यह श्लोक सनातन ग्रंथों (पुराणों / नीति-शास्त्रों जैसे दत्तात्रेय पुराण/अध्यात्म रामायण की कर्म-मीमांसा परंपरा) और व्यापक रूप से प्रचलित ‘सुभाषित साहित्य’ से उद्धृत है।
श्लोक :
कर्मैव कारणं देह-धारणे च विसर्जने।
कर्मैव च विजानीत कारणं सुखदुःखयोः॥
भावार्थ :
कर्म ही देह धारण करने और देह त्यागने में कारण है और सुख-दुःख का कारण भी कर्म को ही जानना चाहिये। 08
प्रासंगिकता (Relevance)
कर्म-उत्तरदायित्व (Accountability): यह श्लोक व्यक्ति को यह अहसास कराता है कि जीवन का चक्र (जन्म, जीवन के सुख-दुःख और मृत्यु/देह-त्याग) भाग्य, संयोग या किसी तीसरे कारक पर निर्भर नहीं है, बल्कि व्यक्ति के स्वयं के कृत्यों (कर्मों) का परिणाम है।
भाग्यवादिता से मुक्ति : यह श्लोक अंधविश्वास और निराशा को दूर कर मनुष्य को ‘पुरुषार्थ’ (अपने कर्म स्वयं सुधारने) की प्रेरणा देता है।
नैतिक जीवन व मानसिक संतुलन: सुख मिलने पर अत्यधिक अहंकार से बचना और दुःख में विचलित हुए बिना धैर्य रखना—दोनों ही दृष्टियों से यह सिद्धांत जीवन में संतुलन स्थापित करता है।

















