श्लोक-
वीरेतिहासविख्यातं साधुचारित्र्यविश्रुतम्।
विना संघटने राष्ट्र न भवेद् बलवत्तरम्॥
भावार्थ-
वीरों के इतिहास से विख्यात, श्रेष्ठ चरित्र से प्रसद्धि राष्ट्र, यदि संगठित नहीं है तो वह अधिक बलशाली नहीं होता।
आज के संदर्भ में प्रासंगिकता (Relevance Today):
विरासत और चरित्र से परे संगठन की आवश्यकता: कोई भी राष्ट्र केवल अपने गौरवशाली इतिहास, वीरता या नैतिक मूल्यों के बल पर हमेशा मजबूत नहीं बना रह सकता। वैश्वीकरण और बदलती वैश्विक व्यवस्था के इस दौर में आंतरिक एकजुटता और रणनीतिक संगठन ही राष्ट्र की असली ताकत है।
सामाजिक और वैचारिक एकता: विविधता से भरे समाज में जब तक नागरिकों के बीच वैचारिक और सामाजिक संगठन नहीं होगा, तब तक देश बाहरी चुनौतियों और आंतरिक विभाजनों से प्रभावी ढंग से नहीं निपट सकता।
राष्ट्रीय सुरक्षा और अखंडता: आज के तकनीकी और डिजिटल युग में भी ‘संगठन में ही शक्ति है’ (संघे शक्तिः कलौ युगे) का सिद्धांत लागू होता है। राष्ट्र निर्माण, सुरक्षा और विकास की गति को बनाए रखने के लिए समाज के हर वर्ग का एक सूत्र में बंधना अनिवार्य है।

















