भुवनेश्वर: पुरी स्थित श्री जगन्नाथ मंदिर की धार्मिक, सांस्कृतिक और संस्थागत विरासत को और अधिक सुरक्षित करने की दिशा में ओडिशा सरकार तथा श्री जगन्नाथ मंदिर प्रशासन ने दो महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। एक ओर श्री जगन्नाथ मंदिर प्रशासन ने 12वीं सदी के इस ऐतिहासिक मंदिर से जुड़ी तीन और विशिष्ट पहचानों—‘श्री मंदिर’, ‘रत्न भंडार’ और ‘श्री नहर’—के लिए बौद्धिक संपदा संरक्षण की प्रक्रिया आगे बढ़ाई है, वहीं दूसरी ओर राज्य सरकार ने श्री जगन्नाथ मंदिर भूमि प्रबंधन नियमावली, 2026 को मंजूरी देकर मंदिर की विशाल भूमि के निपटान और प्रबंधन के लिए एक व्यापक डिजिटल एवं संस्थागत व्यवस्था लागू की है। इन दोनों पहलों का उद्देश्य मंदिर से जुड़ी पवित्र पहचान और संपत्तियों की सुरक्षा को मजबूत करना है।
जहां ट्रेडमार्क संरक्षण के माध्यम से मंदिर से जुड़े नामों और प्रतीकों के अनधिकृत व्यावसायिक उपयोग पर रोक लगाने का प्रयास किया गया है, वहीं नई भूमि प्रबंधन व्यवस्था का लक्ष्य अतिक्रमण, फर्जी दावों, अनियमित निपटान और भूमि संबंधी विवादों पर प्रभावी नियंत्रण स्थापित करना है।
तीन और पहचानों को ट्रेडमार्क संरक्षण की दिशा में कदम
श्री जगन्नाथ मंदिर प्रशासन के मुख्य प्रशासक अरविंद कुमार पाढ़ी ने बताया कि ‘श्री मंदिर’, ‘रत्न भंडार’ और ‘श्री नहर’ के लिए दायर ट्रेडमार्क आवेदनों को बौद्धिक संपदा भारत व्यवस्था के तहत ट्रेडमार्क रजिस्ट्री ने प्रकाशन के लिए स्वीकार कर लिया है। यह स्वीकृति इन नामों को ट्रेडमार्क अधिनियम के तहत शब्द-चिह्न के रूप में पंजीकृत किए जाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। ये आवेदन श्री जगन्नाथ मंदिर प्रशासन द्वारा मंदिर से जुड़ी उन विशिष्ट पहचानों, नामों और प्रतीकों को कानूनी संरक्षण देने की व्यापक पहल का हिस्सा हैं, जिनका भगवान जगन्नाथ, श्री मंदिर और सदियों पुरानी धार्मिक एवं सांस्कृतिक परंपराओं से गहरा संबंध है। मंदिर प्रशासन अब तक ट्रेडमार्क रजिस्ट्री के समक्ष कुल 29 ट्रेडमार्क आवेदन दाखिल कर चुका है।
पहले चरण में ‘आनंद बाजार’, ‘पतितपावन’ और ‘नीलचक्र’ के लोगो को ट्रेडमार्क संरक्षण प्राप्त हुआ था। इसके बाद ‘जगन्नाथ धाम’, ‘श्री क्षेत्र’, ‘महाप्रसाद’, ‘नीलचक्र’ और ‘कोइली वैकुंठ’ से संबंधित आवेदनों को भी प्रकाशन के लिए स्वीकार किया गया। पाढ़ी के अनुसार, इस पहल का उद्देश्य श्री जगन्नाथ मंदिर की विशिष्ट आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और संस्थागत विरासत को सुरक्षित करना तथा मंदिर से जुड़े पवित्र नामों और पहचानों के अनधिकृत अथवा अनुचित व्यावसायिक इस्तेमाल को रोकना है। ट्रेडमार्क संरक्षण से इन नामों और प्रतीकों का इस्तेमाल कर अनधिकृत रूप से वस्तुओं एवं सेवाओं का उत्पादन, बिक्री, विपणन, वितरण अथवा आयात करने जैसी गतिविधियों पर कानूनी कार्रवाई का आधार मजबूत होगा। अधिकारियों का कहना है कि मंदिर से जुड़ी कई पहचानों का लाखों श्रद्धालुओं के लिए गहरा धार्मिक महत्व है।
ऐसे में उनके व्यावसायिक दुरुपयोग को रोकना महत्वपूर्ण है। मंदिर प्रशासन शेष ट्रेडमार्क आवेदनों की प्रक्रिया को भी आगे बढ़ाएगा और मंदिर के पवित्र नामों, प्रतीकों तथा अन्य विशिष्ट पहचानों की सुरक्षा के लिए आवश्यक कानूनी एवं प्रशासनिक कदम उठाता रहेगा। मंदिर की भूमि के प्रबंधन के लिए नया व्यापक ढांचा वहीं दूसरी तरउ ओडिशा मंत्रिमंडल ने मुख्यमंत्री मोहन चरण माझी की अध्यक्षता में हुई बैठक में श्री जगन्नाथ मंदिर भूमि प्रबंधन नियमावली, 2026 को मंजूरी दी है। यह नियमावली मंदिर की भूमि के निपटान और प्रबंधन से जुड़ी मौजूदा व्यवस्था में व्यापक बदलाव का आधार बनेगी। नई नियमावली श्री जगन्नाथ मंदिर अधिनियम, 1955 के तहत तैयार की गई है और यह वर्ष 2003 की समान नीति तथा उसके 2019 के संशोधित प्रावधानों का स्थान लेगी।
नई व्यवस्था का मुख्य उद्देश्य भूमि निपटान की प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी, जवाबदेह और प्रभावी बनाना है। इसके लिए आवेदन, सत्यापन और निपटान की प्रक्रिया को एक निगरानी-आधारित ऑनलाइन पोर्टल से जोड़ा जाएगा। सरकार के अनुसार, ओडिशा के भीतर और राज्य के बाहर श्री जगन्नाथ मंदिर की कुल 60,426.943 एकड़ भूमि दर्ज है। इनमें से 395.252 एकड़ भूमि ओडिशा के बाहर स्थित है। इसमें पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और आंध्र प्रदेश सहित अन्य राज्यों में स्थित भूमि शामिल है। नई व्यवस्था के तहत मंदिर की भूमि के निपटान के लिए आवेदन ऑनलाइन प्राप्त किए जाएंगे और उनकी प्रक्रिया भी डिजिटल माध्यम से पूरी की जाएगी। संबंधित जिले के कलेक्टर की अध्यक्षता में जिला स्तरीय भूमि उप-समिति गठित की जाएगी, जो स्थल सत्यापन करेगी तथा आवेदनों की जांच और समीक्षा करेगी।
मंदिर प्रबंधन समिति की भूमिका भी होगी महत्वपूर्ण
नई नियमावली में संस्थागत निगरानी को भी मजबूत किया गया है। भूमि निपटान के मामलों में श्री जगन्नाथ मंदिर प्रबंध समिति अनापत्ति प्रमाणपत्र जारी करेगी। इसके अलावा जिला स्तर पर श्री जगन्नाथ महाप्रभु भूमि संचालन समिति गठित की जाएगी। यह समिति भूमि संबंधी दावों की जांच, दस्तावेजों के सत्यापन और अन्य आवश्यक प्रक्रियाओं में सहयोग करेगी। इस व्यवस्था का उद्देश्य भूमि निपटान की प्रक्रिया में विभिन्न स्तरों पर जिम्मेदारी तय करना और किसी भी अनियमितता की संभावना को कम करना है।
भूमि के मूल्यांकन के लिए समान मानदंड
नई नियमावली में मंदिर भूमि के मूल्यांकन के लिए समान मानदंड निर्धारित किए गए हैं। इसके तहत बेंचमार्क मूल्य (बीएमवी) अथवा औसत भूमि बिक्री आंकड़े (एएलएसएस) में से जो अधिक होगा, उसी को आधार बनाकर भूमि का मूल्य निर्धारित किया जाएगा। ये प्रावधान मंदिर के सेवायतों, गैर-सेवायतों, मठों और अन्य पात्र दावेदारों सहित विभिन्न श्रेणियों के लाभार्थियों पर लागू होंगे। वाणिज्यिक उपयोग वाली 0.250 डिसमिल तक की भूमि के लिए बेंचमार्क मूल्य अथवा औसत भूमि बिक्री आंकड़ों में से जो अधिक होगा, उसके चार गुना के आधार पर मूल्यांकन किया जाएगा। नियमावली में मठों के बिजेस्थली के लिए विशेष रियायत का भी प्रावधान किया गया है। बिजेस्थली से आशय ऐसे स्थानों से है जहां किसी देवता या विग्रह की स्थापना कर पूजा-अर्चना की जाती है।
हालांकि इन रियायतों का लाभ निर्धारित पात्रता शर्तों तथा निरंतर कब्जे या सेवा-पूजा से संबंधित आवश्यकताओं के अधीन होगा।
जीआईएस आधारित डिजिटल मानचित्रण से होगी निगरानी
नई भूमि प्रबंधन व्यवस्था की प्रमुख विशेषताओं में श्री जगन्नाथ मंदिर की सभी भूमि का भौगोलिक सूचना प्रणाली यानी जीआईएस आधारित डिजिटल मानचित्रण और सूचीकरण शामिल है। सरकार मंदिर की भूमि से संबंधित जानकारी को एक सार्वजनिक डिजिटल डैशबोर्ड के माध्यम से उपलब्ध कराने की योजना बना रही है। इससे मंदिर की संपत्तियों की निगरानी अधिक प्रभावी ढंग से की जा सकेगी। डिजिटल व्यवस्था के माध्यम से अधिकारियों को अनधिकृत कब्जे और अतिक्रमण की पहचान करने तथा मंदिर की भूमि से संबंधित लंबित मुकदमों और विवादों पर नजर रखने में सहायता मिलेगी। ऑनलाइन व्यवस्था को राजस्व एवं आपदा प्रबंधन विभाग के मौजूदा भूलेख और भूनक्शा जैसे प्लेटफॉर्म तथा अन्य संबंधित प्रणालियों के साथ जोड़ा जाएगा। इससे भूमि अभिलेखों को वास्तविक समय के आधार पर अद्यतन करने में मदद मिलेगी।
फर्जी दस्तावेजों से हुए निपटान पर सख्त कार्रवाई नई नियमावली में धोखाधड़ी, गलत जानकारी, भ्रामक दावों अथवा फर्जी दस्तावेजों के आधार पर प्राप्त किए गए भूमि निपटान के मामलों से निपटने के लिए कड़े प्रावधान किए गए हैं। यदि किसी भूमि का निपटान धोखाधड़ी या गलत तथ्यों के आधार पर किया गया पाया जाता है, तो उसे रद्द किया जा सकेगा। ऐसे मामलों में जिम्मेदार व्यक्तियों के खिलाफ दीवानी के साथ-साथ आपराधिक कार्रवाई भी की जा सकती है। अपील और शिकायतों के निपटारे के लिए कानून विभाग के प्रमुख सचिव की अध्यक्षता में एक उच्चस्तरीय अपील समिति का गठन किया गया है। यह समिति भूमि निपटान से संबंधित शिकायतों और अपीलों की सुनवाई करेगी तथा प्रभावित पक्षों को समीक्षा और समाधान के लिए संस्थागत मंच उपलब्ध कराएगी।
मुख्य सचिव अनु गर्ग ने कहा कि नई व्यवस्था से मंदिर की भूमि के निपटान की प्रक्रिया में संस्थागत निगरानी मजबूत होगी और पूरी प्रक्रिया अधिक पारदर्शी एवं जवाबदेह बनेगी। धार्मिक विरासत के साथ संपत्ति की भी सुरक्षा श्री जगन्नाथ मंदिर से जुड़ी इन दोनों पहलों को मंदिर की अमूर्त और मूर्त विरासत की सुरक्षा के व्यापक प्रयास के रूप में देखा जा रहा है। ट्रेडमार्क संरक्षण जहां मंदिर से जुड़े पवित्र नामों, प्रतीकों और विशिष्ट पहचानों को अनधिकृत व्यावसायिक इस्तेमाल से बचाने का प्रयास है, वहीं नई भूमि प्रबंधन नियमावली मंदिर की विशाल भूमि संपत्तियों को अधिक व्यवस्थित और सुरक्षित बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। डिजिटल अभिलेख, जीआईएस आधारित मानचित्रण, समान मूल्यांकन मानदंड, ऑनलाइन आवेदन, संस्थागत जांच और अपील की व्यवस्था के माध्यम से भूमि प्रबंधन प्रणाली को अधिक पारदर्शी बनाने का प्रयास किया गया है। साथ ही धोखाधड़ी और फर्जी दस्तावेजों के आधार पर किए गए निपटान को रद्द करने तथा दोषियों के खिलाफ कार्रवाई के प्रावधान भी किए गए हैं।
माना जा रहा है कि ट्रेडमार्क संरक्षण और भूमि प्रबंधन की नई व्यवस्था मिलकर श्री जगन्नाथ मंदिर की धार्मिक एवं सांस्कृतिक पहचान तथा उसकी विशाल संपत्ति की सुरक्षा के लिए अधिक मजबूत संस्थागत ढांचा तैयार करेगी। इससे मंदिर से जुड़े पवित्र नामों और प्रतीकों के अनुचित उपयोग पर अंकुश लगाने के साथ-साथ वैध भूमि दावों और प्रशासनिक प्रक्रियाओं के निपटारे के लिए भी स्पष्ट एवं निगरानी-आधारित व्यवस्था सुनिश्चित होगी।
















