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होम मत अभिमत

‘परिवर्तन दोष देने से नहीं, स्वयं उत्तरदायित्व स्वीकार करने से आता है’

समाज में आस्था जितनी घटती है, आक्रोश उतना ही बढ़ता है। आज आवश्यकता केवल विरोध की नहीं, बल्कि उस विश्वास को पुनर्जीवित करने की है जो आक्रोश को राष्ट्रनिर्माण की शक्ति बना सके

Written byमुकुल कानिटकरमुकुल कानिटकर
Aug 3, 2026, 12:32 pm IST
inमत अभिमत

प्रश्न आस्था का है। मनुष्य आस्था के बल पर असंभव प्रतीत होने वाले कार्य भी कर सकता है। अनास्था से या तो निराशा जन्म लेती है या फिर विद्रोह। सामान्यतः कहा जाता है कि परिस्थितियों की विपरीतता से अनास्था जन्म लेती है। कुछ सीमा तक यह बात सही भी हो सकती है, किंतु आस्था मूलतः संस्कारों का विषय है। यदि मन भावात्मक एवं सकारात्मक संस्कारों में पला हो, तो वह विपरीत
से विपरीत परिस्थितियों में भी आस्था का त्याग नहीं करता।

आज समाज में अनास्था का वातावरण दिखाई देता है। व्यक्ति का व्यक्ति पर विश्वास कम होता जा रहा है। कुछ व्यक्तियों के दोषों का सामान्यीकरण कर पूरे वर्ग का प्रतिनिधि बना देना आज के प्रचार तंत्र की प्रवृत्ति बन गई है। परिणामस्वरूप युवा वर्ग का एक बड़ा हिस्सा गहरे अविश्वास और अनास्था से घिरता जा रहा है।

निराशाजनक नहीं है वास्तविकता

किन्तु जितनी निराशा आज का युवा अनुभव करता है, वास्तविकता उतनी निराशाजनक नहीं है। आज भी यदि सही पद्धति, धैर्य और सतत प्रयास के साथ आगे बढ़ा जाए, तो न्याय प्राप्त किया जा सकता है। व्यवस्था में कमियां सकती हैं लेकिन परिवर्तन की संभावनाएं समाप्त नहीं हुई हैं।

जब आस्था टूटती है, तब व्यक्ति को कोई मार्ग दिखाई नहीं देता। उसे व्यवस्था के सभी उपलब्ध माध्यम निष्प्रभावी लगने लगते हैं। ऐसे में अपने आक्रोश को सड़क पर व्यक्त करना ही उसे सबसे सरल उपाय प्रतीत होता है। यही कारण है कि आज आवश्यक साधना का धैर्य न होने के कारण ऐसे प्रदर्शन आम होते जा रहे है।

हाल ही में जंतर-मंतर पर युवाओं का प्रदर्शन भी इसी व्यापक मनःस्थिति का प्रतीक था। परीक्षा में अनियमितताओं, पारदर्शिता की मांग और भविष्य को लेकर उत्पन्न चिंता ने हजारों युवा वहां मौजूद थे। उनका आक्रोश वास्तविक था। लोकतंत्र में अपनी बात शांतिपूर्ण ढंग से रखना प्रत्येक नागरिक का अधिकार भी है। किंतु साथ ही यह प्रश्न भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि क्या केवल प्रदर्शन ही परिवर्तन का अंतिम साधन है? यदि आंदोलन के साथ संगठन, अध्ययन, संवाद, वैधानिक संघर्ष और दीर्घकालिक सामाजिक सहभागिता न जुड़ें, तो क्षणिक आक्रोश स्थायी परिवर्तन में परिवर्तित नहीं हो पाता।

रचनात्मकता का आधार बन सकती ऐसी ऊर्जा

यह उबाल प्रायः अस्थायी होता है। इसमें सम्मिलित होने वाले अनेक लोग केवल यह संतोष प्राप्त कर लेते हैं कि ‘हमने कुछ तो किया।’
इस प्रकार की भड़ास निकालने का दुष्परिणाम होता है कि जो ऊर्जा रचनात्मकता का आधार बन सकती थी, धीरे-धीरे समाप्त हो जाती है। वास्तविक परिवर्तन केवल दूसरों को दोष देने से नहीं, बल्कि स्वयं उत्तरदायित्व स्वीकार करने से आता है। शासन को कटघरे में खड़ा करना लोकतंत्र का आधार है, किंतु अपने दायित्वों पर विचार किए बिना प्रत्येक समस्या का समाधान केवल सरकार से अपेक्षित करना परिवर्तन का मार्ग नहीं हो सकता।

प्रभावी परिवर्तन के सूत्र हमें स्वामी विवेकानंद के जीवन से प्राप्त होते हैं। जो व्यक्ति क्रांति करना चाहता है, उसे स्वयं से आरंभ करना होता है। स्वामी विवेकानंद ने किसी भी बात को केवल इसलिए स्वीकार नहीं किया कि किसी ने कह दिया है। उन्होंने सत्य के साक्षात्कार के लिए स्वयं प्रयोग किए। अपनी आंखों से पूरे देश को देखा, जन-जन को समझा। आज से भी अधिक विकट और विपरीत परिस्थितियां उनके समय में थीं। पूरे देश का भ्रमण करने के बाद उस 29 वर्षीय युवा की मनःस्थिति क्या रही होगी, इसकी कल्पना की जा सकती है। किंतु उन्होंने अपने भीतर की उथल-पुथल को अराजक विद्रोह में परिवर्तित नहीं होने दिया, उन्होंने ‘सारे समाज पर बम की तरह फट पड़ने की बात अवश्य की’ लेकिन समाज का प्रबोधन व जागरण करने से पूर्व उन्होंने पूर्ण धैर्य से तैयारी की। अपने जीवन के लक्ष्य व उसको साकार करने की योजना का साक्षात्कार किया। उन्होंने धैर्यपूर्वक स्वयं को तैयार किया। अपने जीवन-ध्येय और उसे साकार करने की योजना का साक्षात्कार किया।

दिसंबर 1892 में कन्याकुमारी की श्रीपाद शिला पर किया गया उनका ध्यान उनके जीवन का निर्णायक मोड़ था। वह केवल व्यक्तिगत साधना नहीं थी, बल्कि भारत को अपने भीतर जीने का राष्ट्रध्यान था। वह भारत की जीवन्तता का अनुभव था; सहस्राब्दियों से प्रवाहित शाश्वत राष्ट्रचेतना का साक्षात्कार था। प्रतीति से ही प्रबोधन का अधिकार प्राप्त होता है। इसी राष्ट्रध्यान में स्वामी विवेकानंद ने भारत के अद्वितीय स्वरूप का अनुभव किया। उन्होंने उन मूल तत्त्वों को पहचाना, जिन्होंने भारत को भारत बनाया। उन्होंने समझा कि भारत का जीवन-ध्येय समस्त मानवता को विज्ञानमय, आनंदमय, शाश्वत और सर्वजनहितकारी जीवन-दृष्टि प्रदान करना है। यही भारत के जगद्गुरु स्वरूप का आधार है।

इसीलिए अत्यंत कठिन परिस्थितियों में भी उन्होंने भारत के धर्म, समाज, संस्कृति, परंपरा और साहित्य का अवमूल्यन नहीं किया। उन्होंने उसकी अंतर्निहित उदात्तता को पहचाना और अनुभव किया कि भारत को उसकी महानता का परिचय कराना ही उनके जीवन का कार्य है। अगले दस वर्षों तक उन्होंने उसी कार्य को अपना संपूर्ण जीवन समर्पित कर दिया। स्वयं के जीवन-ध्येय की स्पष्ट प्रतीति ही किसी भी क्रांति का प्रथम सोपान है। इसके लिए आस्था अनिवार्य है। आस्था से उत्पन्न आत्मबल ही आक्रोश को रचनात्मक क्रांति की ऊर्जा में परिवर्तित कर सकता है।

आस्था जगाने का लें संकल्प

आइए, इस राष्ट्रचिंतन के अवसर पर समाज में आस्था जगाने का संकल्प लें। स्वामी विवेकानंद की भांति अपने भीतर भारत की अनुभूति जगाने का प्रयास करें। यह कार्य केवल नारे लगाने से नहीं होता। इसके लिए आत्मचिंतन, धैर्य, अनुशासन और सतत साधना की आवश्यकता होती है। प्रतीति ही प्रबोधन का अधिकार देती है।

आज के आक्रोशित युवा से केवल इतना कहना है, अपने आक्रोश को व्यर्थ के विलाप में मत बहा दो। उसे अपने भीतर तपने दो, परिपक्व होने दो। वही ऊर्जा जब विवेक, धैर्य और आस्था से जुड़ेगी, तभी वह नवसृजन का आधार बनेगी। सड़क पर उठी आवाज यदि चरित्र, संगठन और राष्ट्रनिर्माण के संकल्प से जुड़ जाए, तभी वह इतिहास बदलने वाली शक्ति बनती है।

Topics: पाञ्चजन्य विशेषराष्ट्रनिर्माणआक्रोशित युवा आत्मचिंतन विवेक एवं धैर्य Vivek & Dhairya Wisdom & Patience उत्तरदायित्वस्वामी विवेकानंदसतत साधना
मुकुल कानिटकर
मुकुल कानिटकर
अखिल भारतीय प्रचार टोली सदस्य, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ [Read more]
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