यह श्लोक प्राचीन नीति-शास्त्र का एक अत्यंत व्यावहारिक सिद्धांत प्रस्तुत करता है कि “केवल प्राकृतिक या आर्थिक संसाधन किसी देश को महान नहीं बनाते, बल्कि वहां के लोगों की सामाजिक एकता (सुसंहति) ही उसे समृद्ध बनाती है।”
श्लोक-
धनधान्यसुसम्पन्नं स्वर्णरत्नमयाकरम्।
सुसंहतिं विना राष्ट्रं न भवेद् विभवास्पदम्॥
भावार्थ-
धनधान्य से सुसंपन्न, सोने और रत्नों की प्रचुर खानों से परिपूर्ण देश भी संगठित राष्ट्र के बिना वैभवशाली नहीं हो सकता।
आज के संदर्भ में निम्न कारणों से प्रासंगिक है : है:
प्राकृतिक संसाधनों से संपन्न लेकिन विफल राष्ट्र : आज दुनिया के कई ऐसे देश हैं। जिनके पास तेल, सोना और बहुमूल्य रत्नों की विशाल खदानें हैं। लेकिन आंतरिक गृहयुद्ध, सामाजिक विभाजन और धार्मिक/राजनीतिक विद्वेष (सुसंहति का अभाव) के कारण वे देश कंगाली, अराजकता और अस्थिरता से जूझ रहे हैं।
एकता के बल पर विकसित बने देश : इसके विपरीत, जापान, सिंगापुर या स्विट्जरलैंड जैसे देशों के पास प्राकृतिक संसाधन बहुत सीमित हैं। फिर भी, उच्च सामाजिक अनुशासन, पारस्परिक विश्वास, और राष्ट्रीय एकता (सुसंहति) के बल पर वे दुनिया के सबसे वैभवशाली और विकसित राष्ट्रों में गिने जाते हैं।
आर्थिक विकास बनाम सामाजिक ताना-बाना : कोई भी देश कितना भी GDP ग्रोथ कर ले, अगर समाज में भाषा, जाति, धर्म या विचारों के नाम पर कटुता और विभाजन है, तो विदेशी निवेश रुक जाता है, प्रतिभाएं पलायन (Brain Drain) करती हैं और बना-बनाया ढांचा नष्ट हो जाता है।
राष्ट्रीय सुरक्षा और संप्रभुता : आधुनिक हाइब्रिड वॉरफेयर (Hybrid Warfare) में विरोधी देश सीमाओं से ज्यादा किसी राष्ट्र के आंतरिक विभाजन का फायदा उठाते हैं। जब तक देश के नागरिक भीतर से एक नहीं होंगे, तब तक केवल आर्थिक ताकत राष्ट्र की रक्षा नहीं कर सकती।
















