यह श्लोक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के ‘सुभाषितम्’ (वैचारिक एवं बौद्धिक वर्ग में प्रयुक्त अमृत-सूक्तियाँ) से लिया गया है।
श्लोक :
धर्मसंस्कृतिसम्पन्नं धीरोदात्तगुणान्वितम्।
संघशक्तिं विना राष्ट्रं न भवेज्जगदादृतम्।।
भावार्थ :
उत्तम धर्म और श्रेष्ठ संस्कृति वाला, धीरोदात्त गुणों से परिपूर्ण भी राष्ट्र संगठित शक्ति के बिना संसार में आदर का पात्र नहीं हो सकता।
आज के समय में प्रासंगिकता (Relevance for Today) यह श्लोक बताता है कि केवल प्राचीन और महान संस्कृति होना ही किसी राष्ट्र के वैश्विक सम्मान के लिए पर्याप्त नहीं है; जब तक उस राष्ट्र के पास संगठित शक्ति नहीं होगी, तब तक दुनिया में उसका आदर नहीं हो सकता।
सॉफ्ट पावर के साथ हार्ड/संगठित शक्ति आवश्यक: भारत का इतिहास, संस्कृति और दार्शनिक विचार कितना भी समृद्ध क्यों न हो, जब तक समाज में संगठित शक्ति और एकजुटता नहीं होगी, तब तक वैश्विक मंच पर देश को वह स्थान और आदर नहीं मिलता जिसका वह हकदार है।
भू-राजनीतिक (Geopolitical) यथार्थ: आज की वैश्विक व्यवस्था में केवल ‘अच्छा होना’ या ‘शांत प्रिय होना’ ही काफी नहीं है। शक्ति-संतुलन की दुनिया में केवल वही राष्ट्र आदर पाता है जो न केवल सांस्कृतिक रूप से समृद्ध हो, बल्कि आंतरिक रूप से अनुशासित, एकजुट और शक्तिशाली भी हो।
सांस्कृतिक गर्व के साथ सामाजिक एकजुटता: यह श्लोक आधुनिक नागरिकों को याद दिलाता है कि केवल अपनी गौरवशाली संस्कृति पर गर्व करने से काम नहीं चलेगा, बल्कि राष्ट्रहित के लिए नागरिकों का आपस में संगठित और अनुशासित होना ही राष्ट्र के वास्तविक आदर का आधार है।

















