भारतीय खेल सृष्टि में न्याय की दृष्टि
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भारतीय खेल सृष्टि में न्याय की दृष्टि

जब हमारी प्राचीन खेल परंपराएं आधुनिक कानूनी पारदर्शिता, तकनीक और सुधारात्मक न्याय प्रणाली से जुड़ेंगी, तो भारत न केवल वैश्विक खेल स्पर्धाओं में शीर्ष पर पहुंचेगा, बल्कि संपूर्ण विश्व को 'खेल न्यायशास्त्र' की एक नई दिशा भी दिखाएगा।

Written byअमरेश्वर प्रताप शाहीअमरेश्वर प्रताप शाही
Aug 28, 2026, 06:49 pm IST
inभारत, खेल
अमरेश्वर प्रताप शाही

अमरेश्वर प्रताप शाही

जब हम भारतीय खेल न्यायशास्त्र और प्रशासनिक सुधारों की बात करते हैं, तो हमें सबसे पहले अपनी समृद्ध सांस्कृतिक और बौद्धिक खेल विरासत को समझना होगा। इस संबंध में ‘ब्रिटानिका विश्व कोश’ के चौदहवें संस्करण (1932) का स्मरण करना चाहिए, जिसमें स्पष्ट उल्लेख है कि शतरंज का इतिहास अत्यंत प्राचीन और गौरवशाली है। भारत में लगभग 4,000 वर्ष पूर्व उद्भूत ‘चतुरंग’ ही वास्तव में आधुनिक शतरंज का मूल रूप है। भारत में खेल कभी केवल मनोरंजन या प्रतिस्पर्धा का साधन नहीं रहे; ये हमारी रणनीतिक कुशलता, अनुशासन और बौद्धिक सामर्थ्य के प्रतीक रहे हैं।

कहा जाता है कि इस खेल की रचना मंदोदरी ने की थी और वे इसे रावण के साथ खेला करती थीं। यह ‘चतुरंग’ भारत से फारस (ईरान) पहुंचा, 8वीं सदी में वहां से पुनः भारत आया और 1694 में ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के विद्वान डॉ. थॉमस हाइड द्वारा प्रमाणित किए जाने के बाद वैश्विक पटल पर भारत में इसके उद्भव को स्वीकार किया गया। जब किसी राष्ट्र की ऐसी बौद्धिक और रणनीतिक परंपराएं समृद्ध होती हैं, तो विश्वनाथन आनंद और डी. गुकेश जैसे खिलाड़ियों का अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उत्कृष्ट प्रदर्शन और नेतृत्व स्वाभाविक हो जाता है।

आज आवश्यकता इस बात की है कि कबड्डी, खो-खो और योग जैसे स्वदेशी खेलों की प्राचीनता और प्रामाणिकता को वैश्विक मंच पर पुनः स्थापित किया जाए। भारत को केवल अंतरराष्ट्रीय स्पर्धाओं का प्रतिभागी बनकर नहीं रहना है, बल्कि अपनी समृद्ध खेल संस्कृति का नेतृत्व करना है।

खेल प्रशासन में न्याय की दृष्टि तभी सार्थक होगी जब यह कानून स्वदेशी खेलों को बढ़ावा दे, क्षेत्राधिकार स्पष्ट करे और खिलाड़ियों को पारदर्शी वातावरण प्रदान करे। 1 जून, 2026 से प्रभावी हो चुका यह अधिनियम भारत के खेल इतिहास में पहला ऐसा कानून है, जिसमें अंतरराष्ट्रीय स्तर के मानकों का समावेश किया गया है। जिस प्रकार भारतीय संविधान के सिद्धांतों का अनुसरण विश्व के कई देशों ने किया, मुझे पूर्ण विश्वास है कि इस खेल कानून का अनुसरण भी वैश्विक स्तर पर होगा।

क्रियान्वयन-पूर्व संवाद : जिस प्रकार जीएसटी (जीएसटी) लागू करने से पहले व्यापक चर्चा हुई थी, उसी प्रकार इस कानून के लागू होने से पहले भी निरंतर संवाद आवश्यक है। डिजिटल माध्यमों के जरिए खेल पारिस्थितिकी तंत्र के सभी हितधारकों, विशेषकर खिलाड़ियों को इस प्रक्रिया में शामिल किया जाना चाहिए।

विशेषज्ञता और नैतिक संचालन : विवाद समाधान में केवल योग्य, अनुभवी और विषय-विशेषज्ञों को ही नियुक्त किया जाना चाहिए। खेल संघों के संचालन में ‘नैतिक सिद्धांतों’ को प्राथमिकता मिले और न्याय में देरी से बचने के लिए प्रत्येक प्रक्रिया की समय-सीमा निश्चित हो, जो कि वर्तमान में इस कानून में नहीं दिख रही है।

सुधारात्मक न्याय और मुकदमों में कमी : ‘करैक्शनल मेथड्स ऑफ एडजुडिकेशन’ जैसा प्रावधान हमारी न्यायपालिका में हर जगह है, इसका भी समावेश इसमें होना चाहिए। ‘लेसनिंग ऑफ लिटिगेशन’, जो हमारे राष्ट्र की लिटिगेशन पॉलिसी है, इसका ध्यान रखना होगा। हमारे बोर्ड और फेडरेशन्स की कार्यप्रणाली ऐसी होनी चाहिए जिससे कम से कम मुकदमों की स्थिति बने और यदि ऐसी स्थिति आए भी, तो उसका निस्तारण त्वरित गति से हो।

फ्रेंच ट्रिब्यूनल मॉडल : इस कानून के तहत गठित ‘राष्ट्रीय खेल ट्रिब्यूनल’ को सिविल कोर्ट के कुछ अधिकार दिए गए हैं। इसमें फ्रेंच ट्रिब्यूनल प्रणाली के ‘इन्क्विजिटोरियल एलिमेंट’ शामिल हैं। इसका तात्पर्य यह है कि संस्थाएं मूक दर्शक बनकर नहीं रहेंगी, बल्कि सत्य तक पहुंचने के लिए स्वयं अन्वेषण और जांच करेंगी।

तकनीकी व फॉरेंसिक सहायता : तकनीकी प्रकृति के खेल विवादों के निपटारे के लिए आवश्यकता पड़ने पर फॉरेंसिक सहायता और तकनीकी विशेषज्ञों की भी मदद ली जानी चाहिए। यह समझिए कि यह एक संक्षिप्त और इस विषय का एक अच्छा कानून है। खेल जगत में इस कानून का एक बहुत अच्छा प्रभाव पड़ेगा, न केवल राष्ट्रीय स्तर पर, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी।

जब हमारी प्राचीन खेल परंपराएं आधुनिक कानूनी पारदर्शिता, तकनीक और सुधारात्मक न्याय प्रणाली से जुड़ेंगी, तो भारत न केवल वैश्विक खेल स्पर्धाओं में शीर्ष पर पहुंचेगा, बल्कि संपूर्ण विश्व को ‘खेल न्यायशास्त्र’ की एक नई दिशा भी दिखाएगा।
(गत 1 अगस्त को लेखक ने प्रयागराज में क्रीड़ा भारती द्वारा आयोजित एक गोष्ठी को संबोधित किया था। यह लेख उनके उसी भाषण का संपादित अंश है)

Topics: खेल संघफॉरेंसिक व तकनीकीखेल न्यायशास्त्रतकनीकी विवादप्रशासनिक न्यायखेल दिवसनिष्पक्षता की दृष्टिइन्क्विजिटोरियल मॉडलफ्रेंच ट्रिब्यूनल प्रणालीअदालती मुकदमापारदर्शिताखेल कानूनखेलनैतिक संचालनपाञ्चजन्य विशेषनैतिक सिद्धांतशतरंजचतुरंग
अमरेश्वर प्रताप शाही
अमरेश्वर प्रताप शाही
पूर्व न्यायाधीश [Read more]
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