सनातन हिन्दू धर्मावलम्बियों में भगवान शिव के प्रति कितनी गहरी आस्था है, इसका अनुमान श्रावण मास की कांवर यात्राओं के उत्साह को देखकर सहज ही लगाया जा सकता है। शिवलिंग पर जलाभिषेक के लिए कांधे पर कांवर उठाए गेरुआ वस्त्र पहने, कमर में अंगोछा और सिर पर पटका बांधे, नंगे पैर चलने वाले देवाधिदेव शिव के इन समर्पित कांवरिया भक्तों का स्वतः स्फूर्त जनसमूह हमारे राष्ट्र की गौरवशाली आध्यात्मिक भावधारा और सामाजिक समरसता का अनूठा परिदृश्य प्रस्तुत करता है। चूंकि सावन के पहले पखवाड़े में त्रयोदशी का दिन भगवान शंकर का जलाभिषेक का सर्वाधिक शुभ मुहूर्त माना जाता है; इसलिए श्रद्धालु कांवरिये यह यात्रा इस तरह शुरू करते हैं ताकि वे स्वयं द्वारा निर्धारित गोमुख, गंगोत्री, हरिद्वार, काशी आदि गंगा तीर्थों से अपनी कांवरों में गंगाजल भर कर सुनिश्चित तिथि पर अपने इष्ट महादेव का अभिषेक कर सकें।
सनातन धर्मियों की मान्यता है कि जो भक्त श्रावण मास में कांवर यात्रा के जरिए शिवलिंग की आराधना करता है, वह सांसारिक कष्टों से मुक्त होकर शिवकृपा का अधिकारी बन जाता है। पूरे सावन मास के दौरान भोले बाबा के भक्त शिवलिंग का जलाभिषेक करने को द्वादश ज्योतिर्लिंगों और देशभर के सुप्रसिद्ध शिव मंदिरों की यात्रा करते हैं। ऐसे में मन में सहज ही एक विचार कौंधता है कि आखिर शिवलिंग की पूजा का शुभारम्भ भारत में किस पुण्य भूमि पर हुआ होगा! यह पुण्यभूमि है उत्तराखंड के अल्मोड़ा में स्थित भगवान शिव का 2500 वर्ष पुराना जागेश्वर धाम मंदिर।
पुराण ग्रंथों में मिलता है जागेश्वर मंदिर का उल्लेख
पौराणिक मान्यता है कि शिवलिंग पूजन का शुभारम्भ उत्तराखंड के अल्मोड़ा में स्थित भगवान शिव के ढाई हजार पुराने जागेश्वर धाम मंदिर से हुआ था। इस पुरातन मंदिर का उल्लेख शिव पुराण, लिंग पुराण व स्कंद पुराण आदि ग्रंथों में मिलता है। हिमालय के मनमोहक प्राकृतिक दृश्यों के बीच बसा समुद्र तल से करीब 6,135 फीट की ऊंचाई पर देवदार के जंगल से घिरा देवाधिदेव का यह पुण्यधाम वस्तुतः छोटे-बड़े 124 मंदिरों का समूह है। इन मंदिरों में मृत्युंजय महादेव मंदिर, केदारेश्वर मंदिर, नंदा देवी मंदिर, नौ दुर्गा मंदिर, नवग्रह मंदिर, सूर्य मंदिर, दंडेश्वर मंदिर, चंडिका मंदिर, कुबेर मंदिर, लकुलीश मंदिर, बालेश्वर मंदिर, पुष्टिदेवी मंदिर और कालिका देवी मंदिर प्रमुख हैं। जागेश्वर धाम लकुलीश संप्रदाय का भी प्रमुख केंद्र माना जाता है। ज्ञात हो कि लकुलीश संप्रदाय को शिव के 28वें अवतार के रूप में माना जाता है।
जागेश्वर धाम में नागेश्वर शिवलिंग के रूप में विराजमान है महादेव
जागेश्वर धाम में स्थित शिवलिंग नागेश्वर शिवलिंग के रूप में पूजित हैं। जागेश्वर मंदिर के पास बहने वाली नदी को जटा गंगा कहा जाता है, यानी शिव की जटाओं से निकलने वाली गंगा। जागेश्वर महादेव के अन्य लोकप्रिय नाम हैं- योगेश्वर महादेव, हटकेश्वर महादेव और नागेश्वर महादेव। पौराणिक कथानक के अनुसार, दक्ष प्रजापति का वध करने और अपनी पत्नी सती की अस्थियों की भस्म को अपने शरीर को मलने के बाद, शिव यहीं ध्यान करने बैठे थे। एक अन्य किवदंती के अनुसार, भगवान राम के पुत्र लव और कुश ने यहाँ यज्ञ किया था। उन्होंने इसके लिए विभिन्न देवताओं को आमंत्रित किया था।
ऐसा माना जाता है कि इन मंदिरों की स्थापना सबसे पहले उन्होंने ही की थी। किवदंती है कि इस स्थान पर सप्त ऋषियों ने भी तपस्या की थी। जागेश्वर धाम मंदिर में भैरव को द्वारपाल के रूप में अंकित किया गया है। श्रद्धालुओं की मान्यता है कि इस धाम में सच्चे मन से शीश नवाने वालों को एक अलौकिक आध्यात्मिक ऊर्जा की अनुभूति होती होती है, इसीलिए मन की शांति पाने के लिए और बाबा का आशीर्वाद लेने के लिए प्रति वर्ष बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां आते हैं। सच्चे मन से मांगी गई मंगलकारी मनोकामना यहाँ स्वीकार होती है। आठवीं सदी में जगतगुरु आदि शंकराचार्य ने भी इस दिव्य तीर्थ का भ्रमण किया था।
कत्यूरी शासकों ने कराया था जागेश्वर धाम मंदिर समूह का निर्माण
कत्यूरी शासकों ने सातवीं शताब्दी से 14वीं शताब्दी के बीच जागेश्वर धाम मंदिर समूह का निर्माण इन मंदिरों का निर्माण और पुनरोद्धार किया था। यहां स्थित अधिकांश मंदिरों में नागर शैली की वास्तुकला देखने को मिलती है। किन्तु कुछ मंदिर ऐसे भी हैं जिनमें दक्षिण और मध्य भारत के मंदिरों में उपयोग किए जाने वाले पैटर्न देखने को मिलते हैं। यहां स्थापित मंदिरों की विशेषता यह है कि इनके शिखर में लकड़ी का बिजौरा (छत्र) बना है जो बारिश और हिमपात के वक्त मंदिर की सुरक्षा करता है।
चंद शासकों ने जागेश्वर धाम को अर्पित किए थे 365 गांव
बताते चलें कि चंद शासकों ने जागेश्वर धाम में पूजा-अर्चना की सुचारु व्यवस्था के लिए अपनी जागीर से 365 गांव जागेश्वर धाम को अर्पित किए थे। मंदिर में लगने वाले भोग आदि की सामग्री आज भी प्रमुख रूप से इन्हीं गांवों से आया करती है। जागेश्वर मंदिर में राजा दीप चंद और पवन चंद की धातु निर्मित मूर्ति भी स्थापित हैं। इस मंदिर समूह को भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण देहरादून मंडल ने राष्ट्रीय संरक्षित स्मारक घोषित किया है। जागेश्वर धाम मंदिर से जुड़े पंडित शुभम भट्ट बताते हैं कि यह जागेश्वर मंदिर प्राचीन कैलाश मानसरोवर मार्ग पर स्थित है। पुराने समय में मानसरोवर यात्री यहां पूजा अर्चना करने के बाद ही आगे बढ़ते थे।
जागेश्वर धाम से जुड़ी अनूठी पूजन परंपराएं
जागेश्वर धाम मंदिर से कई अनूठी पूजन परंपराएं जुड़ी हैं। यहां श्रावण चतुर्दशी पर्व पर निसंतान महिलाएं पूरी रात हाथ में दीपक लेकर तपस्या करती हैं। स्थानीय लोगों के अनुसार यहाँ महिलाएं एक ही मुद्रा में पालकी में बैठकर अथवा दोनों पैरों पर खड़े रहकर पूरी रात तपस्या करती हैं। यहां भगवान शिव से जुड़े दो मुख्य त्योहार मनाए जाते हैं- पहला महाशिवरात्रि है और दूसरा श्रावण मास में शिव अभिषेक।
कैसे पहुंचे जागेश्वर धाम
उत्तराखंड के जागेश्वर धाम मंदिर आप फ्लाइट, रेल, बस और कार से पहुंच सकते हैं। मंदिर का निकटतम एयरपोर्ट पंतनगर एयरपोर्ट है। यह मंदिर से 165 किमी दूर है। यहां से आप टैक्सी या अन्य यातायात सेवा प्राप्त कर सकते हैं। गढ़वाल में देहरादून स्थित जॉली ग्रांट एयरपोर्ट से भी आप टैक्सी लेकर मंदिर पहुंच सकते हैं। ट्रेन से यात्रा करने वाले यात्री काठगोदाम रेलवे स्टेशन पर उतरकर टैक्सी और बस का प्रयोग कर मंदिर पहुंच सकते हैं। यात्री अपनी कार से भी यात्रा कर सकते हैं।

















