अंग्रेजी कैलेंडर का सितंबर सिमट रहा है। घर-व्यापार के पंचांग में अश्विन मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा का पन्ना फड़फड़ाने लगा है।
भारत में त्योहार केवल पूजा-पाठ का समय नहीं होता, यह बाजार और रोजगार के लिए भी कमाई का बड़ा मौका होता है। कपड़े, मिठाई, पूजा सामग्री, बर्तन, सजावट, मोबाइल और रोजमर्रा के सामान की मांग अचानक बढ़ जाती है।
भारतीय अर्थव्यवस्था की बढ़नी गति और आकार का राजनीतिक आकलन करने वाले भूल जाते हैं कि अन्य कारकों से अलग त्योहार और आध्यात्मिकता इसकी रीढ़ हैं।
क्या उत्सवी भारत में ई-कामर्स और ‘क्विक कॉमर्स’ की प्रतिस्पर्धा और विस्तार का आकलन मापने की दृष्टि से हुआ! अर्थव्यवस्था को लेकर जो आंकड़े जारी होते हैं कई बार उन पर राजनीति हावी दिखाई देती है, लेकिन उसको टिकाए रखने और गति देने के पीछे जो सांस्कृतिक पक्ष हैं, उन्हें अनदेखा कर दिया जाता है।
2026 में भारत का क्विक कॉमर्स बाजार लगभग 40 प्रतिशत सालाना गति से बढ़ने का अनुमान है। मई 2026 तक ब्लिंकिट, जेप्टो और इंस्टामार्ट के संयुक्त डार्क-स्टोर नेटवर्क की संख्या लगभग 5,026 हो चुकी थी, जो केवल एक वर्ष पहले 3,405 थी।
बाजार में यह नई होड़ अर्थव्यवस्था और रोजगार के समीकरण बदल रही है। कुछ साल पहले तक मुकाबला मोहल्ले की दुकान और बड़े ऑनलाइन कारोबार के बीच था। अब ऑनलाइन कारोबार के सामने ही तुरंत सामान पहुंचाने वाली कंपनियां खड़ी हो गई हैं। ब्लिंकिट, जेप्टो और स्विगी इंस्टामार्ट जैसी कंपनियों ने ग्राहक की आदत बदल दी है। पहले लोग सामान की सूची बनाकर बाजार जाते थे। फिर घर बैठे सामान मंगाने लगे। अब नमक खत्म हुआ, दूध चाहिए, पूजा की सामग्री कम पड़ गई या मेहमान अचानक आ गए तो लोग तुरंत मोबाइल उठा लेते हैं।
सबसे रोचक बात यह है कि भारतीय बाजारों में बिक्री की वृद्धि केवल महंगी खरीदारी से नहीं आ रही। Datum Intelligence के अनुसार 2026 में त्योहारी ऑनलाइन खरीदारों की संख्या लगभग 13.8 करोड़ से बढ़कर 15.8 करोड़ और कुल ऑर्डर लगभग 76 करोड़ से बढ़कर 96.6 करोड़ होने का अनुमान है, जबकि औसत ऑर्डर मूल्य थोड़ा घट सकता है। यानी बाजार का विस्तार बड़े बिल से नहीं, ज्यादा बार खरीदने से हो रहा है।
यही इस कारोबार की सबसे बड़ी ताकत है। ग्राहक को लगता है कि बाजार अब उसकी जेब में आ गया है। न जाम में फंसना, न दूकान-दूकान घूमना और न लंबा इंतजार। लेकिन जैसा कि गांव में कहा जाता है, हर चमकती चीज सोना नहीं होती। तेज सुविधा के पीछे कई ऐसे सवाल खड़े हो रहे हैं जिन्हें छूट और रफ्तार के शोर में दबाया नहीं जा सकता।
किन्तु ऐसे में सबसे बड़ा सवाल सामान पास- पड़ोस की छोटी दुकानों को बचाने और साथ-साथ समान पहुंचाने वाले युवाओं की सुरक्षा का है। लंबे समय तक कई कंपनियां दस मिनट में सामान पहुंचाने को अपनी पहचान बनाकर पेश करती रहीं। जनवरी 2026 में सरकार ने कंपनियों से दस मिनट वाली डिलीवरी को बढ़ावा देने वाली भाषा हटाने को कहा। चिंता यह थी कि इतनी कम समय-सीमा का दबाव सड़क पर काम करने वाले युवाओं पर पड़ सकता है।
कंपनियों का कहना रहा कि सामान पास के गोदाम से भेजा जाता है, इसलिए किसी को तेज गाड़ी चलाने की जरूरत नहीं पड़ती। लेकिन जमीन पर काम करने वाले कई युवाओं की शिकायत अलग रही है। उनकी कमाई अक्सर ज्यादा ऑर्डर पूरे करने और समय पर सामान पहुंचाने से जुड़ी होती है। ऐसे में भले मोबाइल पर घड़ी न चल रही हो, मन में समय का दबाव बना रहता है। पेट की आग आदमी से बहुत कुछ कराती है। दो पैसे ज्यादा कमाने के चक्कर में कोई अपनी जान जोखिम में डाले, तो सुविधा की कीमत बहुत भारी हो जाती है।
दूसरा सवाल उन बंद गोदामों (डार्क स्टोर) को लेकर है जहां सामान रखा जाता है। ये आम दूकान जैसे नहीं होते। ग्राहक इनके भीतर नहीं जाता। यहीं से सामान पैक होकर आसपास के घरों तक भेजा जाता है। हाल की जांचों में कुछ ठिकानों पर सफाई, कीट नियंत्रण, पुराने सामान और तापमान की व्यवस्था से जुड़ी कमियां सामने आई हैं। ब्लिंकिट और जेप्टो से जुड़े कुछ गोदामों पर कार्रवाई भी हुई।
यह मामला गंभीर है। ग्राहक मोबाइल पर साफ सुथरी तस्वीर देखकर सामान खरीदता है। उसे गोदाम की असली हालत दिखाई नहीं देती। ऐसे में कंपनियों की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है। दाल में काला हो या पूरी दाल ही काली, ग्राहक को पता अक्सर तब चलता है जब नुकसान हो चुका होता है। इसलिए खाने-पीने के सामान के भंडारण, सफाई और समय-सीमा की नियमित जांच जरूरी है।
इसके साथ एक और सवाल है जो अक्सर चर्चा से बाहर रह जाता है। मोहल्ले का किराना दूकानदार इस पूरी होड़ में कहां खड़ा है। भारतीय बाजार केवल खरीदने-बेचने की जगह नहीं रहा। दूकानदार ग्राहक को पहचानता है, उधार दे देता है, जरूरत पर घर तक सामान भिजवा देता है और स्थानीय उत्पाद भी बेचता है। यही देशज अर्थव्यवस्था की पुरानी ताकत रही है।
नई तकनीक का विरोध कोई समाधान नहीं है। समय के साथ बाजार बदलेगा और बदलना भी चाहिए। लेकिन बदलाव ऐसा हो जिसमें छोटे दूकानदार, स्थानीय कारीगर, किसान, स्वयं सहायता समूह और छोटे उत्पादक भी जगह बना सकें। अगर तकनीक का सारा लाभ कुछ बड़ी कंपनियों तक सिमट गया तो बाजार की ताकत कुछ हाथों में चली जाएगी।
यहीं स्वदेशी की नई समझ जरूरी है। स्वदेशी का मतलब केवल बाहर की चीज छोड़ना नहीं, बल्कि अपने उत्पादन, अपने कामगार और अपने छोटे कारोबार को मजबूत करना भी है। अगर नई तकनीक गांव के उत्पाद, स्थानीय मिठाई, मिट्टी के दीये, हस्तशिल्प और छोटे उद्योगों को नए ग्राहक दिलाए तो यही तकनीक देशज अर्थव्यवस्था की ताकत बन सकती है।
त्योहारी मौसम में असली मुकाबला केवल इस बात का नहीं होना चाहिए कि कौन पांच मिनट पहले सामान पहुंचाता है। असली कसौटी यह होनी चाहिए कि सामान कितना सुरक्षित है, काम करने वाला युवक कितना सुरक्षित है, ग्राहक के साथ कितना साफ व्यवहार हो रहा है और स्थानीय अर्थव्यवस्था को कितना लाभ मिल रहा है।
हाट-बाजार में गति, तेजी आवश्यक है, पर भरोसा उससे भी ज्यादा जरूरी है। भारत को ऐसी नई अर्थव्यवस्था चाहिए जो तकनीक भी अपनाए और अपने छोटे दूकानदार, मजदूर, कारीगर तथा स्थानीय उत्पादक का हाथ भी न छोड़े। त्योहार की असली चमक तभी है जब बाजार की कमाई का उजाला हर घर तक पहुंचे।
उलझे वैश्विक समीकरणों के बीच भारतीय अर्थव्यवस्था में चमक बनी ही नहीं हुई, बढ़ रही है। भारत विरोध की राजनीति को बढ़त के प्रतिशत पर हल्ला मचाने दीजिए, किन्तु भारत के बाजारों को स्थानीय रोजगार और स्वदेशी की रौनक से जगमगाने दीजिए।
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