क्या भारत, चीन और रूस वैश्विक व्यवस्था को नया रूप दे सकते हैं? ब्रिक्स से कितना बदलेगा शक्ति संतुलन
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क्या भारत, चीन और रूस वैश्विक व्यवस्था को नया रूप दे सकते हैं? ब्रिक्स से कितना बदलेगा शक्ति संतुलन

तीन प्रमुख देशों के नेताओं का एक फ्रेम में दिखना प्रतीकात्मक तो है, किंतु उसका अर्थ इस पर निर्भर करता है कि यह समूह व्यवहार में क्या दे सकता है।

Written byआशीष कुमार 'अंशु'आशीष कुमार 'अंशु'
Sep 13, 2026, 03:34 pm IST
inमत अभिमत
ब्रिक्स शिखर सम्मेलन 2026 में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग।

ब्रिक्स शिखर सम्मेलन 2026 में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, राष्ट्रपति शी जिनपिंग और राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन जब नई दिल्ली में एक मंच पर आते हैं, तो वह तस्वीर पश्चिमी देशों की राजधानियों में भी ध्यान खींचती है। तियानजिन में शंघाई सहयोग संगठन के शिखर सम्मेलन के लगभग एक वर्ष बाद तीनों नेता फिर ब्रिक्स के मंच पर जुड़े हैं। शी जिनपिंग सात वर्षों बाद भारत आए हैं। पुतिन यूक्रेन युद्ध के बाद रूस के बाहर एक बड़े बहुपक्षीय शिखर में फिर उपस्थित हैं।

तीन प्रमुख देशों के नेताओं का एक फ्रेम में दिखना प्रतीकात्मक तो है, किंतु उसका अर्थ इस पर निर्भर करता है कि यह समूह व्यवहार में क्या दे सकता है। भारत, चीन और रूस विश्व की बड़ी आबादी, विनिर्माण क्षमता, ऊर्जा व्यापार और कूटनीतिक पहुंच का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। उनका समन्वय अधूरा होने पर भी यही संकेत देता है कि शक्ति अब केवल एक पश्चिमी केंद्र में नहीं सिमटी। इतना कहना पर्याप्त है। इससे यह निष्कर्ष नहीं निकलता कि तीनों देश पहले से एक सुसंगत ध्रुव बन चुके हैं। उनके संबंध व्यावहारिक हैं, असमान हैं और अनसुलझे विवादों से बंधे हैं। हाथ मिलाना वास्तविक है। सावधानी भी उतनी ही वास्तविक है।

बड़ा ब्रिक्स, कठिन समन्वय

ब्रिक्स अब उस चार-अक्षरीय संक्षिप्त नाम से बहुत आगे निकल चुका है, जिसे 2001 में गोल्डमैन सैक्स के अर्थशास्त्री जिम ओ’नील ने गढ़ा था। ब्राजील, रूस, भारत और चीन 2009 में राजनीतिक समूह बने। दक्षिण अफ्रीका 2011 में जुड़ा। मिस्र, इथियोपिया, ईरान और संयुक्त अरब अमीरात 2024 में आए। इंडोनेशिया 2025 में शामिल हुआ। सऊदी अरब का दर्जा अभी भी आंशिक रूप से अस्पष्ट है; रियाद बैठकों में भाग लेता है, किंतु औपचारिक स्वीकृति बार-बार टाली गई है।

आंकड़े प्रभावशाली हैं। विस्तारित समूह विश्व की लगभग आधी आबादी, वैश्विक जीडीपी का करीब 2/5 या 40% हिस्सा और अंतरराष्ट्रीय व्यापार का लगभग एक-चौथाई हिस्सा रखता है। सदस्यता अब एशियाई विनिर्माण शक्तियों से लेकर खाड़ी के ऊर्जा निर्यातकों, अफ्रीकी अर्थव्यवस्थाओं और ईरान तक फैली है। यही विस्तार उसकी सीमा भी है। ब्रिक्स के पास कोई संधि नहीं, कोई स्थायी सचिवालय नहीं और कोई साझा बजट नहीं। निर्णय सर्वसम्मति से होते हैं। मई 2026 में नई दिल्ली में विदेश मंत्रियों की बैठक संयुक्त बयान तक नहीं पहुंच सकी। ईरान और संयुक्त अरब अमीरात के बीच क्षेत्रीय टकराव पर मतभेद बाधा बने। वैश्विक दक्षिण की आवाज बनने का दावा करने वाले मंच के दो सदस्य एक जीवित संघर्ष के विपरीत पक्षों पर खड़े थे। विस्तार ने पहुंच बढ़ाई है, कार्य क्षमता उतनी नहीं। नए विश्व शक्ति के किसी भी दावे के लिए यह अंतर निर्णायक है। तीन सबसे बड़े सदस्य मंच को राजनीतिक वजन दे सकते हैं।

तीन शक्तियां, तीन मकसद

रूस के पास ब्रिक्स को पश्चिमी आर्थिक ढांचों का व्यावहारिक विकल्प बनाने का सबसे स्पष्ट कारण है। प्रतिबंधों ने मास्को को गैर-पश्चिमी बाजारों, भुगतान व्यवस्थाओं और कूटनीतिक साझेदारों पर अधिक निर्भर बना दिया है। भारत रूसी तेल का बड़ा खरीदार बना हुआ है और रक्षा तथा ऊर्जा संबंध बनाए रखे हुए है। 11 सितंबर को नई दिल्ली में मुलाकात के बाद मोदी और पुतिन ने आर्थिक, रक्षा और ऊर्जा सहयोग बढ़ाने पर सहमति जताई तथा द्विपक्षीय व्यापार को लगभग 70 अरब डॉलर से 2030 तक 100 अरब डॉलर तक पहुंचाने का लक्ष्य दोहराया। पुतिन का आग्रह है कि ब्रिक्स को प्रौद्योगिकी, बुनियादी ढांचे, निवेश और भुगतान में सहयोग के साथ अधिक व्यावहारिक बनना चाहिए। यह केवल वार्षिक घोषणापत्र से अलग प्रस्ताव है।

चीन का उद्देश्य व्यापक है। बीजिंग उन संस्थाओं में अधिक प्रभाव चाहता है जहां अभी भी पश्चिमी शक्तियां अनेक नियम तय करती हैं। वह डॉलर आधारित वित्त तथा पश्चिमी नियंत्रित प्रौद्योगिकी और बाजारों पर निर्भरता से पैदा हुई कमजोरी घटाना चाहता है। तियानजिन शिखर पर शी का संदेश स्पष्ट था: अधिक प्रतिनिधिक वैश्विक व्यवस्था और जिसे वे वर्चस्ववाद तथा शक्ति राजनीति कहते हैं, उसका विरोध। ब्रिक्स उसी भाषा में फिट बैठता है।

भारत का हिसाब अलग है। नई दिल्ली नहीं चाहेगा कि ब्रिक्स चीन-रूस के नेतृत्व वाला अमेरिका-विरोधी गुट बन जाए। वह क्वाड, जी-20, यूरोप से संबंधों और अमेरिका के साथ साझेदारी के साथ-साथ ब्रिक्स को रणनीतिक स्वायत्तता का एक और उपकरण बनाना चाहता है। राष्ट्रीय मुद्राओं और आपस में जुड़ सकने वाली भुगतान प्रणालियों पर भारत का जोर इसी अंतर को दिखाता है। बिना डॉलर का अंत घोषित किए, वह विकल्प बढ़ाना चाहता है।

ये मकसद बिना एक हुए भी ओवरलैप कर सकते हैं। रूस को अलगाव के बाद भागीदार चाहिए। चीन गैर-पश्चिमी गुरुत्वाकर्षण केंद्र चाहता है। भारत अपने लिए जगह चाहता है। यह ओवरलैप भुगतान, विकास, वित्त और कूटनीतिक संदेश पर समन्वय पैदा कर सकता है। प्रतिस्पर्धी हितों को मिटा नहीं सकता।

चीन-भारत संबंध असली परीक्षा है। 2020 की गलवान झड़प ने राजनीतिक संबंध का बड़ा हिस्सा ठंडा कर दिया। विवादित सीमा पर सेनाएं तैनात रहीं। भारत ने चीनी निवेश और ऐप्स पर रोक लगाई। अक्टूबर 2024 के विघटन समझौते के बाद प्रमुख तनाव बिंदुओं से वापसी हुई और कूटनीतिक तथा व्यापारिक रास्ते धीरे-धीरे खुले। शी की यात्रा दोनों पक्षों को इस नरमी को मजबूत करने का अवसर देती है। भारत ने सीधी उड़ानें फिर शुरू की हैं, कुछ वीजा पाबंदियां ढीली की हैं और पहले के निवेश नियंत्रण के कुछ हिस्से शिथिल किए हैं। चीनी कंपनियां फिर संभावनाएं तौल रही हैं, हालांकि बड़ी कंपनियां सुरक्षा जांच से अभी भी सतर्क हैं।

अर्थशास्त्र इस संबंध को नजरअंदाज करना असंभव बनाता है। 2024-25 में भारत में चीनी आयात 113.5 अरब डॉलर तक पहुंचा। चीन के साथ भारत का व्यापार घाटा रिकॉर्ड 99.2 अरब डॉलर पर पहुंच गया। इलेक्ट्रॉनिक्स, बैटरी और सौर उपकरण अभी भी चीनी आपूर्ति श्रृंखलाओं पर भारी निर्भर हैं। नरमी का व्यावहारिक मूल्य है। यह सुलह नहीं है। सीमा पर सैन्य तैनाती बड़ी बनी हुई है। क्षेत्रीय विवाद कायम हैं। चीनी रणनीतिक व्यवहार को लेकर भारतीय चिंताएं गायब नहीं हुईं है। घाटा स्वयं भारत को अधिक चीनी पूंजीगत सामान लेने का कारण देता है और साथ ही अत्यधिक निर्भरता की चिंता भी पैदा करता है।

वित्त, अमेरिका और मित्रता में सावधानी

व्यवस्था बदलने का सबसे मजबूत दावा वित्त में है, और यहीं अपेक्षाएं अक्सर वास्तविकता से आगे निकल जाती हैं। ब्रिक्स की कोई साझा मुद्रा नहीं है और निकट भविष्य में डॉलर की जगह लेने की गंभीर संभावना भी नहीं। काम अधिक साधारण है: अधिक व्यापार राष्ट्रीय मुद्राओं में निपटाना, भुगतान प्रणालियों को जोड़ना और केंद्रीय बैंक की डिजिटल मुद्राओं के बीच अंतरसंचालन सुधारना। भारत ने सीमापार भुगतान के लिए ब्रिक्स डिजिटल मुद्राओं को जोड़ने का प्रस्ताव आगे बढ़ाया है। उद्देश्य तेज और सस्ता निपटान है, नई आरक्षित मुद्रा नहीं। तकनीकी बाधाएं बनी हुई हैं-असंगत प्रणालियां, व्यापार असंतुलन और चीन पर गहरी वित्तीय निर्भरता पैदा करने को लेकर भारत की अनिच्छा।

न्यू डेवलपमेंट बैंक सबसे स्पष्ट मौजूदा संस्था है। 2015 में स्थापित इस बैंक ने बुनियादी ढांचे, जल, परिवहन और स्वच्छ ऊर्जा की 139 परियोजनाओं के लिए लगभग 42.9 अरब डॉलर स्वीकृत किए हैं। 2025 के अंत तक अकेले भारत की 32 स्वीकृत परियोजनाएं 9.53 अरब डॉलर की थीं। यह वास्तविक उत्पादन है, भले विश्व बैंक और अन्य पश्चिमी समर्थित वित्तीय संस्थानों की ऋण क्षमता के सामने छोटा हो। अगला कदम स्थानीय मुद्रा में ऋण बढ़ाना, भुगतान कड़ियां सुधारना और निजी पूंजी जुटाने की गुंजाइश देना है। वित्त मंत्रियों और केंद्रीय बैंक गवर्नरों ने आईएमएफ तथा विश्व बैंक सुधार, राष्ट्रीय मुद्राओं का अधिक उपयोग और तेज सीमापार भुगतान का समर्थन किया है।

अमेरिकी दबाव ने तीन सबसे बड़ी राजनीतिक शक्तियों को करीब धकेला है। यह बाकी ब्रिक्स को साझा विदेश नीति नहीं देता। भारत पर रूसी तेल को लेकर अमेरिकी दबाव रहा है। चीन अमेरिका का प्रमुख रणनीतिक प्रतिद्वंद्वी है। रूस व्यापक पश्चिमी प्रतिबंधों के अधीन है। अन्य सदस्यों का वाशिंगटन से टकराने में कोई साझा हित नहीं। सऊदी अरब अमेरिका और चीन के बीच संतुलन बनाए रखता है। संयुक्त अरब अमीरात की अपनी सुरक्षा और आर्थिक गणना है। ब्राजील परंपरागत रूप से ब्रिक्स को स्पष्ट रूप से पश्चिम-विरोधी संगठन बनाने का विरोध करता रहा है। भारत की ब्रिक्स कूटनीति भी व्यवस्था सुधार और अपनी गुंजाइश बढ़ाने की है, चीन और रूस के साथ वैकल्पिक गुट बनाने की नहीं।

यही वह सावधानी है जो इस मित्रता के साथ रखनी चाहिए। तीनों नेता एक साथ खड़े हो सकते हैं क्योंकि तस्वीर और चुनिंदा सहयोग से प्रत्येक को कुछ मिलता है। तस्वीर को कठोर सीमाओं का विकल्प नहीं मानना चाहिए। भारत सीमा, व्यापार घाटे या चीन-केंद्रित आर्थिक व्यवस्था में छोटा साझेदार बनने के जोखिम को नजरअंदाज नहीं कर सकता। युद्धकालीन अलगाव रूस को ऐसा भागीदार बनाता है जिसकी प्राथमिकताएं नई दिल्ली से हमेशा नहीं मिलेंगी। चीन संस्थाओं और बाजारों में प्रभाव चाहेगा, भारत सहज हो या न हो। सीमाओं, युद्धों और गठबंधनों पर मतभेद रखने वाले ग्यारह सदस्यों के बीच सर्वसम्मति नाजुक रहेगी, जैसा मई के विफल संयुक्त बयान ने पहले ही दिखा दिया।

हाथ मिलाना पहले से चल रहे बदलाव को तेज कर सकता है: अधिक देश पश्चिमी वित्तीय और राजनीतिक ढांचों के विकल्प चाहते हैं, बिना उन्हें पूरी तरह छोड़ने के। ब्रिक्स उन्हें बचाव का मंच देता है।

बड़ी आबादी और आर्थिक वजन मंच को विश्वसनीयता देते हैं। एनडीबी (The New Development Bank) और ब्रिक्स का बढ़ता नेटवर्क इसे संस्थागत आधार देते हैं। यह सही है कि परीक्षा कम फोटोजेनिक जगहों पर होगी: भारत-चीन सीमा पर नरमी टिकती है या नहीं, भुगतान ढांचा काम करता है या नहीं, एनडीबी विस्तार कर सकता है या नहीं, और ग्यारह देश घोषणाओं को संस्थाओं में बदलने लायक साझा जमीन बना सकते हैं या नहीं। यह देखना आने वाले समय में महत्वपूर्ण होगा। ऐसे में सामने आई मोदी-पुतिन-शी की एक और तस्वीर प्रतीक होगी, बदल रहे वैश्विक समीकरणों में भारत की भू​मिका की।

 

Topics: Global SouthModi Xi PutinGlobal Power DynamicsIndia China Russiaपीएम मोदीचीन के राष्ट्रपतिशी जिनपिंगपुतिनbricsब्रिक्स शिखर सम्मेलनरूस के राष्ट्रपति
आशीष कुमार 'अंशु'
आशीष कुमार 'अंशु'
आशीष कुमार अंशु पत्रकार, लेखक व सामाजिक कार्यकर्ता हैं। आम आदमी के सामाजिक सरोकार से जुड़े मुद्दों तथा भारत के दूरदराज में बसे नागरिकों की समस्याओं पर अंशु ने लम्बे समय तक लेखन व पत्रकारिता की है। अंशु मीडिया स्कैन ट्रस्ट के संस्थापक सदस्यों में से एक हैं और दस वर्षों तक मानवीय विकास से जुड़े विषयों की पत्रिका सोपान STEP से जुड़े रहे हैं। [Read more]
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