प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 27 सितंबर 2026 को मन की बात में गुजरात के मोढेरा सूर्य मंदिर की चर्चा करते हुए 1000 वर्ष पुराने इतिहास को आज के सूर्य ग्राम से जोड़ा। उन्होंने 1026 के आसपास इस्लामी आक्रमण से मोढेरा मंदिर को पहुंची क्षति को याद किया और बताया कि बाद में राजा भीमदेव प्रथम ने इसका पुनर्निर्माण कराया और आज मोढेरा सौर ऊर्जा के क्षेत्र में देश के प्रमुख उदाहरण के रूप में सामने आ रहा है।
मोढेरा सूर्य मंदिर भारतीय स्थापत्य, उपासना, वास्तु कला और आधुनिक नवीकरणीय ऊर्जा इन परंपराओं के साथ जोड़ने वाला विशिष्ट उदाहरण बन गया है। यह हजारों वर्षों की मंदिर स्थापत्य की विशेषता के साथ-साथ आधुनिक भारत में विरासत और हरित ऊर्जा के संगम का प्रतीक है। मोढेरा को 9 अक्टूबर 2022 को भारत के पहले 24/7 सौर ऊर्जा संचालित गांव में घोषित किया गया था।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
मोढेरा का सूर्य मंदिर 11वीं शताब्दी के पश्चिमी भारत में सोलंकी या चालुक्य सत्ता के समय भीमदेव के शासन काल में निर्मित हुआ था। यह सोलंकी या मारु-गुर्जर स्थापत्य शैली में निर्मित है। मोढेरा का निर्माण ऐसे समय हुआ जब भारत इस्लामी आक्रमणों और राजनीतिक संघर्षों से गुजर रहा था। अलाउद्दीन खिलजी ने भी इस मंदिर को क्षति पहुंचाई। पुरातत्वविद् जेम्स बर्गेस और हेनरी कजिन्स के 19वीं–20वीं शताब्दी के प्रारंभिक सर्वेक्षण से जुड़े विवरण में मंदिर की का वर्णन करते हुए बताया गया कि मुस्लिम आक्रमणकारियों ने मूर्ति क्षतिग्रस्त करने के अलावा गर्भ गृह में बारूद रखकर विस्फोट किया, जिससे ऊपरी भागों एवं शिखर को भारी क्षति पहुंची। शायद मोढेरा की त्रासदी यहीं सबसे अधिक दिखाई देती है, मूर्तियों को चोट लगी, गर्भगृह की मूल सूर्य-प्रतिमा नष्ट हो गई, शिखर ध्वस्त हो गया। फिर भी स्थापत्य के कई अंश बच गए। मोढेरा के सूर्य मंदिर की कहानी एक बार टूटने-बनने की कहानी नहीं है, यह निर्माण, धार्मिक जीवन, आक्रमण,क्षति और धीरे-धीरे संस्थागत जीवन के समाप्त होने की प्रक्रिया है।
मोढेरा का स्थापत्य
मोढेरा के पूरे परिसर को मुख्यतः तीन महत्वपूर्ण भागों में समझ सकता है, सूर्यकुंड, सभा मंडप और मुख्य मंदिर। सूर्य कुंड जल की ज्यामिति है जो लगभग 175 फीट उत्तर दक्षिण और 120 फीट पूर्व पश्चिम में फैला सीढ़ीदार कुंड है। इसके चारों ओर 108 छोटे-छोटे मंदिर है। ऊपर देखने पर सीढ़ियों की पुनरावृति, कोणों की व्यवस्था और छोटे मंदिरो का क्रम एक अद्भुत लय पैदा करता है।
सूर्यकुंड और मंदिर के बीच सीढ़ियों, तोरण और सभामंडप का संबंध पूरे परिसर को एक अखंड रचना में बदल देता है। सभा मंडप खुली सरंचना है, जिसे रंग मंडप भी कहते हैं यहां चारों ओर से प्रकाश प्राप्त होता है , यहां बने स्तंभ स्वयं मूर्ति कला के स्तंभ बन जाते हैं, जिन पर देव प्रतिमाएं, नर्तक , संगीतकार ,पौराणिक दृश्य, पुष्पीय अलंकरण और विविध आकृतियां उकेरी गई हैं। छत और मेहराबों की सज्जा भी इसी कलात्मक निरंतरता को आगे बढ़ाती है।
तोरण, सूर्यकुंड और सभा मंडप के बीच स्थित जिसमें सजावटी स्तंभ, अलंकृत शीर्ष नक्काशीदार संरचनाएं धीरे-धीरे मंदिर के मुख्य स्थापत्य की ओर लेकर जाती है। सभामंडप के आगे मुख्य मंदिर स्थित है, जिसमें गर्भगृह और गुड्ढमंडप प्रमुख भाग हैं। मुख्य मंदिर की बाहरी दीवारों पर समृद्ध मूर्तिकला देखने को मिलती है। आज मुख्य मंदिर का मूल शिखर मौजूद नहीं है फिर भी मंदिर की संरचना गर्भ गृह योजना से उसके मूल स्थापत्य का अनुमान लगाया जा सकता है।
12 आदित्य, 52 स्तंभ
मोढेरा के मुख्य मंदिर के बाहर की दीवार पर 12 आदित्य, लोकपाल, देवियां सूर्य की विभिन्न अभिव्यक्तियां, देवी-देवता, नर्तक, संगीतकार और अनेक अलंकरण आकृतियां दिखाई देती है। सूर्य की प्रतिमाओं में उन्हें कमल धारण किए हुए तथा सात घोड़ों से जुड़े रूप में प्रदर्शित किया गया है। मूर्ति कला में 12 आदित्य की उपस्थिति, वर्ष के 12 माह को प्रदर्शित करती है। 52 स्तंभ, वर्ष के 52 सप्ताह से जुड़े हुए महसूस होते हैं। मंदिर की सबसे कुछ विशेषताओं में से एक है मंदिर का पूर्व दिशा की अभिमुख होने के कारण सूर्य का प्रकाश, बाहरी दीवारों पर उभरी हुई मूर्तिया प्रकाश और छाया के बदलते कोणों के साथ अलग-अलग दिखाई देती है। ऐसा माना जाता था कि सूर्य की पहली किरण सूर्य देव की मूर्ति के मस्तक पर जड़े हीरो पर पड़ती थी उसे पूरा गर्भ ग्रह प्रकाशित हो जाता था हालांकि आज मूल प्रतिमा विद्यमान नहीं है।
मोढेरा क्यों है अद्वितीय
सूर्य केवल आराध्य नहीं, स्थापत्य की योजना का हिस्सा है, क्योंकि विषुव के समय ऐसा नियोजन किया गया कि सूर्य की किरण सभा मंडप से होती हुई ,गर्भ ग्रह तक पहुंचती है। मंदिर के सामने सूर्यकुंड जो स्वयं एक स्थापत्य सरंचना है, जो इस परिसर को असाधारण बनाती है। यहां जल और सूर्य एक ही स्थापत्य कथा के दो छोर हैं, जो मंदिर की सुंदरता को बढ़ाते हैं। सामने जल, उसके पीछे सभामंडप और फिर सूर्य का गर्भगृह यह स्थान विन्यास को सुंदर बनाते हैं। परिसर में कुंड , तोरण, सभामंडप और मुख्य मंदिर का एक क्रम बनता है। मंदिर की दीवारों पर 34 बड़े पैनल है, जिसमे 12 आदित्य, 12 गौरिया और 10 अन्य देवताओं के समूह शामिल है। सूर्य की बदलती रोशनी से मूर्तियों पर लगातार प्रकाश छाया का प्रभाव प्रदर्शित होता है। सबसे महत्वपूर्ण इन सभी तत्वों का एक ही परिसर में असाधारण संयोजन है, जो सूर्य के साथ संवाद करता है।
क्या आज है मंदिर में पूजा की परम्परा
प्रश्न यह है कि जिस गर्भ गृह में कभी सूर्य देव की प्रतिमा थी, वह आज वहां पूजा क्यों नहीं होती है? आज न वहां पूजा होती है, न मूल सूर्य विग्रह सुरक्षित है। किसी मंदिर का ऐतिहासिक -सांस्कृतिक महत्त्व बना रहना और उसका जीवित पूजा स्थल बनाना एक बात नहीं है। आज व्यक्ति मोढेरा के सामने खड़े होकर उसकी भव्यता से प्रभावित हो सकता है, उसके शिल्प के सामने श्रद्धा का अनुभव कर सकता है, सूर्य देव को मन ही मन नमन कर सकता है, लेकिन जीवित परंपरा का स्थान नहीं ले सकता। जिसमें प्रतिदिन देवता को जगाया जाता था, स्नान कराया जाता था. वस्त्र अलंकार अर्पित किए जाते थे, दीप प्रज्ज्वलित होता था, नैवेद्य लगता था, आरती होती थी और भक्त दर्शन के लिए आते थे। आज भले ही संगीत नृत्य की प्रस्तुतियां हो रही है, मेले लग रहे हैं, उत्सव मनाया जा रहा है लेकिन इसे नियमित और उपासना का पर्याय नहीं माना जा सकता। संगीत मंदिर की संस्कृति हो सकता लेकिन आरती नहीं, नृत्य मंदिर की कला परंपरा हो सकते लेकिन दर्शन नहीं, पर्यटक का सम्मान और विश्व में अपनी जगह हो सकती है लेकिन भक्ति का समर्पण का पर्याय नहीं।
मोढेरा और सौर ग्राम
9 अक्टूबर 2022 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मोढेरा को भारत का पहला 24X 7 सौर ऊर्जा संचालित गांव घोषित किया। इस परियोजना में एक ग्राउंड माउंटेड सौर ऊर्जा संयंत्र, आवास एवं सरकारी भवनों पर 1300 रूफ टॉप सोलर सिस्टम तथा बैटरी एनर्जी स्टोरेज सिस्टम को एकीकृत किया गया। दिन में उत्पन्न सौर ऊर्जा का उपयोग, इसका भंडारण करके आवश्यकता के समय ऊर्जा प्राप्त करने वाली व्यवस्था, ग्रामीण क्षेत्र में नवीकरणीय ऊर्जा और ऊर्जा आत्मनिर्भरता की दिशा में महत्वपूर्ण प्रयोग है। इसी परियोजना के अंतर्गत सूर्य मंदिर की हेरिटेज लाइटिंग 3D प्रोजेक्शन मैपिंग को भी सौर ऊर्जा से जोड़ा गया है। इस प्रकार इस मंदिर में 1000 वर्ष पहले सूर्य को जीवन ऊर्जा के स्रोत के रूप में पूजा जाता था , आज सूर्य की ऊर्जा को तकनीक के माध्यम से गांव की ऊर्जा आवश्यकता को पूरा किया जा रहा है।
मोढेरा एक ऐसा प्राचीन मंदिर है जिसने धर्म को प्रकृति से,कला को विज्ञान से और उपयोगिता को सौंदर्य से जोड़कर एक ऐसा परिसर रचा है जिसमे पत्थर भी प्रकाश के साथ संवाद करते हैं। हालांकि शिखर नष्ट हो गया, मूल विग्रह नहीं रहा, पूजा की जीवित परंपरा भी अब सक्रिय नहीं है,फिर भी मोढेरा का स्थापत्य आज भी उस मूल कल्पना की गवाही देता है। शायद यही मोटेरा की सबसे बड़ी विरासत है।
क्या सूर्य आराधना की जीवंत अनुभूति को मिलेगा स्थान
शायद इसी कारण मोढेरा से आज भी सबसे बड़ा प्रश्न यही निकलता है क्या हम केवल सूर्य मंदिर को बचाएंगे, या सूर्य-आराधना की उस जीवंत अनुभूति को भी फिर से स्थान देंगे, जिसके लिए यह अद्भुत स्थापत्य कभी रचा गया था? आज प्राचीन सूर्य देवालय में किसी सुविचारित, शास्त्रोक्त और संरक्षण-सम्मत व्यवस्था के माध्यम से फिर से सूर्य-आराधना का जीवंत अनुभव संभव हो सकता है। यह विचार गंभीर विमर्श का विषय आवश्यक हो सकता है क्योंकि एक प्रामाणिक सूर्य विग्रह की पुनर्प्रतिष्ठा , नियमित दीप , प्रार्थना ,उपासना के अनुष्ठान और सीमित मर्यादा दर्शन व्यवस्था के माध्यम से उसे स्थान में फिर से भक्त और देवता का संबंध स्थापित हो सकता है , तब सूर्य कुंड केवल प्राचीन जल वस्तु नहीं रहेगा, सभा मंडल केवल स्थापत्य का उदाहरण नहीं रहेगा और गर्भ गृह केवल ऐतिहासिक रिक्त स्थान नहीं रहेगा। वहां फिर दीप जलेगा , मंत्र उच्चारण होगा और सूर्य के सम्मुख मनुष्य अपने भीतर के अंधकार से प्रकाश की ओर जाने का अनुभव करेंगे।

















