यह श्लोक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के चिंतन और वैचारिक ग्रंथों (पूर्व सरसंघचालक श्री गुरुजी गोलवलकर के विचारों और संघ प्रार्थना/सुभाषितों) से लिया गया है।
श्लोक-
शस्त्र-संभारमूलं हि प्रतीकारमूलं बलम्।
संघमूलं समुत्कर्ष-निः श्रेयसफलं बलम्।।
भावार्थ-
जिस प्रकार राष्ट्र का शस्त्रास्त्रों के संग्रह का मूल बल राष्ट्र को सुरक्षित रखने के लिए बल प्रदान करवाता है, वैसे ही संगठन का बल जिस राष्ट्र के मूल में है, वह भौतिक और आध्यात्मिक दोनों प्रकार की समुन्नति का फल देने वाला होता है।
आज के युग में प्रासंगिकता-
सामरिक सुरक्षा एवं आत्मनिर्भरता (Defense Preparedness): आज के भू-राजनीतिक माहौल में केवल शांति की बात करना काफी नहीं है। शांति की रक्षा के लिए सैन्य शक्ति और आधुनिक हथियारों का होना अनिवार्य है (जैसे ‘मेक इन इंडिया’ के तहत भारत का रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भर होना)।
संगठनात्मक शक्ति (Organizational Strength): व्यक्तिगत बल से बड़ा संगठन का बल होता है। आज के समय में कॉर्पोरेट, समाज या राष्ट्र के स्तर पर एकजुटता और सामूहिक प्रयास (Teamwork & Unity) ही बड़ी सफलताओं की नींव हैं।
संतुलित विकास (Balanced Growth): यह श्लोक भौतिक प्रगति (‘समुत्कर्ष’) और नैतिक/आत्मिक कल्याण (‘निःश्रेयस’) दोनों के संतुलन पर जोर देता है। आधुनिक युग में केवल आर्थिक विकास ही काफी नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और नैतिक मूल्यों की रक्षा भी उतनी ही आवश्यक है।

















