भारत का संविधान ऐसी न्यायिक व्यवस्था की कल्पना करता है, जिसमें नागरिकों के अधिकारों और दायित्वों का अंतिम निर्धारण कानून के तहत स्थापित अदालतें करती हैं। किसी व्यक्ति का विवाह कायम है या समाप्त हो चुका है, किसी महिला की वैवाहिक स्थिति क्या है या किसी नागरिक का कानूनी अधिकार क्या है-इन सवालों पर अंतिम और बाध्यकारी फैसला किसी निजी मजहबी संस्था, सामाजिक संगठन या किसी समुदाय विशेष की संस्था नहीं कर सकती। इसके बावजूद दारुल-कजा, इदारा-ए-शरिया और तथाकथित शरिया अदालतें समय-समय पर ऐसे निर्णय देती रही हैं, जिनके कानूनी प्रभाव पर सवाल उठते हैं और फिर न्यायालय को हस्तक्षेप करना पड़ता है। इस विषय पर सर्वोच्च न्यायालय वर्षों पहले अपना रुख स्पष्ट कर चुका है। हाल ही में मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने भी इसी सिद्धांत को दोहराया। इसके बावजूद छत्तीसगढ़ में एक निजी संस्था ने स्वयं को ‘इदिरा-ए-शरिया इस्लामी कोर्ट’ के रूप में प्रस्तुत करते हुए एक महिला की वैवाहिक स्थिति पर ऐसा आदेश जारी किया, जिसके कारण एक बार फिर उच्च न्यायालय को हस्तक्षेप करना पड़ा।
छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय की बिलासपुर पीठ ने निरोश अब्बासी बनाम भारतीय संघ व अन्य मामले में 7 सितंबर, 2026 को फैसला सुनाते हुए रायपुर की ‘इदिरा-ए-शरिया इस्लामी कोर्ट’ की कानूनी हैसियत पर महत्वपूर्ण टिप्पणी की। मामले में इस संस्था ने 18 जनवरी, 2022 को ऐसा दस्तावेज जारी किया था, जिसका संबंध याचिकाकर्ता की वैवाहिक स्थिति से था। मुख्य सवाल यह था कि क्या कोई निजी मजहबी संस्था किसी महिला के विवाह की कानूनी स्थिति तय कर सकती है और क्या उसके द्वारा जारी दस्तावेज को अदालत के फैसले के समान प्रभाव दिया जा सकता है? उच्च न्यायालय ने इसका सीधा उत्तर दिया-नहीं। अदालत ने स्पष्ट किया कि संबंधित संस्था संविधान या किसी कानून के तहत गठित न्यायालय नहीं है। उसके पास किसी व्यक्ति की वैवाहिक स्थिति तय करने का अधिकार क्षेत्र नहीं है। इसलिए उसके द्वारा जारी दस्तावेज किसी व्यक्ति को कानूनी रूप से तलाकशुदा घोषित नहीं कर सकता और न ही उससे किसी व्यक्ति का कोई कानूनी अधिकार या दायित्व पैदा, समाप्त या परिवर्तित हो सकता है।
उच्च न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि ऐसी संस्था द्वारा जारी मत या निर्णय बाध्यकारी नहीं हो सकता और उसे किसी बलपूर्वक प्रक्रिया के माध्यम से लागू नहीं किया जा सकता। किसी संस्था के नाम में ‘कोर्ट’ शब्द लिख देने से वह अदालत नहीं बन जाती। अदालत बनने के लिए कानून से मिला अधिकार आवश्यक है।
न्यायिक शक्ति कानून से आती है
छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय के सामने सबसे महत्वपूर्ण उदाहरण सर्वोच्च न्यायालय का विश्व लोचन मदान बनाम भारतीय संघ का 7 जुलाई, 2014 का फैसला था। यह मामला इसलिए महत्वपूर्ण था, क्योंकि इसमें केवल किसी एक फतवे की बात नहीं थी, बल्कि भारत में दार-उल-कजा और शरिया अदालतों के समानांतर न्याय व्यवस्था के रूप में विकसित होने की आशंका पर व्यापक सवाल उठाया गया था। याचिका में आरोप लगाया गया था कि कुछ मुस्लिम संस्थाएं देशभर में दार-उल-कजा स्थापित कर रही हैं और काजी तथा नायब काजी तैयार किए जा रहे हैं, ताकि मुस्लिम व्यक्तिगत कानून से जुड़े विवादों का निपटारा किया जा सके। इसे समानांतर मुस्लिम न्यायिक व्यवस्था स्थापित करने का प्रयास बताया गया था।
सर्वोच्च न्यायालय के सामने ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के संबंध में यह सामग्री भी आई थी कि वह ऐसे तंत्र की आवश्यकता महसूस करता था, जिसके माध्यम से मुसलमान अपने विवाद काजी के सामने ले जाएं और शरीयत के अनुसार निर्णय प्राप्त करें। सर्वोच्च न्यायालय ने 2014 में एक मूलभूत सिद्धांत स्थापित किया कि किसी विवाद पर बाध्यकारी और लागू करने योग्य निर्णय करने की शक्ति किसी संस्था को तभी प्राप्त हो सकती है, जब वह शक्ति कानून से आती हो। अदालत ने कहा कि दार-उल-कजा न तो किसी सक्षम विधानमंडल द्वारा बनाया गया है और न ही किसी कानून द्वारा उसे न्यायिक अधिकार दिया गया है। इसलिए उसकी राय या फतवा ऐसी संस्था का निर्णय नहीं है, जिसे भारतीय न्यायिक व्यवस्था मान्यता देती है। सर्वोच्च न्यायालय ने यह भी कहा कि काजी या मुफ्ती को अपनी राय किसी व्यक्ति पर थोपने अथवा फतवे को बलपूर्वक लागू करने की शक्ति नहीं है। फिर सवाल उठता है कि जब फैसला 2014 में ही आ चुका था तो 2026 में फिर ऐसी स्थिति क्यों बनी? इसका उत्तर इस तथ्य में है कि न्यायालय द्वारा कानूनी स्थिति स्पष्ट कर दिए जाने के बावजूद जमीनी स्तर पर ऐसी संस्थाओं की गतिविधियों को लेकर विवाद समय-समय पर सामने आते रहे हैं।
2016 में महाराष्ट्र में भी एक जनहित याचिका के माध्यम से दार-उल-कजा को लेकर यह आरोप लगाया गया कि वे समानांतर इस्लामी अदालतों के रूप में काम कर रहे हैं। उस मामले में ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड द्वारा स्थापित दारुल-कजा की कानूनी स्थिति और उनके अधिकारों को चुनौती दी गई थी। इससे स्पष्ट है कि विवाद केवल एक राज्य या एक संस्था तक सीमित नहीं रहा है।
कानून द्वारा स्थापित न्यायालय ही मान्य
छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने अपने फैसले में सीधे विश्व लोचन मदान मामले को आधार बनाया। अदालत के सामने मूल सवाल यही था कि जब कोई संस्था संविधान या किसी कानून के तहत स्थापित न्यायालय ही नहीं है, तो उसे किसी व्यक्ति की वैवाहिक स्थिति तय करने का अधिकार कहां से मिल सकता है? महत्वपूर्ण यह है कि उच्च न्यायालय ने यह नहीं कहा कि किसी व्यक्ति को मजहबी सलाह लेने का अधिकार नहीं है। उसने केवल यह सीमा स्पष्ट की कि किसी मजहबी संस्था की राय को कानूनी न्यायिक निर्णय नहीं बनाया जा सकता। छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय के फैसले से कुछ ही समय पहले मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की जबलपुर पीठ ने भी इसी सवाल पर महत्वपूर्ण आदेश दिया था। डॉ. शाजिया नवाज खान बनाम सैयद सामी अली मामले में पति ने परिवार न्यायालय में तलाक की घोषणा की मांग करते हुए दारुल-इफ्ता मसाजिद कमेटी, भोपाल के फतवे का सहारा लिया था।
मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने फतवे को पढ़ने के बाद स्पष्ट किया कि उसमें स्वयं किसी विवाह को कानूनी रूप से समाप्त करने का आदेश नहीं था। अदालत ने साफ कहा कि कोई मजहबी शिक्षण संस्था यानी सेमिनरी किसी मुस्लिम पुरुष को तलाक नहीं दे सकती। यदि किसी व्यक्ति को विवाह-विच्छेद की कानूनी राहत चाहिए तो उसे परिवार न्यायालय में कानून के अनुसार कार्यवाही करनी होगी।
शायरा बानो का फैसला
22 अगस्त, 2017 को सर्वोच्च न्यायालय की पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने 3:2 के बहुमत से तीन तलाक यानी तलाक-ए-बिद्दत को असंवैधानिक ठहराया। बहुमत में न्यायमूर्ति रोहिंटन नरीमन और न्यायमूर्ति यू.यू. ललित ने इसे स्पष्ट रूप से मनमाना मानते हुए अनुच्छेद 14 के विरुद्ध माना। सर्वोच्च न्यायालय ने स्वीकार किया कि ऐसी व्यवस्था, जिसमें पति तत्काल और मनमाने तरीके से वैवाहिक संबंध समाप्त कर सकता है, संवैधानिक समानता की कसौटी पर टिक नहीं सकती। यह फैसला इस व्यापक सिद्धांत को मजबूत करता है कि मजहबी व्यक्तिगत कानून के नाम पर किसी ऐसी प्रथा को स्वतः कानूनी संरक्षण नहीं मिल जाता, जो संविधान की कसौटी पर अस्वीकार्य हो। अर्थात भारतीय संवैधानिक व्यवस्था में अंतिम शब्द कानून और संविधान का है।
समानांतर न्यायपालिका की मांग
मुस्लिम संस्थाओं द्वारा दार-उल-कजा के विस्तार की बात पहले भी की जाती रही है। विश्व लोचन मदान मामले की कार्यवाही में यह तथ्य दर्ज है कि ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने देशभर में काजियों के माध्यम से विवादों के निपटारे के लिए एक तंत्र की आवश्यकता की बात कही थी। 2014 के फैसले के समय मुस्लिम संगठनों की ओर से यह तर्क भी सामने आया था कि दार-उल-कजा को वे औपचारिक राज्य न्यायपालिका का विकल्प नहीं, बल्कि मध्यस्थता अथवा अनौपचारिक विवाद समाधान मंच मानते हैं। यदि कोई संस्था केवल स्वैच्छिक मध्यस्थता या पंचाट करती है और उसका निर्णय कोई व्यक्ति अपनी इच्छा से स्वीकार करता है, तो वह अलग कानूनी स्थिति है। लेकिन यदि वही संस्था स्वयं को ‘कोर्ट’ कहे, किसी व्यक्ति की वैवाहिक स्थिति तय करे और अपने निर्णय को बाध्यकारी बताने लगे, तो स्थिति सर्वोच्च न्यायालय द्वारा निर्धारित सीमा से बाहर चली जाती है।
इसलिए महत्वपूर्ण है फैसला
छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय का 7 सितंबर का फैसला केवल एक महिला के वैवाहिक विवाद का फैसला नहीं है। यह उस बुनियादी सवाल पर न्यायिक प्रतिक्रिया है कि क्या कोई निजी संस्था अपने नाम में ‘इस्लामी कोर्ट’ जोड़कर न्यायालय बन सकती है? भारत में किसी भी मत-पंथ के व्यक्ति को अपनी पांथिक मान्यताओं के अनुसार जीवन जीने की स्वतंत्रता है। मजहबी सलाह लेने की स्वतंत्रता भी है। लेकिन इस स्वतंत्रता का अर्थ यह नहीं है कि कोई निजी संस्था भारत की संवैधानिक न्यायपालिका के समानांतर अपनी अदालत स्थापित कर सकती है। पंथ अपनी जगह है, आस्था अपनी जगह है और मजहबी सलाह अपनी जगह; लेकिन न्यायिक सत्ता केवल संविधान और कानून से आती है। भारत में मजहबी मंच हो सकते हैं, मध्यस्थता हो सकती है, सलाह हो सकती है, लेकिन संविधान के समानांतर कोई अदालत नहीं चल सकती।















