यह श्लोक संस्कृत साहित्य के सुभाषित (नैतिक शिक्षाओं और व्यावहारिक ज्ञान से भरे वचन) परंपरा से है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के स्वयंसेवक के आदर्श गुणों और आचरण की परिभाषा के रूप में अत्यंत प्रसिद्ध है।
श्लोक :
सदा प्रवासी नीरोगी भद्रवेशः शुचिस्मितः।
हितकारी मिताहारी भवेत् संघपरायणः॥
भावार्थ :
संघ कार्य में परायण व्यक्ति सदा प्रवास में लगा रहे, निरोग रहे, उत्तम वेश में रहे, शुद्ध पवित्र और हंसमुख रहे। वह दूसरों के लिए हित करने वाला, स्वयं कम आहार लेने वाला होवे।
आज के समय में प्रासंगिकता :
स्वास्थ्य और जीवनशैली: ‘नीरोगी’ और ‘मिताहारी’ का संदेश आज की तनावपूर्ण और असंतुलित जीवनशैली में शारीरिक व मानसिक स्वास्थ्य का मूल मंत्र है।
व्यक्तित्व विकास: ‘भद्रवेशः’ और ‘शुचिस्मितः’ सिखाते हैं कि व्यक्ति का पहनावा शालीन हो और उसका व्यवहार सकारात्मक व सौम्य हो।
सामाजिक उत्तरदायित्व: ‘सदा प्रवासी’ और ‘हितकारी’ व्यक्ति को अपने स्वार्थ से बाहर निकलकर समाज सेवा और सक्रिय योगदान देने की प्रेरणा देते हैं।
समर्पण व एकता: ‘संघपरायणः’ टीमवर्क, अनुशासन और संगठन के साथ मिलकर बड़े लक्ष्यों को हासिल करने का महत्व समझाता है।

















