’ और समीपवर्ती गांव को ‘प्रम्बानन’ कहा जाता है। कुछ विद्वान ‘प्रम्बानन’ को ‘परम ब्रह्म’ का अपभ्रंश मानते हैं; इसी कारण यह मंदिर समूह ‘चंडी प्रम्बानन’ नाम से भी प्रसिद्ध है। 11वीं शताब्दी में भूकंप, मेरापी ज्वालामुखी की गतिविधियों और राजसत्ता के स्थानांतरण के कारण मंदिर परिसर उजड़ गया तथा इसके अधिकांश भाग राख और मलबे में दब गए। 1733 ई. में डच अधिकारी सी. ए. लोन्स ने पहली बार इन खंडहरों का उल्लेख किया। बाद में 1811-1816 के बीच सर थॉमस स्टैमफोर्ड रैफल्स ने इसका प्रलेखन कराया और 1885 में व्यवस्थित उत्खनन शुरू हुआ। मंदिरों के अवशेष सामने आने पर स्थानीय लोगों ने श्रद्धा व्यक्त की। 1918 से इसके वैज्ञानिक संरक्षण और पुनर्निर्माण का कार्य जारी है। यूनेस्को ने 1991 में इसे विश्व धरोहर स्थल घोषित किया।
‘लारा जोंगरांग’ से जुड़ी प्रसिद्ध लोककथा के अनुसार, योद्धा बांडुंग बोंडोवोसो ने लारा जोंगरांग के पिता को युद्ध में परास्त कर उसकी बेटी से विवाह का प्रस्ताव रखा। विवाह से बचने के लिए राजकुमारी ने एक रात में 1,000 मंदिर बनाने की शर्त रखी। बांडुंग ने 999 मंदिर बना दिए, लेकिन राजकुमारी ने रात समाप्त होने का भ्रम पैदा कर निर्माण रुकवा दिया। क्रोधित बांडुंग के शाप से वह पत्थर की प्रतिमा बन गई। स्थानीय मान्यता है कि प्रम्बानन के दुर्गा मंदिर की प्रतिमा उसी लारा जोंगरांग का रूप है। इसी कथा के कारण यहां कभी 1,000 मंदिर होने की मान्यता है, जबकि अब लगभग 242 मंदिरों के अवशेष बचे हैं। हाल के वर्षों में भारत-इंडोनेशिया सांस्कृतिक सहयोग को गति मिली है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इंडोनेशिया यात्रा के दौरान प्रम्बानन मंदिर के संरक्षण और पुनर्स्थापन में सहयोग की पहल हुई, जिससे इस धरोहर के संरक्षण को बल मिलने की उम्मीद है।

राम कथा पत्थरों की जुबानी
प्रम्बानन मंदिर समूह की प्रमुख विशेषता उसकी दीवारों पर उत्कीर्ण रामायण के विस्तृत शिल्प-दृश्य हैं। मुख्य शिव मंदिर में रामकथा से जुड़े 42 और ब्रह्मा मंदिर में 30 शैल-चित्र अंकित हैं। इनमें विश्वामित्र का दशरथ दरबार में आगमन, ताड़का-मारीच वध, शिवधनुष भंग, परशुराम-राम संवाद, कैकेयी द्वारा भरत के लिए राज्य की मांग, राम-सीता-लक्ष्मण का वनगमन, भरत का चित्रकूट आगमन, दशरथ का अंतिम संस्कार, शूर्पणखा प्रसंग, स्वर्णमृग, सीताहरण, जटायु युद्ध, शबरी से भेंट, हनुमान-सुग्रीव मिलन, बाली-वध, सीता की खोज, अशोक वाटिका में हनुमान का आगमन, लंकादहन, रामसेतु निर्माण और वानर सेना का लंका पहुंचना आदि प्रमुख हैं।
इसके बाद की कथा ब्रह्मा मंदिर में आगे बढ़ती है। यहां विभीषण का राम की शरण में आना, अंगद का रावण-दरबार में दूत बनकर जाना, राम-रावण युद्ध, इंद्रजीत का नागपाश, कुंभकर्ण-वध, रावण की मृत्यु, राम-सीता पुनर्मिलन, अयोध्या वापसी, सीता के संबंध में जन-चर्चांए, सीता का वनगमन, लव-कुश का जन्म, रामकथा-गायन और वाल्मीकि द्वारा राम को पूरी कथा सुनाने जैसे प्रसंग अंकित हैं। अंतिम दृश्य में ब्राह्मणों और ऋषियों की सभा दिखाई गई है।
यद्यपि ये शिल्प मुख्यतः वाल्मीकि रामायण पर आधारित हैं, लेकिन उनमें जावा की स्थानीय परंपराओं और लोकविश्वासों के अनुरूप कई भिन्न प्रसंग भी मिलते हैं। इनमें शूर्पणखा के साथ दासी, रावण का पशु-वाहन पर सीताहरण, सीता द्वारा जटायु को अंगूठी देना, जटायु का तोते के रूप में चित्रण, दो चेहरों और चार आंखों वाला कबंध, हनुमान से मिलने से पहले राम का मगरमच्छ-वध, सुग्रीव का वृक्ष पर बैठना, समुद्र लांघने से पहले नागिन का प्रसंग, मछलियों के मुंह में पत्थर और रावण की सभा में अंगद की कान काटने और अंत में ब्राह्मणों की सभा का दृश्य प्रमुख हैं, जो रामायण में नहीं हैं। ये अंतर प्रमाणित करते हैं कि जावा में रामकथा ने स्थानीय सांस्कृतिक परंपराओं और लोकविश्वासों के अनुरूप विशिष्ट रूप ग्रहण किया।
ये भिन्नताएं बताती हैं कि जावा की रामायण संस्कृत महाकाव्य का मात्र अनुवाद नहीं, बल्कि स्थानीय धार्मिक मान्यताओं, लोककथाओं और कलात्मक कल्पना से विकसित स्वतंत्र सांस्कृतिक रूपांतरण थी। अलग-अलग क्षेत्रों में रामायण के रूप भी स्थानीय परंपराओं के अनुसार बदलते हैं; उदाहरण के लिए, थाई चित्रणों में हनुमान के हाथ में गदा के बजाय त्रिशूल दिखाया जाता है। हालांकि इन रूपांतरों के बावजूद कथा की मूल भावना कायम रहती है। प्रम्बानन के शिल्प रामायण की वहां की व्यापक लोकप्रियता और सांस्कृतिक प्रभाव के प्रमाण हैं।
भारत-इंडोनेशिया के सांस्कृतिक संबंध
प्राचीन समुद्री व्यापार और सांस्कृतिक आदान-प्रदान के माध्यम से भारतीय सभ्यता का प्रभाव इंडोनेशिया तक पहुंचा। आज भी वहां रामायण और महाभारत की छाप नृत्य-नाटिकाओं, वायंग कठपुतली, पारंपरिक कलाओं, धार्मिक प्रतीकों और सामाजिक रीति-रिवाजों में दिखाई देती है। प्रम्बानन मंदिर का ‘त्रिमूर्ति ओपन-एयर थिएटर’ इस परंपरा का प्रमुख केंद्र है, जहां स्थानीय जावानीस शैली में ‘रामायण बैले’ का नियमित मंचन होता है। इसमें संवादों के बजाय संगीत, नृत्य, अभिनय और भाव-भंगिमाओं से रामकथा प्रस्तुत की जाती है।
यह परंपरा सिद्ध करती है कि भारतीय संस्कृति का प्रभाव केवल इतिहास तक सीमित नहीं, बल्कि अनेक देशों की सांस्कृतिक चेतना में आज भी जीवित है। रामायण जैसी साझा विरासत के माध्यम से भारत को सांस्कृतिक, शैक्षिक और जन-से-जन संबंधों को और मजबूत करना चाहिए।
















