विभाजन की विभीषिका : ...तो विराट होता भारत का सामर्थ्य
August 19, 2026
  • Read Ecopy
  • Circulation
  • Advertise
  • Careers
  • About Us
  • Contact Us
Android appiPhone AppArattai
Panchjanya
  • ‌
  • भारत
    • अंडमान और निकोबार द्वीप
    • दादरा और नगर हवेली एवं दमन और दीव
    • अरूणाचल प्रदेश
    • असम
    • आंध्र प्रदेश
    • उत्तराखंड
    • उत्तर प्रदेश
    • ओडिशा
    • कर्नाटक
    • केरल
    • गुजरात
    • गोवा
    • चण्‍डीगढ़
    • छत्तीसगढ़
    • जम्‍मू एवं कश्‍मीर
    • झारखण्‍ड
    • तमिलनाडु
    • तेलंगाना
    • त्रिपुरा
    • दिल्ली
    • नागालैण्‍ड
    • पंजाब
    • पश्चिम बंगाल
    • पुडुचेरी
    • बिहार
    • मणिपुर
    • मध्य प्रदेश
    • महाराष्ट्र
    • मिजोरम
    • मेघालय
    • राजस्थान
    • लक्षद्वीप
    • लद्दाख
    • सिक्किम
    • हरियाणा
    • हिमाचल प्रदेश
  • विश्व
  • संघ @100
    • संघ को जानें
    • पंच परिवर्तन
      • स्वदेशी
      • कुटुम्ब प्रबोधन
      • सामाजिक समरसता
      • नागरिक कर्तव्य
      • पर्यावरण
    • संघ गीत
  • सम्पादकीय
  • काम की खबरें
  • स्वदेशी
  • जीवनशैली
  • अधिक
    • विभाजन-विभीषिका
    • पाञ्चजन्य इवेंट
      • सुशासन संवाद
      • सागर मंथन
      • मुंबई संकल्प
      • अष्टायाम
      • गुरुकुलम
      • साबरमती संवाद
      • आधार इन्फ्रा
    • वेब स्टोरी
    • ऑपरेशन सिंदूर
    • विश्लेषण
    • लव जिहाद
    • खेल
    • मनोरंजन
    • यात्रा
    • स्वास्थ्य
    • धर्म-संस्कृति
    • पर्यावरण
    • बिजनेस
    • साक्षात्कार
    • शिक्षा
    • रक्षा
    • कला-साहित्य
      • पुस्तकें
      • पुस्तक समीक्षा
    • सोशल मीडिया
    • विज्ञान और तकनीक
    • मत अभिमत
    • श्रद्धांजलि
    • संविधान
    • आजादी का अमृत महोत्सव
    • मानस के मोती
    • जनजातीय नायक
    • पॉडकास्ट
    • पत्रिका
    • हमारे लेखक
  • Subscribe
    • Subscribe Print Edition
    • Subscribe Ecopy
    • Read Ecopy
  • ‌
  • भारत
    • अंडमान और निकोबार द्वीप
    • दादरा और नगर हवेली एवं दमन और दीव
    • अरूणाचल प्रदेश
    • असम
    • आंध्र प्रदेश
    • उत्तराखंड
    • उत्तर प्रदेश
    • ओडिशा
    • कर्नाटक
    • केरल
    • गुजरात
    • गोवा
    • चण्‍डीगढ़
    • छत्तीसगढ़
    • जम्‍मू एवं कश्‍मीर
    • झारखण्‍ड
    • तमिलनाडु
    • तेलंगाना
    • त्रिपुरा
    • दिल्ली
    • नागालैण्‍ड
    • पंजाब
    • पश्चिम बंगाल
    • पुडुचेरी
    • बिहार
    • मणिपुर
    • मध्य प्रदेश
    • महाराष्ट्र
    • मिजोरम
    • मेघालय
    • राजस्थान
    • लक्षद्वीप
    • लद्दाख
    • सिक्किम
    • हरियाणा
    • हिमाचल प्रदेश
  • विश्व
  • संघ @100
    • संघ को जानें
    • पंच परिवर्तन
      • स्वदेशी
      • कुटुम्ब प्रबोधन
      • सामाजिक समरसता
      • नागरिक कर्तव्य
      • पर्यावरण
    • संघ गीत
  • सम्पादकीय
  • काम की खबरें
  • स्वदेशी
  • जीवनशैली
  • अधिक
    • विभाजन-विभीषिका
    • पाञ्चजन्य इवेंट
      • सुशासन संवाद
      • सागर मंथन
      • मुंबई संकल्प
      • अष्टायाम
      • गुरुकुलम
      • साबरमती संवाद
      • आधार इन्फ्रा
    • वेब स्टोरी
    • ऑपरेशन सिंदूर
    • विश्लेषण
    • लव जिहाद
    • खेल
    • मनोरंजन
    • यात्रा
    • स्वास्थ्य
    • धर्म-संस्कृति
    • पर्यावरण
    • बिजनेस
    • साक्षात्कार
    • शिक्षा
    • रक्षा
    • कला-साहित्य
      • पुस्तकें
      • पुस्तक समीक्षा
    • सोशल मीडिया
    • विज्ञान और तकनीक
    • मत अभिमत
    • श्रद्धांजलि
    • संविधान
    • आजादी का अमृत महोत्सव
    • मानस के मोती
    • जनजातीय नायक
    • पॉडकास्ट
    • पत्रिका
    • हमारे लेखक
  • Subscribe
    • Subscribe Print Edition
    • Subscribe Ecopy
    • Read Ecopy
Panchjanya
panchjanya android mobile app
  • होम
  • भारत
  • विश्व
  • संघ @100
  • सम्पादकीय
  • काम की खबरें
  • स्वदेशी
  • जीवनशैली
  • विश्लेषण
  • मत अभिमत
  • रक्षा
  • धर्म-संस्कृति
  • पत्रिका
  • पाञ्चजन्य इवेंट
  • Print Edition
  • Ecopy
होम भारत

विभाजन की विभीषिका : …तो विराट होता भारत का सामर्थ्य

यदि 1947 में भारत का विभाजन न हुआ होता, तो आज हमारा देश केवल भूगोल और जनसंख्या की दृष्टि से ही विशाल नहीं होता, बल्कि साझा संस्कृति, संसाधनों और आर्थिक शक्ति के कारण विश्व की सबसे प्रभावशाली शक्तियों में शामिल होता।

Written byदीपक द्विवेदीदीपक द्विवेदी
Aug 19, 2026, 08:12 am IST
inभारत

यदि हमें बंटवारे का दंश न झेलना पड़ता तो आज का भारत केवल क्षेत्रफल और जनसंख्या की दृष्टि से ही नहीं, बल्कि साझा इतिहास, संस्कृति, संसाधनों और आर्थिक शक्ति के आधार पर भी दुनिया की सबसे प्रभावशाली शक्तियों में शामिल होता। यह कल्पना केवल अतीत को याद करने की नहीं, बल्कि यह समझने की है कि अखंड भूगोल, साझा विरासत और एकीकृत संसाधनों के साथ भारत की संभावनाएं कितनी विराट हो सकती थीं।

यदि विभाजन न हुआ होता, तो हम 15 अगस्त 2026 की सुबह लाल किले की प्राचीर पर तिरंगा लहराते हुए कराची से आए सिंधी परिवार, लाहौर से आए पंजाबी, ढाका से आए बंगाली, पेशावर से आए पश्तून आदि के साथ एक ही सुर में राष्ट्रगान गा रहे होते। करतारपुर साहिब में गुरु नानक देव की धरती पर बिना वीजा के माथा टेकते, लाहौर में पंजाबी संस्कृति एवं आर्य समाज का स्थापना दिवस मनाया जा रहा होता, सिंधी समाज कराची से बहावलपुर तक अपनी विविधता में योगदान दे रहा होता, ढाका का ढाकेश्वरी मंदिर एवं चटगांव के बौद्ध विहार में घंटियों की ध्वनि गूंज रही होती। लेकिन 1947 की विभाजन रेखा ने अचानक सब बदल दिया, यह विभाजन भूगोल का नहीं था, यह स्मृति, परिवार, बाजार, तीर्थ, सांस्कृतिक संबंधों का था। अविभाजित भारत की कल्पना करना हमारे वर्तमान को भूतकाल से जोड़कर भविष्य को दिखाने का कार्य करती है।

विशाल भू भाग एवं जनसंख्या

अगर विभाजन न होता तो विश्व बैंक के 2024 के आंकड़ों के अनुसार भारत की आबादी लगभग 146 करोड़ थी, पाकिस्तान की 25 करोड़ और बांग्लादेश की 17 करोड़ अर्थात आज भारत लगभग 188 करोड़ लोगों का एक विशाल देश होता। क्षेत्रफल की दृष्टि से भारत के 32.87 लाख वर्ग किमी, पाकिस्तान के 7.96 लाख वर्ग किमी और बांग्लादेश के 1.48 लाख वर्ग किमी के क्षेत्र को मिलकर एक विशाल भू भाग होता जिसका क्षेत्रफल 42.27 लाख वर्ग किमी होता, जो हिमालय और हिंदूकुश से लेकर बंगाल की डेल्टा भूमि तक और सिंधु से ब्रह्मपुत्र तक फैला होता जो प्राकृतिक संसाधनों, कृषि, नदियों, खनिजों और विशाल बाजार का अद्भुत संगम होता।

भारत की तट रेखा को देखें जो 2025 के जीआईएस सर्वे के बाद लगभग 11000 किलोमीटर है, पाकिस्तान की 1046 किमी तथा बांग्लादेश की 710 किमी है, जो अविभाजित भारत, आज 12855 किलोमीटर लंबी समुद्र तट रेखा वाला विशाल देश होता, जिससे विश्व व्यापार, नौपरिवहन, मत्स्य-संसाधन, ऊर्जा, समुद्री खनिज और सामरिक शक्ति का विराट आधार बन गया होता।

दूसरा पक्ष देखें तब मानवीय विरासत, जो विभाजन के साथ बिखर गई थी, पाकिस्तान में 1951 की जनगणना में हिंदू आबादी लगभग 12.9% थी जो अब हाल के आंकड़ों में 2.1 प्रतिशत रह गई। इसी प्रकार बांग्लादेश में 1951 में हिंदू आबादी 22% थी जो 2022 की जनगणना में घट कर 7.95 हो गई। अगर विभाजन न होता तो लाहौर का सिख अपने गुरु की धरती पर रहता, सिंध का हिंदू अपनी पीढ़ियों के व्यापारिक और सांस्कृतिक परंपरा को आगे बढ़ाता। ढाका का हिंदू, चटगांव का बौद्ध अपनी राष्ट्रीय पहचान के साथ वही निवास करता। इतिहास का प्रश्न यह नहीं होता कि विभाजन से हमने क्या खोया, बल्कि यह होता यदि हम साथ रहते तो मिलकर दुनिया को क्या दे सकते थे?

विशाल साझा अर्थव्यवस्था

2024 के आंकड़ों के अनुसार भारत, बांग्लादेश और पाकिस्तान की कुल अर्थव्यवस्था लगभग 4.73 ट्रिलियन होती, जो जर्मनी और जापान से भी बड़ी होती है। कल्पना कीजिए पंजाब और सिंध से कपास आता, धागा-कपड़ा गुजरात और महाराष्ट्र से आता, जो पंजाब एवं बांग्लादेश के औद्योगिक क्षेत्र में तैयार होता और यही उत्पाद कराची, मुंबई चटगांव से दुनिया के बाजारों तक पहुंचता। यदि विशाल बाजार के साथ भारत की आईटी शक्ति, पाकिस्तानी कृषि-औद्योगिक क्षमता, बांग्लादेश की गारमेंट मैन्युफैक्चरिंग आदि जुड़ जाती है तो आज की सही जीडीपी के 4.73 ट्रिलियन डॉलर से कहीं आगे होने की संभावना रहती और अविभाजित भारत वैश्विक महाशक्ति होता।

संपर्क एवं व्यापार

अविभाजित भारत का पश्चिमी सम्पर्क ईरान और अरब जगत की ओर खुलता जो हमारे लिए पेट्रोलियम, प्राकृतिक गैस के स्थलीय गलियारे के रूप में कार्य करता और चाहबहार की आवश्यकता नहीं होती, उत्तर पश्चिम में अफगानिस्तान और मध्य एशिया की ओर जाने वाले रास्ते तथा पूर्व में म्यांमार एवं थाईलैंड और आगे दक्षिण पूर्व एशिया तक पहुंच प्रदान कराते। आज भारत बड़ी आसानी से म्यांमार थाईलैंड त्रिपक्षीय राजमार्ग, कलादान प्रोजेक्ट को आसानी से कर रहा होता और एक्ट ईस्ट नीति की नींव कहीं अधिक मजबूत होती। दूसरी महत्वपूर्ण बात है कि जो उत्तरापथ चंद्रगुप्त मौर्य ने बनवाया था, जिसे शेरशाह सूरी ने पुनर्निर्माण करवाया था वह पेशावर से लेकर ताम्रलिप्ति तक फिर से दिखाई देता।

जल एवं प्राकृतिक संसाधन

जलवायु परिवर्तन, बढ़ती आबादी से जल संकट भविष्य में जल निर्णायक चुनौती बन सकता है, कल्पना कीजिए अविभाजित भारत में सिंधु, गंगा, ब्रह्मपुत्र की विशाल नदी प्रणाली एक ही होती और न ही 1960 की सिंधु जल नदी समझौते करना पड़ता और न ही पाकिस्तान और बांग्लादेश को लेकर जल विवाद होते और पूरी नदी का वैज्ञानिक और न्यायपूर्ण उपयोग होता।

आज पाकिस्तान अधिकृत बलूचिस्तान में तांबे-सोने के महत्वपूर्ण भंडार हैं और आने वाले समय में यह स्ट्रैटेजिक मिनरल की संभावना वाला क्षेत्र कहा जा रहा है। बांग्लादेश में उपजाऊ डेल्टा के साथ-साथ प्राकृतिक गैस कोयला चूना पत्थर संसाधन भी हैं। अविभाजित भारत के पास हिमालय की जल विद्युत शक्ति, पश्चिम भारत एवं सिंध के सौर संसाधन, तटीय क्षेत्र में पवन ऊर्जा और बंगाल की खाड़ी की विशाल समुद्री क्षेत्र, इन सबके राष्ट्रीय इलेक्ट्रिसिटी ग्रिड में जोड़ने की संभावना होती।

युद्धों एवं सैन्य व्यय पर प्रभाव

1947 का विभाजन लगभग दो करोड़ से अधिक लोगों को प्रभावित करने वाले इतिहास का सबसे बड़ा मानवीय एवं दुःखद विस्थापन था। असंख्य परिवार अपनी मातृ-भूमि से हमेशा के लिए बिछड़ गए। पंजाब सिंध बंगाल का सामाजिक और आर्थिक भूगोल बदल गया।
इसके बाद 1947-48, 1965, 1971 और 1999 के संघर्षों ने उपमहाद्वीप को बार-बार युद्ध की ओर धकेला, हजारों लोग मारे गए। 1971 के युद्ध में एक करोड़ शरणार्थी भारत आए इस मानवीय संकट का आर्थिक बोझ भी भारत को उठाना पड़ा। अगर इन संसाधनों का उपयोग सड़क, रेल, सिंचाई, बिजली, बंदरगाह, उद्योग, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार में लगाया जाता तो शायद भारत विश्व का सबसे अग्रणी देश होता। युद्ध की सबसे बड़ी कीमत वह धन नहीं, जो खजाने से निकलता है, वास्तव में वह जीवन एवं अवसर है जो फिर कभी वापस नहीं आते हैं। शायद अविभाजित भारत की सबसे बड़ी विजय होती कि उसे अपने ही सभ्यतागत परिवार के लोगों के विरुद्ध बार-बार युद्ध करना नहीं पड़ता।

आंतरिक सुरक्षा पर प्रभाव

अविभाजित भारत में न तो कश्मीर, न पीओके का विवाद होता, न नियंत्रण रेखा होती और न उसके आसपास की सैन्य सुरक्षा संरचना अस्तित्व में आती। भारत को संयुक्त राष्ट्र में कश्मीर प्रश्न लेकर बार-बार जाने की स्थिति पैदा भी नहीं होती।

सबसे महत्वपूर्ण प्रभाव सीमा पर आतंकवाद और घुसपैठ अविभाजित भारत में सम्भव नहीं होती। अविभाजित भारत में बलूचिस्तान एवं खैबर पख्तूनवा की चुनौतियां नहीं होती। आज बांग्लादेश के साथ घुसपैठ का प्रश्न अविभाजित भारत के लिए आंतरिक प्रशासन, क्षेत्रीय विकास और नागरिक प्रबंधन का विषय बन जाता। भारत का सिलीगुड़ी कॉरिडोर जिसे ‘चिकन नेक’ कहा जाता है, जो पूर्वोत्तर भारत को जोड़ता है, अविभाजित भारत के लिए यह समस्या पैदा ही नहीं होती और पूर्वोत्तर भारत का संपर्क अधिक व्यापक और गहरा होता। सबसे बड़ी बात जिन लोगों को आज सीमा के उस पार समझा जाता है, वे इस राष्ट्र के नागरिक होते।

सामाजिक सांस्कृतिक प्रभाव

अविभाजित भारत में पाकिस्तान बांग्लादेश के भूभाग में अनेक हिंदू, बौद्ध, सिख एवं जैन संस्कृति परंपराएं स्थल सुरक्षित रहते। सिखों के लिए ननकाना साहिब, सिंधी समाज की अपनी धरती, बलूचिस्तान में हिंगलाज माता की परंपरा, कश्मीर में शारदा पीठ, तक्षशिला की बौद्ध विरासत, चटगांव के बौद्ध स्थल तक लोगों की पहुंच आसान होती। सिंधु घाटी सभ्यता के नगर नियोजन, वेदों से लेकर उपनिषद की भूमि, गंधार क्षेत्र की बौद्ध कला, आदि हमारी साझी पहचान होती। सबसे महत्वपूर्ण बात विस्थापन की स्मृति की बजाय आज हमारी सभ्यता की निरंतरता की स्मृति होती, तब कोई नहीं कहता कि हमारे पुरखे लाहौर से आए थे बल्कि कहता हमारा घर आज भी लाहौर में है। हमारी इस विरासत की आगे ले जाने वाली साझी पीढ़ी भी हमारे साथ होती।

वैश्विक प्रभाव

अविभाजित भारत एशिया और ग्लोबल साउथ की सबसे प्रभावशाली शक्तियों में से एक होता। अविभाजित भारत में पाकिस्तान चीन की रणनीति मोहरा नहीं बनता और शायद अफगानिस्तान में तालिबान नहीं होता, आज पाकिस्तान को आतंकवाद का गढ़ नहीं बनता और न ही पाकिस्तान में सैन्य तानाशाह और बांग्लादेश में राजनीतिक उथल पुथल नहीं होती। भारत के लिए संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थाई सदस्यता का दावा कहीं अधिक प्रभावशाली होता। लाहौर की सांस्कृतिक परंपरा, ढाका की बंगाली संस्कृति, कराची का समुद्री महानगर, अमृतसर की सिख विरासत, वाराणसी की आध्यात्मिक परंपरा, मुंबई का सिनेमा, कोलकाता का साहित्य, क्रिकेट की साझी दीवानगी, हिंदुस्तानी और कर्नाटक संगीत, योग, आयुर्वेद, बौद्ध विरासत, सूफी परंपराएं हमारी सॉफ्ट पावर होती।

चुनौतियां होतीं पर असाध्य नहीं

जब अविभाजित भारत की बात करते हैं तो जाहिर है कि हमारे समक्ष कुछ चुनौतियां भी जरूर होतीं। विशाल जनसंख्या का प्रशासन, भाषाई विविधता, क्षेत्रीय असमानता, राजनीतिक प्रतिनिधित्व, प्रशासनिक विकेंद्रीकरण, सीमावर्ती और जनजाति क्षेत्रों का विकास, जाति और सामाजिक असमानता, आर्थिक संसाधनों का संतुलन, विशाल सीमा और सुरक्षा व्यवस्था जैसी अनेक चुनौतियां सामने होतीं। सबसे बड़ी चुनौती विविधता को राजनीतिक संघर्ष बनने से रोकने की होती। यह सब चुनौतियां होने के बाद भी आसानी से इनसे निपटा जा सकता था। इतिहास हमें बताता है कि प्राचीन काल में इसी विशाल भारत पर चंद्रगुप्त मौर्य और अशोक ने शासन किया था, जो एक राजतंत्र, केंद्रीकृत और लोक कल्याणकारी शासन था।

इससे स्पष्ट है कि भारत की विविधता उसके एकीकरण में बाधा नहीं, बल्कि उसकी शक्ति रही है। आवश्यकता केवल ऐसी शासन व्यवस्था की होती जो अलग-अलग क्षेत्रों, भाषाओं, समुदायों और परंपराओं को सम्मान देते हुए उन्हें एक व्यापक राष्ट्रीय चेतना से जोड़ सके। प्राचीन भारत में प्रशासन की स्थानीय इकाइयों को पर्याप्त भूमिका देते हुए केंद्र की मजबूत सत्ता ने इसी संतुलन को साधने का प्रयास किया था।

अविभाजित भारत के सामने चुनौतियां निश्चित रूप से बड़ी होतीं, लेकिन वे असाध्य नहीं थीं। साझा इतिहास, सांस्कृतिक निरंतरता, तीर्थ परंपराएं, व्यापारिक मार्ग, नदियां और सदियों से चली आ रही सामाजिक-सांस्कृतिक अंत:क्रियाएं पूरे भूभाग को एक सूत्र में बांधती थीं। इसलिए अविभाजित भारत की कल्पना केवल भूगोल की कल्पना नहीं है। यह उस संभावना की भी कल्पना है जिसमें विविधताओं के बीच एकता को राजनीतिक संघर्ष के बजाय राष्ट्रीय शक्ति का आधार बनाया जाता।

चुनौतियां तब भी होतीं, लेकिन इतिहास यह प्रमाणित करता है कि भारत की सभ्यतागत एकता इतनी गहरी थी कि एक सक्षम और समावेशी शासन व्यवस्था के सामने वे चुनौतियां देश की अखंडता के लिए बाधा नहीं, बल्कि उसके विकास की दिशा तय करने वाले अवसर बन सकती थीं। अविभाजित भारत की यह कल्पना उस संभावना को समझने का प्रयास है कि यदि इतिहास की वह विभाजन रेखा न खिंची होती, तो आज हमारा वर्तमान कितना अलग और भविष्य कितना विराट होता।

Topics: रक्षा व्ययसिंधु जल समझौताशरणार्थी समस्यापाञ्चजन्य  विशेषसभ्यतागत विरासतआतंकवादसाझा संस्कृतिविभाजन की विभीषिकासीमा पार व्यापारआंतरिक सुरक्षाधार्मिक एवं सांस्कृतिकशारदा पीठवैश्विक महाशक्तिननकाना साहिबहिंगलाज माता
दीपक द्विवेदी
दीपक द्विवेदी
सिविल सेवा विशेषज्ञ , इतिहास संकलन समिति, जनजाति कल्याण केंद्र। इतिहास , भारतीय ज्ञान परम्परा एवं विभिन्न विमर्श पर वैचारिक लेखन और उद्बोधन। [Read more]
Share
Tweet
SendShareSend
Subscribe Panchjanya YouTube Channel
Download Panchjanya mobile apps: Google Play Store  / App Store

संबंधित समाचार

एक शिविर में राहत सामग्री का वितरण करते संघ के स्वयंसेवक (फाइल चित्र)

विभाजन की विभीषिका : संघ ने संभाला

सुनीता कोहली

विभाजन की विभीषिका : न रहने का ठिकाना, न खाने का…

बांग्लादेश की राजधानी ढाका का नामकरण ढाकेश्वरी देवी के नाम पर हुआ है, ले​किन अब ढाकेश्वरी मंदिर टूटा पड़ा है।

विभाजन की विभीषिका : माटी गई, मंदिर गया, बिखर गया मन

डॉ. शाम लाल कठपालिया

विभाजन की विभीषिका : ‘हिंदू अपनी बेटियों को मार देते थे’

प्रीतम दास चावला

विभाजन की विभीषिका :  उजड़ा घर पर हौसला बना रहा

राहत शिविरों में निवास करते शरणार्थी

विभाजन की विभीषिका : सिंध छूटा, संकल्प नहीं

Load More

ताज़ा समाचार

जंतर मंतर पर नीट परीक्षा को लेकर हुआ था प्रदर्शन

‘CJP के कथित आंदोलन में माओवादी भी थे शामिल’, आयोजकों से मांगा स्पष्टीकरण

विभाजन की विभीषिका : …तो विराट होता भारत का सामर्थ्य

आज का श्लोक : स्वमङ्गलसमाशंसी यः स्वराष्ट्रमुपेक्षते

Ravi Tamta Meets Aviation Minister Kinjarapu Ram Mohan Naidu HAPIDA SKYNEX Flying Car Panchjanya

हवा में उड़ेगी भारत की पहली ‘स्काई कार’: उत्तराखंड के रवि टम्टा से मिले उड्डयन मंत्री, जानिए क्या है HAPIDA SKYNEX!

वंदे मातरम गायन के दौरान असहज हुईं सोनिया गांधी

वंदे मातरम विवाद: सोनिया गांधी के खिलाफ गाजियाबाद कोर्ट में शिकायत दाखिल

पानी में पेशाब मिलाने की घटना के बाद परिजनों ने स्कूल पहुंचकर विरोध दर्ज कराया।

स्कूल में छात्राओं की पानी की बोतल में पेशाब मिलाया, परिजनों ने किया हंगामा

Bastar Naxal Violence Victims Reach Delhi Real Stories CRPF Martyrs Panchjanya

“हमारे शरीर छलनी हैं और वो नक्सलवाद पर गर्व करते हैं”: नक्सल पीड़ित पहुंचे दिल्ली, सुनाई रूह कंपा देने वाली दास्तान

Satynder Jain plea application dismissed

दिल्ली जल बोर्ड भ्रष्टाचार मामले में AAP नेता सत्येंद्र जैन समेत 6 गिरफ्तार

RSS Akhil Bharatiya Samanvay Baithak Visakhapatnam Mohan Bhagwat Sunil Ambekar Demographic Change Panchjanya

डेमोग्राफिक चेंज पर संघ गंभीर : अखिल भारतीय समन्वय बैठक में होगी चर्चा, ‘Join RSS’ से संख्या में बड़ा उछाल!

चमोली टनल हादसा: 117 घंटे बाद पूरा हुआ देश का सबसे कठिन रेस्क्यू, 12 श्रमिक सकुशल निकले, 10 की दुखद मौत

Load More
  • Privacy
  • Terms
  • Cookie Policy
  • Refund and Cancellation
  • Delivery and Shipping

© Bharat Prakashan (Delhi) Limited.
Tech-enabled by Ananthapuri Technologies

  • Search Panchjanya
  • होम
  • भारत
    • अंडमान और निकोबार द्वीप
    • दादरा और नगर हवेली एवं दमन और दीव
    • अरूणाचल प्रदेश
    • असम
    • आंध्र प्रदेश
    • उत्तराखंड
    • उत्तर प्रदेश
    • ओडिशा
    • कर्नाटक
    • केरल
    • गुजरात
    • गोवा
    • चण्‍डीगढ़
    • छत्तीसगढ़
    • जम्‍मू एवं कश्‍मीर
    • झारखण्‍ड
    • तमिलनाडु
    • तेलंगाना
    • त्रिपुरा
    • दिल्ली
    • नागालैण्‍ड
    • पंजाब
    • पश्चिम बंगाल
    • पुडुचेरी
    • बिहार
    • मणिपुर
    • मध्य प्रदेश
    • महाराष्ट्र
    • मिजोरम
    • मेघालय
    • राजस्थान
    • लक्षद्वीप
    • लद्दाख
    • सिक्किम
    • हरियाणा
    • हिमाचल प्रदेश
  • विश्व
  • संघ @100
    • संघ को जानें
    • पंच परिवर्तन
      • स्वदेशी
      • सामाजिक समरसता
      • कुटुम्ब प्रबोधन
      • पर्यावरण
      • नागरिक कर्तव्य
    • संघ गीत
  • सम्पादकीय
  • काम की खबरें
  • स्वदेशी
  • जीवनशैली
  • विभाजन-विभीषिका
  • पाञ्चजन्य इवेंट
    • सुशासन संवाद
    • सागर मंथन
    • मुंबई संकल्प
    • अष्टायाम
    • गुरुकुलम
    • साबरमती संवाद
    • आधार इन्फ्रा
  • वेब स्टोरी
  • ऑपरेशन सिंदूर
  • विश्लेषण
  • लव जिहाद
  • खेल
  • मनोरंजन
  • यात्रा
  • स्वास्थ्य
  • धर्म-संस्कृति
  • पर्यावरण
  • बिजनेस
  • साक्षात्कार
  • शिक्षा
  • रक्षा
  • कला-साहित्य
    • पुस्तकें
    • पुस्तक समीक्षा
  • सोशल मीडिया
  • विज्ञान और तकनीक
  • मत अभिमत
  • श्रद्धांजलि
  • संविधान
  • आजादी का अमृत महोत्सव
  • पॉडकास्ट
  • पत्रिका
  • हमारे लेखक
  • Read Ecopy
  • प्रसार विभाग – Circulation
  • About Us
  • Contact Us
  • Careers @ BPDL
  • Advertise
  • Privacy Policy

© Bharat Prakashan (Delhi) Limited.
Tech-enabled by Ananthapuri Technologies